सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शादीशुदा महिलाओं को योजनाओं से वंचित करना असंवैधानिक

देश की सर्वोच्च अदालत ने विवाहित महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक अहम और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी महिला को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं या लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
शादी के आधार पर भेदभाव गलत: सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि ऐसी सोच कि शादी के बाद बेटी अपने मायके से पूरी तरह अलग हो जाती है, संवैधानिक रूप से गलत और लैंगिक भेदभाव पर आधारित है। अदालत ने इसे समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया।
कुलसुम निशा मामले में आया फैसला
यह मामला उत्तर प्रदेश की कुलसुम निशा से जुड़ा है। उनकी मां एक उचित मूल्य की दुकान (राशन दुकान) का संचालन करती थीं, जिनका मार्च 2024 में निधन हो गया। इसके बाद कुलसुम ने अनुकंपा के आधार पर दुकान आवंटन के लिए आवेदन किया था।
हालांकि, सरकारी नियमों में “विवाहित बेटी” को परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया था, जिसके चलते उनका आवेदन खारिज कर दिया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी उनके खिलाफ फैसला दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया सरकार का तर्क
सुनवाई के दौरान सरकार ने कहा कि विवाहित महिलाएं आमतौर पर अपने ससुराल चली जाती हैं, इसलिए उन्हें योजना में शामिल करना मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह एक सामान्यीकृत धारणा है और इसके आधार पर किसी पूरे वर्ग को अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
4 हफ्ते में आदेश लागू करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि चार सप्ताह के भीतर कुलसुम निशा के पक्ष में उचित मूल्य की दुकान का आवंटन किया जाए।
महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और संवैधानिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में नीतियों और नियमों पर भी असर डाल सकता है।



