राजीव त्यागी की मौत के बाद तो टीवी डिबेट के तौर-तरीकों पर डिबेट करो !

बहुत हो गया, डिबेट के नाम पर दंगल और अखाड़ा बंद करें !

नवेद शिकोह

एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया देश के न्यूजं चैनल्स की एक जिम्मेदार एसोसिएशन है। इसे कुछ तो कोशिश करनी चाहिए है। शर्म नहीं आती जब डिबेट में मार-काट और मां-बहन की गालियों की नौबत आ जाती है। पैनलिस्ट हांफते हुए स्टूडियो से निकलते हैं।

कभी कोई स्टूडियो से ही गिरफ्तार हो जाता है। कोई स्टूडियो से हांफता हुए निकलता है। किसी का बी पी बढ़ जाता है।दंगल से बाहर निकलते ही किसी को हार्ट अटैक पड़ जाता है। तो कोई राजीव त्यागी की तरह मौत का शिकार हो जाता है।

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टीआरपी के लिए ये सब तमाशा कब तक चलेगा। पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों का बलात्कार कब तक होता रहेगा। माना डिबेट न्यूज मीडिया का एक आयाम है। अब से चालीस बरस पहले जब भारत में सैटेलाइट न्यूज चैनल्स का नामोंनिशान नहीं था। सिर्फ दूरदर्शन था, जिसमें स्वस्थ और शालीन डिबेट होती थी। इंफारमेटिव/जानकारीपरक विषय होते थे। डिबेट तमाशे की तरह नहीं होती थी।

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अब तो ज्यादातर चैनलों में बाकायदा मारकाट और चीख-पुकार का ग्राउंड तैयार किया जाता है। डिबेट शो के नाम ही दंगल और अखाड़ा जैसे होते हैं। एंकर योजनाबद्ध तरीके से पैनलिस्ट को आपस में लड़वाने का माहौल बनाता है। गेस्ट कार्डिनेटर अपने विवेक से तय करता है कि ऐसे लोगों को आमने-सामने किया जाये जो एक दूसरे पर बरस पड़ें।

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यही सब कारण हैं कि एक बार नहीं, दर्जनों बार टीवी चैनलों के डिबेट शो में मारपीट और गालमगलौज जैसा माहौल बनता रहा है। आज एक डिबेट तो बेहद मनहूस रही। चीख-पुकार वाली गरमागरम डिबेट के बाद स्टूडियो से निकलने के बाद एक पैनलिस्ट को हार्ट अटैक पड़ा और उनका देहांत हो गया। मीडिया संगठनों और सरकार को चाहिए है कि इस दिशा में अब तो कुछ तो फिक्र करें।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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