अनुभवहीन कूटनीति के जरिये नेपाल को कहाँ ले जा रहे हैं बालेन शाह ?


डा. उत्कर्ष सिन्हा
करीब दो महीने पहले नेपाल में धमाकेदार जीत के साथ प्रधानमंत्री पद सम्हालने वाले बालेन शाह अपनी चमक तेजी से खोते जा रहे हैं. संसद के सामने उनके पहले भाषण की लम्बे समय से प्रतीक्षा थी लेकिन करीब दो महीने बाद हुए उनके पहले भाषण ने ही न सिर्फ भारत में बल्कि नेपाल में ही बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है.
बालेन शाह के दो महीने के कार्यकाल ने ही नेपाली राजनीति और भारत-नेपाल संबंधों को गहरी असहजता में डाल दिया है। 30 मई 2026 को संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत-नेपाल सीमा विवाद पर एक ऐसा विवादित बयान दिया जिसने घरेलू राजनीति में भूचाल ला दिया। बालेन शाह ने कहा कि सीमा अतिक्रमण केवल भारत की ओर से नहीं हुआ है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है। यह पहली बार था जब किसी नेपाली प्रधानमंत्री ने आधिकारिक रूप से दोनों तरफ अतिक्रमण की बात संसद में स्वीकार की।
यह बयान सतही तौर पर ईमानदारी भरा लग सकता है, लेकिन गंभीरता से देखे तो यह उनकी कूटनीतिक अपरिपक्वता और अराजक राष्ट्रवाद का प्रतीक है। भाषण के फ़ौरन बाद ही नेपाल के अंदर तुरंत विरोध की लहर उठी। नेपाली कांग्रेस के व्हिप निश्कल राय ने इसे नेपाली गरिमा पर हमला बताया, पूर्व उप-प्रधानमंत्री नारायण काजी श्रेष्ठ ने इसे राष्ट्र-विरोधी करार दिया, और 10 छात्र संगठनों ने माफी की मांग की। विपक्ष ने इस्तीफे की मांग की और सदन में सरकार को घेरा। यह आंतरिक विरोध बालेन शाह की छवि को कमजोर करता है, जो खुद को Gen-Z क्रांति का चेहरा बताते हैं।
नेपाली मीडिया ने बालेन शाह के बयान पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। मीडिया के एक छोटे हिस्से ने कहा कि बालेन शाह ने ईमानदारी से सीमा समस्या को स्वीकार किया और यह पारदर्शी कूटनीति का उदाहरण है जिससे दोनों देशों को लाभ हो सकता है। लेकिन क्या बालेन शाह की भाषा कूटनीतिक रूप से सही है ? रोतोपती ने हेडलाइन बनाई – संसद में पहली बार बोलते ही विवादों में घिरे बालेन। कई मीडिया संस्थानों ने कहा कि सीमा मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है और इसे सावधानी से संभालना चाहिए। BBC News Hindi ने रिपोर्ट किया कि बयान ने दोनों देशों की कूटनीति में भूचाल ला दिया। यह मीडिया की प्रतिक्रिया स्वयं बालेन शाह की कूटनीतिक असमझदारी को दर्शाती है।
बालेन शाह की राजनीति पुरानी पार्टियों (नेपाली कांग्रेस, UML, माओवादी) के भ्रष्टाचार और अस्थिरता के खिलाफ Gen-Z आंदोलन पर टिकी थी। लेकिन सत्ता में आते ही वे वही पुरानी राष्ट्रवादी रणनीतियां अपनाते दिख रहे हैं जिसकी उन्होंने स्वयं आलोचना की थीं।
उनके अतीत में कई घटनाएं उनकी भारत-विरोधी छवि को मजबूत करती हैं। 2023 में उन्होंने अदिपुरुष फिल्म के संवाद पर भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध की मांग की, क्योंकि सीता को “भारत की बेटी” दिखाया गया था। उन्होंने 2023 में अपने कार्यालय में “ग्रेटर नेपाल” का मानचित्र लगाया, जो 1816 की सुगौली संधि से पहले के विस्तारित नेपाल को दिखाता था—इसमें लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से भी शामिल थे। 2025 में एक पोस्ट में उन्होंने भारत, चीन, अमेरिका और विपक्षी दलों के खिलाफ अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे बाद में हटा लिया। ये घटनाएं उनकी अस्थिरता, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और प्रतीकात्मक राष्ट्रवाद को उजागर करती हैं।
सुगौली संधि (1816) के आधार पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा पर भारत और नेपाल के बीच विवाद पुराना है। नेपाल महाकाली नदी के पूर्वी भाग को अपना बताता है, जबकि भारत इसे उत्तराखंड का हिस्सा मानता है। 2020 में नेपाल ने अपना मानचित्र संशोधित किया। हाल ही में भारत की कैलाश मानसरोवर यात्रा की घोषणा पर नेपाल ने आपत्ति जताई। बालेन शाह की सरकार ने इस मुद्दे पर मजबूत कूटनीतिक रणनीति बनाने के बजाय संसद में “दोनों तरफ अतिक्रमण” का बयान देकर स्थिति को जटिल बना दिया।
बालेन शाह की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी उनका दोहरा मानदंड है। वे भाषा तो जनतावादी बोलते हैं—भ्रष्टाचार मुक्त, युवा-केंद्रित शासन—लेकिन कूटनीति में अनुभवहीन और उग्र राष्ट्रवादी साबित हो रहे हैं। एक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी पड़ोसी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना है, खासकर जब नेपाल आर्थिक रूप से भारत पर अत्यधिक निर्भर है—खुले सीमा, व्यापार, ईंधन, खाद्य आयात, और लाखों नेपाली कामगार भारत में काम कर रहे हैं ।
इस राजनीति में स्वयं नेपाल के लिए कूटनीति के खतरे गंभीर हैं। पहला, भारत के साथ तनाव बढ़ने से सीमा अवरोध, व्यापार बाधाएं, और रेमिटेंस प्रभावित हो सकते हैं। दूसरा, नेपाल की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी—विपक्ष पहले ही इस्तीफे की मांग कर रहा है, और यदि बालेन की लोकप्रियता घटी जबकि Gen-Z समर्थन भी कम होने ही लगा है। तीसरा, भारत से दूरी बढ़ने पर नेपाल चीन की “बेल्ट एंड रोड” पर और निर्भर हो सकता है, जो संप्रभुता के लिए खतरा है। चौथा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल की विश्वसनीयता क्षतिग्रस्त होगी—एक प्रधानमंत्री जो प्रतीकात्मक मानचित्र और फिल्म प्रतिबंध पर ध्यान देता है, तो बड़े आर्थिक सुधार और स्थिरता पर कैसे काम करेगा?
बालेन शाह की भाषा और शैली पारंपरिक राष्ट्रवाद की है, लेकिन संदेश नया नहीं—यह पुरानी तनाव रेखाओं को फिर से खींच रहा है।
बालेन शाह की राजनीति फिलहाल राष्ट्रवाद की आड़ में अनियोजित कूटनीति प्रतीत होती है, न कि सच्ची जनतावादी सोच। यदि वे अनुभवी सलाहकारों के साथ संवाद-आधारित रणनीति अपनाते, तो वे नेपाल को नई दिशा दे सकते थे । लेकिन वर्तमान ट्रैजेक्टरी पर वे न केवल भारत-नेपाल संबंधों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि नेपाल की आर्थिक निर्भरता, आंतरिक एकता और अंतरराष्ट्रीय छवि को भी जोखिम में डाल रहे हैं।



