Wednesday - 15 July 2020 - 1:06 PM

नेता के लिए आपदा वाकई एक अवसर है

सुरेन्द्र दुबे

आपदा आने पर लोगों को शांत हो जाना चाहिए। फूंक फूंक कर कदम उठाने चाहिए। ऐसा हम सब सोचा करते थे। आपदा को अवसर में बदल सकते हैं। ऐसा हमारे प्रधानमंत्री ने बताया। हम बड़े हैरान थे कि ऐसा कैसे हो सकता है।

वैसे मोदी जी तमाम काम बगैर बताए ही करते हैं ताकि जनता हतप्रभ रह जाए और तालियां बजाने लगे। जब तक जनता समझेगी तब तक भक्त बेहोश हो जाएंगे और बाद में उनके पास हाथ मलते रह जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाएगा।

पिछले कई वर्षों से हम समझ रहे थे कि मोदी जी जो कहते है वो करते नहीं। जैसे उन्होंने कहा था काला धन वापस लाएंगे जिससे हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख रुपए आ जाएंगे। 15 लाख रुपए तो नहीं आए पर विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे लोग काला धन लेकर भाग गए। अगर उन्हें पता होता कि ये सब तो जुमलेबाज़ी है तो ये लोग देश छोड़ कहीं नहीं जाते।

मोदी ने कहा था कि अच्छे दिन आएंगे। लोग फिर धोखा खा गए। उनका मतलब था कि पितृ पक्ष के बाद अच्छे दिन आएंगे। अब लोग अगर मूर्ख है या बन जाते हैं तो इसमें कोई क्या कर सकता है।

एक और नारा याद दिलाते हैं। सबका साथ सबका विकास। अच्छे लोगो ने समझा कि उनके दिन बहुरने वाले हैं। सो लट्टू की तरह नाचने लगे। सबका का मतलब भ्रष्ट, कामचोर और काला बजारियों सहित सबसे था।आखिर सबने वोट दिया था। तमाम नासमझ इस बात को समझ नहीं पाए। अब जब समझ गए हैं तो मुंह फुलाए बैठे हैं। ये भी कोई बात हुई। 70 साल से वोट देते चले आ रहे हैं। इन ससुरों को इतनी बात अभी तक समझ में नहीं आई कि नेता की हर बात को सीरियसली नहीं लिया जाता है। लगता है कि हमारा लोकतंत्र अभी तक परिपक्व नहीं हुआ है और लोग नेताओं की बातों का मर्म समझ नहीं पाए हैं।

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नेता बीच बीच में जनता की परीक्षा लेता रहता है। इससे उसे जनता के मूर्ख बनने की काबिलियत का पता चलता रहता है। सो इस बार प्रश्नपत्र बदल दिया गया। मोदी ने कहा कि आपदा को अवसर में बदल देना है। जनता मुस्कराई। सोचा हमें मूर्ख समझते हैं। पिछले 6 वर्षों से देख रहे है। जो कहते हैं कभी नहीं करते हैं। पर इस बार जो कहा वह करके दिखा दिया। लोकतंत्र फिर बदनाम हो गया। नेता का नाम हो गया।

मोदी जी का आपदा को अवसर में बदलने का सिलसिला जारी है। पिछले 18 दिन से पेट्रोल और डीजल के दाम थोड़ा थोड़ा करके बढ़ाते जा रहे है। अब डीजल का दाम पेट्रोल से ज्यादा हो गया है। सरकार ने दिमाग लगाया कि लोगों के पास काम धंधा तो है नहीं इसलिए पेट्रोल तो ज्यादा बिकेगा नहीं इसलिए डीजल के पीछे पड़ गए। डीजल तो किसानों को चाहिए ही चाहिए। ट्रक और हैवी गाडियां डीजल को कैसे ठेंगा दिखाएंगी। जनता तो भूखी भी रह सकती है। पर सरकार तो भूखी नहीं रह सकती। सो टैक्स बढ़ा कर पैसा जुटाने में लग गई। भूखी जनता किस किस बात के लिए सरकार विरोधी नारे लगाएगी। सो आपदा को अवसर में बदल लिया।

कोरना काल में रैली करना मुश्किल है सो वर्चुअल रैलियां शुरू कर दीं। बिहार में आपने देखा कि चुनाव का शंखनाद वर्चुअल रैलियों से कर दिया। एक दिन का खर्चा 150 करोड़ से ज्यादा आया। अब विपक्ष सोचे कि वह इतना पैसा कहां से लाएगी। अब समझ में आया कि आपदा को अवसर में कैसे बदला जाता है। प्रवासी मजदूर नाराज़ थे कि सरकार ने घर पहुंचने में उनकी कोई मदद नहीं की। वे सब बेरोजगार चल रहे है। सरकार ने फिर दिमाग लगाया। दूसरे बेरोजगारों के बारे में सोचने के बजाय 125 करोड़ प्रवासी मजदूरों को नौकरी देने का बैंड बजाने शुरू कर दिया। कोई इनसे पूछे कि अगर उत्तर प्रदेश में इतने अवसर होते तो ये मजदर दूसरे राज्यों में जाते ही क्यों। सरकार ने यह नहीं कहा है कि वह स्वयं रोजगार देगी। रोजगार निजी क्षेत्र में दिलवाएगी। यानी सरकार अब एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज का काम करेगी।

अब अगर एक वर्ष तक यह दांव चल गया तो उत्तर प्रदेश में 2022 के विधान सभा के चुनाव में तो कुछ फायदा हो ही सकता है। हालांकि कुछ मजदूर इस झांसे को समझ रहे हैं। उन्होंने मुंबई वापस लौटना शुरू कर दिया है। क़ल जो होगा देखा जायेगा। अभी तो आपदा को अवसर में बदल लिया। पढ़े लिखे लोगों को नौकरी दिलाने से निजात पा ली। विरोध करोगे तो मजदूर विरोधी कहलाओगे। मजदूर तो कहीं ना कहीं रोजगार ढूंढ़ ही लेगा। सरकार के भरोसे भूखा थोड़े है बैठा रहेगा।

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(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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