Thursday - 2 December 2021 - 1:04 PM

भ्रष्टाचारियों पर वित्त मंत्रालय की मेहरबानी से यूपी में हवा हुआ जीरो टालरेंस

जुबिली न्यूज ब्यूरो

लखनऊ. भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस के नारे बड़े विज्ञापनों में भले ही दिखाई दे रहे हों, मगर सूबे के वित्त मंत्रालय के मुखिया ने जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोपितों पर मेहरबानी की है वह योगी सरकार के दामन पर दाग लगा रहा है।

बीते दिनों जब उत्तर प्रदेश में भाजपा के अति वरिष्ठ नेता सुरेश खन्ना को वित्त मंत्री बनाया गया था तो ये उम्मीद जगी थी कि विभाग के भीतर चल रहे अफसरों की पोस्टिंग के रैकेट पर लगाम लगाएंगे, मगर सुरेश खन्ना के वित्त मंत्री बनने के बाद भी न तो ट्रांसफर पोस्टिंग के रैकेट पर लगाम लगी और न बड़े बड़े महत्वपूर्ण विभागों में एक ही अफसर को कार्यवाहक बनाने पर।

ट्रेजरी डायरेक्टर के द्वारा नवनियुक्त वित्त अधिकारियों के अनियमित ट्रांसफर को बाद में सही ठहराने और बड़े घोटालों के बाद भी अफसरों पर नियमानुसार कार्रवाई न होने के कारण अब वित्त विभाग में भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय में कुछ ऐसे तत्व भी सक्रिय है जो इस तरह के कामों को अंजाम दे रहे हैं।

ताज़ा मामला हरदोई कोषागार में 5 करोड़ से अधिक के गबन के दोषी अधिकारियों को मुख्यमंत्री की संस्तुति लिये बिना ही उन्हें वसूली से बरी कर देने का है।

क्या है पूरा मामला

राजकीय कोषागार हरदोई में पांच करोड़ से अधिक (रू05,45,88,881/-) पेंशनर्स को फर्जी भुगतान दिखाकर गबन करने का मामला है।

मामले की जानकारी होने के बाद अपर मुख्य सचिव (वित्त)ने वित्त नियंत्रक, कार्यालय प्रधान मुख्य वन संरक्षक और विभागाध्यक्ष उप्र, लखनऊ को जांच अधिकारी नामित किया। जांच अधिकारी ने लगभग 1300 पेज की विस्तृत रिपोर्ट सरकार को दी जिसमे जांच में कई तत्कालीन वरिष्ठ कोषाधिकारी गबन/अनियमित भुगतान के दोषी पाये गये।

जांच रिपोर्ट के अनुसार– दीपांकर शुक्ला, वरिष्ठ कोषाधिकारी द्वारा रू० 2,49,14,375.00के फर्जी ई-पेमेंट व चेक से किये गये जिसमें चेक के माध्यम से फर्जी पी.पी.ओ.के द्वारा रुपये 81,21,432.00 का फर्जी भुगतान हुआ जिसकी वसूली ब्याज सहित दीपांकर शुक्ला,वरिष्ठ कोषाधिकारी से किये जाने की संस्तुति की गई है।

इसी तरह से मुकुन्दी लाल गुप्ता और सन्तोष कुमार मौर्य वरिष्ठ कोषाधिकारी को गबन का दोषी पाते हुए क्रमश: रुपये 51,38,535.00और रुपये 19,837.00की वसूली मय ब्याज किये जाने का उल्लेख है।

देवी प्रसाद, तत्कालीन वरिष्ठ कोषाधिकारी को फर्जी पी.पी.ओ.के माध्यम से 39,24,750.00 रुपये के अनियमित भुगतान यानी गबन का दोषी पाया गया। जिसके ब्याज सहित वसूली के लिये जांच अधिकारी ने संस्तुति की है। वित्त मंत्री ने दोषी अधिकारियों के विरुद्ध वसूली की कार्रवाई भी नहीं की। फिलहाल हरदोई कोषागार घोटाले के दो आरोपित कोषाधिकारी अभी सेवा में हैं और अच्छे पदों पर पदस्थापित हैं।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वरिष्ठ कोषाधिकारी, दीपांकर शुक्ला और देवी प्रसाद को दण्ड निर्धारण की कार्रवाई का अधिकार मुख्य मंत्री को है लेकिन लेकिन मुख्यमंत्री की संस्तुति के बिना ही वित्त विभाग के मुखिया ने मुख्यमंत्री को फाइल न भेज कर खुद से इन अधिकारियों को केवल एक इन्क्रीमेंट डाउन करते हुए नाम मात्र की कार्रवाई की और दोषियों से वसूली सहित बड़ी कारवाई से बचा लिया।

विभागीय सूत्रों का कहना है कि मुकुन्दी लाल गुप्ता की फाइल पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है और 51,38,535.00 रुपये की धनराशि के गबन के प्रकरण को दबा दिया गया।

गबन को लेकर प्रवर्तन निदेशालय हुआ सख्त, अब प्रवर्तन करेगा पूरे प्रकरण की जांच

हरदोई के राजकोष गबन प्रकरण में धनशोधन निवारण अधिनियम 2002(PMLA) के प्रावधानों के अंतर्गत भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय ने पांच करोड़ से अधिक राजकोष के गबन के मामले की गंभीरता को देखकर इसे अब अपने हाथ में ले लिया है और जांच करने वाले अधिकारी की जांच रिपोर्ट भी तलब की है।

देखना है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस वाले मुख्यमंत्री क्या वित्त विभाग में इन आरोपों पर कोई जांच कराकर कार्रवाई करते हैं ?

 

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