मेरठ का बदलता सियासी मिजाज: 1857 बनाम आज

उत्कर्ष सिन्हा 
1857 के गदर की जमीन थी मेरठ , मंगल पांडेय ने यहीं पर बगावत की थी।  मसला कारतूसों की चर्बी का था।  सवाल हिन्दू मुसलमान दोनों का  था।   गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूसों ने  दोनों समुदायों को आहत किया था।  तो दोनों साथ मिल कर अंग्रेज कंपनी के खिलाफ लडे।  लेकिन वही मेरठ फिलहाल हिन्दू मुस्लिम वोटो में बटा है।  बीते 2 दशकों में हुए करीब हर चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही यहाँ के हार जीत का फैसला करता है।
2013 में जब पश्चिमी यूपी  सियासी पहल से हुए दंगों की आग में जला था तो भाजपा के युवा नेता संगीत सोम , कट्टर  हिंदुत्व के पोस्टर ब्वाय बन कर उभरे थे।  कुछ वक्त पहले ही  शार्ली ऐब्दो के कार्टूनिस्ट को मारने वाले को 51 करोड़ रुपए का इनाम का ऐलान करने वाले हाजी याकूब कुरैशी  भी कट्टर इस्लाम के नायक बनने की फिराक़  में थे।  ये 21 वी शताब्दी का मेरठ था।
मगर मेरठ में सांप्रदायिक विभाजन हमेशा से ऐसा नहीं रहा।  मंगल पाण्डे से करीब सौ साल पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ था।  मगर तब मसला हिन्दू बनाम मुसलमान नहीं बल्कि मुसलमान बनाम क्रिश्चियन था।
मेरठ की एक तहसील है सरधाना।  सरधाना  फिलहाल संगीत सोम की वजह से खबरों में रहता है।  लेकिन यहाँ एक शानदार चर्च भी है।  बेगम समरू का चर्च। समरू एक खूबसूरत कश्मीरी नर्तकी थी।  सन 1767 में 15  साल की समरू पर एक अंग्रेज वॉल्टर रेनहार्ट सोम्रे  का दिल आ गया और समरू बेगम समरू बन गई।  वाल्टर की मौत के बाद समरू ने सरधना की गद्दी सम्हाली और एक कामयाब लम्बा शासन किया।  इसी दौरान समरू ने चर्च बनवाया। ये चर्च इटालियन और इस्लामिक आर्किटेचर के मिश्रण का खूबसूरत नमूना है।  
बेगम ने चर्च तो बनवाया मगर उनकी मौत के बाद क्रिश्चियन्स ने उनका फ्यूनरल ईसाई विधि से नहीं होने दिया। उन्हें क्रिश्चियन मानने से ही इंकार कर दिया गया।  समरू का चर्च आज भी आबाद है और वहाँ विशप अपनी प्रार्थना भी नियमित करते हैं।  लेकिन चर्च बनवाने वाली समरू सांप्रदायिक सियासत का शिकार हो गई।
आजाद हिन्दुस्तान में जब लोकतंत्र ने चुनावी शक्ल में अपना आगाज किया तो मेरठ के हिस्से में गर्व आया।  नेता जी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिन्द फ़ौज के जनरल शाहनवाज यहाँ से पहले सांसद बने।  1952 से 62 तक कांग्रेस के टिकट पर जनरल शाहनवाज लगातार तीन बार सांसद चुने गए।  लेकिन  1967 के लोकसभा चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के महाराज सिंह भारती ने  उन्हें हरा दिया।  1971 में जनरल शाहनवाज  ने फिर जीत हासिल की और चौथी बार सांसद चुने गए।
मेरठ की सीट पर भाजपा की कामयाबी 1991 में राम लहर  पर सवार हो कर आई । 1991, 1996 और 1998 के चुनावों में अमरपाल सिंह ने भाजपा के टिकट पर लगातार तीन बार जीत दर्ज की। यही वक्त था जब मेरठ के वोटो का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तेज होने लगा। लक्ष्मी कान्त बाजपेई के रूप में यहाँ भाजपा को एक तेज तर्रार नेता मिला।  बाजपेई यहाँ से विधायक चुने जाते रहे।  जब लक्ष्मीकांत बाजपेई को यूपी भाजपा की कमान मिली तो यूपी में भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी थी। बाजपेई की मेहनत ने पार्टी को खड़ा  तो किया लेकिन 2017 में जब यूपी में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो बाजपेई अपनी सीट ही हार गए।
गाय और बूचड़खाने मेरठ की  सियासत का अहम् हिस्सा बन चुके हैं। वैध और अवैध बूचड़खाने यहाँ रोजगार के बड़े केंद्र हैं। योगी सरकार ने जब गो वंश के व्यापर पर रोक लगाई तो उसका बड़ा असर मेरठ पर भी पड़ा।  बूचड़खानों की बंदी ने बड़े पैमाने पर मांस कारोबार को तो प्रभावित किया ही साथ ही मेरठ के दूसरे बड़े व्यापर को भी अपनी जद में ले लिया है। 
मेरठ में खेलों के सामान का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है  और  इस उत्पादन के लिए चमड़े की बहुत जरुरत होती है।  बूचड़खाने  बंद हुए तो चमड़े की उपलब्धता भी कम हो गयी है।  इसका असर रोजगार पर भी पड़ा है।
मेरठ के मैदान में इस बार भी वोटो का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण होने से इंकार करना थोड़ा मुश्किल है।  मुकाबला फिलहाल भाजपा और बसपा – सपा गठबंधन के बीच ही दिखाई दे रहा है।  लम्बे समय से कांग्रेस यहाँ अपनी जमीन तलाशने की कोशिश में है।  इस कोशिश में एक बार फिल्म ऐक्ट्रेस नगमा  को भी मैदान में उतारा गया था।  मगर कामयाबी नहीं मिली।
इस बार का चुनाव कैसा होता है ये तो देखना अभी बाकी है, लेकिन अगर मेरठ इस बार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बाहर निकल पाया तो पश्चिमी यूपी के नतीजों में भी बड़ा फर्क आना तय है।

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