Tuesday - 26 January 2021 - 2:43 AM

बिहार के चुनाव में कितना कारगर साबित होगा दलित कार्ड !

अविनाश भदौरिया

बिहार के चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों ने एकबार फिर दलित कार्ड खेलने की कोशिश शुरू कर दी है। बात एनडीए की हो या महागठबंधन की। इस दलित कार्ड के खेल में अपनी बाजी आजमाने में किसी दल ने कोई कसर नही छोड़ी है। जहां जेडीयू पहले ही जीतन राम मांझी को अपने साथ कर चुका है और अशोक चौधरी को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया है वहीं आजेडी ने भी जेडीयू से निकाले गए श्याम रजक की घर वापसी करवा ली है। इसके आलावा बसपा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष भरत बिंद को भी तेजस्वी यादव ने पार्टी की शपथ दिला दी है।

चंद्रशेखर रावण वहां अपने आजाद बहुजन समाज दल से उम्मीदवार उतारने वाले हैं। चिराग ने जेडीयू से पल्ला छुड़ा लिया है। इसके आलावा महागठबंधन से अलग हुए रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने हाथी की सवारी कर ली है तो कांग्रेस ने तो शायद पूरा खेल इसी दांव पर खेलने का मन बना लिया है।

कांग्रेस ने एक ओर जहां अपने दलित चेहरे उदित राज को मैदान में उतार दिया है तो वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के हाथरस कांड को लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सड़क पर उतरकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है। कांग्रेस ने दलित की बेटी के इंसाफ के लिए आवाज बुलंद कर यूपी के साथ-साथ बिहार के चुनाव पर फोकस किया हुआ है। जिस तरह कांग्रेस कार्यकर्ता हाथों में बाबा साहब अंबेडकर की तस्वीर, गले में नीला गमछा और जय भीम का नारा लगाते साथ चलते दिखे हैं उसके पीछे राजनीतिक मायने हो तो इसमे कोई बड़ी बात नहीं है।

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बता दें कि राहुल-प्रियंका को हाथरस जाने से रोकने को लेकर बिहार के कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह ने यूपी के मुखिया पर जमकर नाराजगी दिखाई है। अब ऐसे में यह देखना बाकी है कि बिहार में हाथरस की हवा का असर क्या होता है और दलित-महादलित वोटबैंक फिर से प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा या नहीं ?

कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके पत्रकार प्रवीन बागी का इस विषय में कहना है कि बिहार चुनाव में दलितों का मुद्दा उतना प्रभावी नहीं है क्योंकि वहां ऐसी कोई स्थिति नहीं है कि उन पर बड़ा अत्याचार हो रहा हो। साथ ही जो लोग दलित नेता के तौर पर खुद को पेश कर रहे हैं उनकी अपने समाज में बहुत गहरी और व्यापक पकड़ नहीं है। इनमे से ज्यादातर नेताओं की छवि दलबदलू की भी है। ऐसे में इनके इधर-उधर जाने से कोई खास असर नहीं होने वाला है।

उन्होंने यह भी बताया कि राज्य में दलित वोटबैंक का बड़ा हिस्सा पहले से ही एनडीए के साथ है ऐसे में महागठबंधन को कोई खास लाभ इस मुद्दे से होगा ऐसा मुश्किल लगता है।

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प्रवीन बागी का कहना है कि बिहार चुनाव में दो मुद्दे ही सबसे ज्यादा चर्चा में हैं पहला विकास का मुद्दा और दूसरा रोजगार का मुद्दा। उन्होने बताया कि एनडीए लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि पुरानी सरकार की तुलना में राज्य में विकास हुआ है और आगे और अधिक विकास होगा वहीं तेजस्वी यादव लगातार रोजगार के मुद्दे को लेकर नीतीश सरकार को घेर रहे हैं।

बिहार में 16 फीसदी है दलित वोट बैंक

बता दें कि बिहार में दलित वोट बैंक 16 फीसदी है। लगभग इतनी ही संख्या मुस्लिम वोट बैंक की है। यादव वोट बैंक 12 फीसदी है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में दलित समुदाय बड़ी संख्या में बीजेपी और एनडीए को वोट करता रहा है। बिहार की राजनीति में बीजेपी के वोट बैंक में सवर्ण, बनिया और पिछड़ी जातियों समेत दलितों का वोट काफी निर्णायक रहा है। हालांकि, एक दौर में कांग्रेस का यह परंपरागत वोट रहा है।

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