नेपाल : एक पार्टी के दो नेताओं के अलग रास्ते ?


डा. उत्कर्ष सिन्हा
नेपाल की सत्ताधारी राष्ट्रीय स्वराज पार्टी (RSP) के दो प्रमुख नेताओं—प्रधानमंत्री बालेन्द्र बालेन शाह और पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने के बीच सार्वजनिक रुखों का यह अलगाव अब केवल द्विपक्षीय कूटनीति का प्रश्न नहीं रहा बल्कि यह पार्टी की आंतरिक दिशा और नेतृत्व अस्थिरता का चिंतनीय चेहरा भी दिखा रहा है। नेपाल के प्रधान मंत्री बालेन शाह के बयान और उसके साथ ही सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने की भारत आ कर शीर्ष भाजपा नेताओं से मुलाकात करना क्या एक सोची हुयी रणनीति है ? या फिर दोनों नेताओं के सोच का अन्तर ?
कुछ ही दिनों पहले नेपाल के प्रधानमंत्री शाह ने संसद में बयान दिया कि “भारत ने भी नेपाली क्षेत्र पर कब्जा किया है और नेपाल ने भी भारत के क्षेत्र पर कब्जा किया है,” जिससे सीमा-विवाद का मुद्दा फिर से गरमा गया और भारत के साथ द्विपक्षीय संवाद की जटिलता और बढ़ गयी । इसी दौरान, उन्होंने भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मिलने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और परंपरागत व्यवस्था तोड़ते हुए भारतीय राजदूत से पहली मुलाकात भी नहीं की जो भारत के लिए चिंताजनक बात थी। नेपाल के प्रमुख अखबार काठमांडू पोस्ट ने इसे “दूरी बनाने की रणनीति” कहा और टिप्पणी की कि “नई नेपाली सरकार भारतीय विदेश सचिव के दौरे को रद्द करके संकेत दे रही है कि वह समान श्रेणी के कूटनीतिकियों के साथ ही बात करना चाहती है” ।
दूसरी ओर, RSP अध्यक्ष रवि लामिछाने ने 1–5 जून 2026 तक भारत की पांच दिवसीय यात्रा पर गए और BJP अध्यक्ष नितीन नबिन के आतिथ्य में दिल्ली में उच्च-स्तरीय राजनीतिक व कूटनीतिक मुलाकातें की । दोनों घटनाएँ संकेत है कि एक ही पार्टी के दो नेता अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े दिखते हैं—शाह कठोर, राष्ट्रीयवादी और भारत से दूरी की राजनीति कर रहे है, जबकि लामिछाने विकास-कूटनीति और भारत-संबंधों को मजबूत करने की वकालत ।
यह विरोधाभास केवल कूटनीतिक तस्वीर में ही नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिकता के सवालों में भी केंद्रित है। लामिछाने स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे हैं—उन पर सहकारी संस्थाओं से करोड़ों के रिजर्व फंड के हिसाब में गड़बड़ी के आरोप लगे और अप्रैल 2025 में उन्हें जेल भेज दिया गया था । अब उनकी भारत यात्रा और BJP नेताओं से मिलना आशंका बढ़ाता है कि राजनीतिक सहूलियत और व्यक्तिगत संरक्षण के लिए पारंपरिक राजनैतिक नेटवर्क अभी भी कितने मायने रखते हैं।
काठमांडू पोस्ट के कॉलमनिस्ट पबन राज पांडे ने इसे स्पष्ट रूप से उजागर किया: “शाह और लामिछाने दोनों मजबूत व्यक्तित्व और महत्वाकांक्षा रखते हैं। यह एक ही म्यान में दो तलवारें फिट करने जैसा है…अनिश्चितता और अविश्वास के बीज अंदरूनी व बाहरी तत्वों द्वारा बोए जाएंगे, जो RSP के लिए सबसे बड़ा जोखिम है” ।
नेपाली मीडिया ने इस विभाजन को तेजी से पकड़ा है। काठमांडू पोस्ट के संपादकीय “Balen era begins” में लिखा गया है: “RSP अध्यक्ष लामिछाने और प्रधानमंत्री शाह को हाथ-मिलाने चाहिए ताकि सरकार स्थिर रहे और RSP का पदसमूह संसद व ‘घंटी घर’ में एकजुट रहे” ।
यहाँ एक और जटिल परत भ्रष्टाचार और नैतिक शुद्धिकरण की बहस है, जिसमें शाह की छवि ‘कठोर सुधारक’ की है जो पुरानी राजनीति के धागों को काटना चाहता है। शाह का जनआधार और भ्रष्टाचार-विरोधी रुख उन मतदाताओं के लिए आकर्षक रहा है जो पारंपरिक राजनीतिक परिवारों से तंग आ चुके थे । लेकिन, पार्टी के भीतर दूसरा प्रभावशाली चेहरा—लामिछाने—खुद भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में है और वह अलग तरीके की कूटनीति अपना रहे है, तो शाह की नैतिकता की मांग कमजोर दिखाई दे रही है।
द्विपक्षीय संबंधों के क्षेत्र में भी यह विभाजन जोखिम भरा है। नेपाल और भारत के बीच ऐतिहासिक एवं आर्थिक संबंध इतने जटिल और गहरे हैं कि यहां भावनात्मक या सैद्धांतिक रूप से कठोर रुख लंबे समय तक टिक न पाएँगे। सीमाओं, आपूर्ति श्रृंखलाओं और श्रम गतिशीलता जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर नेपाल को भारत के साथ समन्वय की आवश्यकता है।
यह विडंबना भी है कि RSP का राजनीतिक ब्रांड—जो जनता को स्वराज और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सशक्त कदमों का आश्वासन दे रहा था वह अब अपने भीतर ही उन सवालों को पनपने दे रहा है जिनसे ब्रांड की ही विश्वसनीयता कमजोर हो रही है ।
अब यह सवाल नेपाल और भारत के भीतर भी उठने लगे हैं कि RSP सार्वजनिक मंचों पर स्पष्ट करे कि प्रमुख विदेश नीति निर्णय किस तरह और प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाते हैं ? और क्या पार्टी की नीति एक व्यक्ति की भावना से चल रही है या सामूहिक नीति-निर्धारण से?
अंततः, राष्ट्रीय स्वराज पार्टी को अपनी साख बचने का समय उम्मीद से जल्दी आ गया है नहीं तो यह संभावना बनी रहेगी कि व्यक्तिगत पॉलिटिकल शो और दोहरे संदेश देश की दीर्घकालिक रणनीति और जनता के भरोसे को कमजोर कर देंगे । यदि शाह और लामिछाने दोनों समान रूप से पार्टी की नेतृत्व पर बने रहना चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक छवि के मेल और नीतिगत समन्वय के लिए तेज और पारदर्शी कदम उठाने होंगे—वर्ना राष्ट्रीय स्वराज पार्टी का वादा, जिस पर लाखों ने भरोसा किया, तात्कालिक शोरगुल की ही तरह धुँधला पड़ सकता है।



