Monday - 30 January 2023 - 6:00 PM

बिहार में फिर नहीं मिली महिलाओं को जगह

प्रीति सिंह

39 सीट = 36 पुरुष + 3 महिला
प्रतिशत में बात की जाए तो 39 सीट पर 7.69 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी। बिहार में एनडीए ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए 39 सीटों के प्रत्याशियों की घोषणा की जिसमें मात्र 3 महिलाओं का नाम है। यदि वर्र्तमान में महिला आरक्षण विधेयक वजूद में होता तो निश्चित ही यह संख्या ज्यादा होती और सदन में भी आधी आबादी की भागीदारी बढ़ती, पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है।
40 लोकसभा सीट वाले बिहार में बीजेपी 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाकी सीटों पर उसके सहयोगी दल लड़ रहे हैं। बीजेपी की 17 सीट में से सिर्फ एक सीट पर महिला उम्मीदवारी है। बाकी सहयोगी दल जेडीयू और एलजेपी ने भी एक-एक सीट पर महिला प्रत्याशी को उतारा है।

बराबरी तो दूर 33 प्रतिशत भागीदारी भी मुश्किल

बिहार में महिलाओं की आबादी बढ़ी, साक्षरता दर बढ़ी लेकिन राजनीतिक हल्कों में उनकी भागीदार आज भी वैसे ही है जैसे दो दशक पहले थी। 2011 जनगणना के अनुसार बिहार की कुल जनसंख्या 10,40,99,452 है जिसमें महिला जनसंख्या 4,98,21,295
है। कुल जनसंख्या में महिलाओं का हिस्सा 47.86 प्रतिशत है। वहीं बिहार की कुल साक्षरता दर 61.80 प्रतिशत है, जिसमें महिला साक्षरता दर 51.5 प्रतिशत है। 2001 में बिहार की महिला साक्षरता दर 33 प्रतिशत थी।

दोयम दर्जे का व्यवहार करते है राजनीतिक दल

महिलाओं को टिकट देने में राजनीतिक दल हमेशा दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं। वैसे महिलाओं को आगे लाने की बात करेंगे, उनकी भागीदारी बढ़ाने की बात करेंगे लेकिन अब सच में उनके लिए कुछ करने का समय आता है तो हाथ पीछे कर लेते हैं। वैसे महिला आरक्षण विधेयक की वकालत करेंगे लेकिन जब टिकट देने की बारी आती है तो 33 प्रतिशत भी नहीं दे पाते। कोई दल 10 प्रतिशत देता है तो कोई 12। ऐसा ही दशकों से होता आ रहा है।

महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संजीदा नहीं है राजनीतिक दल

राजनीतिक दलों की दोयम दर्जे की मानसिकता का ही नतीजा है कि आज तक महिला आरक्षण विधयेक पारित नहीं हो पाया। अक्सर देखने में आया है कि सत्ता पक्ष विरोधी दलों पर आरोप लगा देती है कि उनकी वजह से विधेयक पारित नहीं हो पाया। उन्होंने सहयोग नहीं किया। हालांकि कांग्रेस ने विधेयक पारित करने की कोशिश की लेकिन सांसदों का संख्याबल कम होने की वजह से पास नहीं करा पायी। यही कारण है कि 1996 से यह विधेयक निचली सदन में लटका हुआ है। 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ आई बीजेपी ने भी इसे पास कराने का प्रयास नहीं किया जबकि ये उसके चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था।

2014 में बीजेपी ने दो महिलाओं को दिया था टिकट

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा दो सहयोगी दलों के साथ चुनाव मैदान में थी। लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी। भाजपा ने 2014 में 30 सीटों पर चुनाव लड़ा। लोजपा सात और रालोसपा ने तीन सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे। भाजपा ने उस दौरान दो महिला प्रत्याशियों पर विश्वास जताया। शिवहर से रमा देवी और बांका से पुतुल देवी को टिकट दिया। पुतुल देवी चुनाव हार गईं, जबकि रमा देवी ने अपनी सीट निकाल ली।

रमा देवी

लोजपा ने सात सीटों में से एक सीट पर महिला प्रत्याशी उतारा। लोजपा ने मुंगेर से सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी को अपना प्रत्याशी बनाया। वीणा देवी लोजपा के लिए तुरुप का पत्ता साबित हुईं। रालोसपा को इस चुनाव में तीन सीटें मिलीं, मगर पार्टी ने किसी महिला प्रत्याशी को मैदान में नहीं भेजा। जबकि बिहार पहला ऐसा राज्य है जहां, महिलाओं को नौकरियों में 38 प्रतिशत और पंचायत चुनाव में 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है।

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