नेपाल चुनाव: बालेन शाह को लेकर खौफजदा हैं पुरानी पार्टियां

यशोदा श्रीवास्तव

इस बार के चुनाव में नेपाल को कैसी सरकार नसीब होती है, इसके कयास लगाए जाने लगे है।

किसी एक दल की पूर्ण बहुमत की सरकार को लेकर सभी के मन में शंका है। भारत में नेपाल के राजदूत रहे नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दीप कुमार उपाध्याय का साफ कहना है कि नेपाल के नसीब में किसी एक दल की स्थाई सरकार न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। नेपाल में लोकतंत्र बहाली के बाद से यह स्थिति बनी हुई है और यही कारण है कि नेपाल में लोकतंत्र को मजबूती नहीं मिल पा रही है।

इस बार भी और शायद आगे कुछ और सालों तक नेपाल में स्थाई सरकार दूर दूर तक नजर नहीं आती।

इस सबके बीच विकट परिस्थितियों में हो रहे इस चुनाव में प्रधानमंत्री पद के तीन बड़े चेहरों पर लोगों की निगाह टिकी हुई है। नंबर एक पर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के बालेन शाह हैं। दूसरे पर नेपाली कांग्रेस के गगन थापा और तीसरे नंबर पर एमाले के केपी शर्मा ओली हैं।

चुनाव आगामी पांच मार्च को है। मतों की गिनती सात मार्च को है। आठ या नौ मार्च तक नेपाल में नई सरकार का गठन हो जाएगा,बालेन शाह को लेकर पुरानी राजनीतिक दलों की सांसे अटकी हुई है।सवाल उठता है कि यदि किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो किस पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनेगी और इसमें कौन-कौन दल शामिल हो सकते हैं? यदि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सत्ता में नहीं आ पाती तो उसकी भूमिका क्या होगी?
पिछले चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को पूर्वी नेपाल में 20 सीटें हासिल हुई थी। यह काफी मायने रखता है क्योंकि बेहद कम समय में उदय होने वाली किसी भी पार्टी को मिली यह बड़ी सफलता है।

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि लामी छाने की कोई राजनीतिक पहचान नहीं थी। वे टीवी जर्नलिस्ट थे और एक न्यूज चैनल पर अपनी खास प्रस्तुति के जरिए नेपाल के युवाओं में खासा लोकप्रिय थे। 2022के चुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का गठन किया, चुनाव लड़े और बीस सीटों के साथ नेपाल प्रतिनिधि सभा में धमाके दार इंट्री की। ओली की गठबंधन सरकार में वे उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बने लेकिन इस पद पर बहुत दिनों तक टिक नहीं सके।

उन्हें अमरीकी नागरिकता विवाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पद छोड़ना पड़ा था लेकिन जितने दिन तक वे इस पद पर थे, ब्यूरो क्रेट और राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहे। बतौर गृह मंत्री उन्होंने कई बड़े अफसरों और सभी पार्टियों के बड़े बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार की जांच का आदेश देकर नेपाल की राजनीति में खलबली मचा दी थी।

हालांकि बाद में वे अमरीकी नागरिकता विवाद से मुक्त हो कर फिर प्रतिनिधि सभा में वापस आए लेकिन तब तक वे अन्य राजनीतिक दलों की आंख की किरकिरी बन चुके थे। हां अपनी छोटी सी राजनीतिक यात्रा में उनकी शिनाख्त एक इमानदार और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले नेता की हो चुकी थी। हालांकि धोखाधड़ी के एक मामले में वे स्वंय कानूनी जंग लड़ रहे हैं।

जेन जी आंदोलन के बाद अंतरिम सरकार के नेतृत्व में हो रहे इस चुनाव में सुडान गुरूंग के साथ काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह भी रवि लामी छाने के साथ आ गए।

सुडान गुरूंग जेन जी आंदोलन के नायक के रूप में जाने जाते हैं, वहीं बालेन शाह की पहचान एक रैपर और इंजीनियर की है। उन्होंने निर्दल लड़ कर काठमांडू नगर निगम के मेयर पद का चुनाव जीता था। बतौर मेयर उन्होंने अपने कार्यालय में ग्रेटर नेपाल का मानचित्र लगा कर राष्ट्र वादी नेता की छवि धारण करने की कोशिश की थी।

जेन जी आंदोलन के बाद जब अंतरिम सरकार के गठन की नौबत आई तो जेन जी का एक धड़ा बालेन को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में था जो फलीभूत नहीं हो सका। अब जब बालेन शाह राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में झापा क्षेत्र संख्या पांच से एमाले अध्यक्ष और पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं तो संभावित प्रधानमंत्री के रूप में उनकी चर्चा लाजिमी है।नेपाल के इस चुनाव का परिणाम वैश्विक स्तर पर भी खास है।

क्योंकि पूर्व की परंपरावादी राजनीतिक दलों की हालत बहुत बेहतर नहीं है। पुरानी पार्टी में एक नेपाली कांग्रेस है जिसके ठीक-ठाक प्रदर्शन की उम्मीद है लेकिन यह पार्टी भी अब नए नेतृत्व के अधीन है। भारी अंतर्विरोध के बीच वरिष्ठ नेता गगन थापा को नया अध्यक्ष चुना गया है।

गगन थापा अपनी पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा हैं। नेपाली कांग्रेस के भी अकेले दम पर सत्ता में आने की संभावना नहीं है फिर भी इस पार्टी के नए अध्यक्ष के रुख को लेकर चर्चा होती रहती है। हालांकि उन्होंने साफ कहा है कि नेपाल भारत और चीन के मध्य स्थित है इसलिए इसे दोनों देशों से संतुलन बना कर ही आगे बढ़ना होगा। गगन थापा के इस कथन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सकारात्मक दृष्टि से देखा गया। भारत और चीन दोनों के लिए गगन थापा का बयान मायने रखता है। लेकिन शेर बहादुर देउबा अथवा कोइराला परिवार के बिना चुनाव मैदान में उतरी नेपाली कांग्रेस का प्रदर्शन इस चुनाव में कैसा होता है,यह देखना जरूरी होगा।

2022 के चुनाव में नेपाली कांग्रेस 89 सीटें जीत कर सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर सामने आई थी। आज जिन परिस्थितियों में यह चुनाव हो रहा है, उसे देख ऐसा नहीं लगता कि नेपाली कांग्रेस 2022 के चुनाव परिणाम को दोहरा पाएगी?

और यदि ऐसा हो पाया तो निसंदेह यह गगन थापा की बड़ी कामयाबी होगी,और तब उनकी सरकार की संभावना बढ़ सकती है।

नेपाल में मतदान के बहुत कम दिन शेष है। ऐसे में जब सरकार गठन की बात चलती है तो मध्य नेपाल अर्थात मैदान और पहाड़ के बीच के हिस्से में एमाले की चर्चा भी खूब हो रही है। एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली गठबंधन की ही सही चार बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं।

इस बार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार बालेन शाह से उनका मुकाबला बेहद कड़ा है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अंदरूनी सर्वे में यह सीट बालेन शाह जीत रहे हैं लेकिन इस क्षेत्र के लोगों की मानें तो यह इतना आसान भी नहीं है।

2022 में एमाले को 78 सीटों पर जीत मिली थी। वह दूसरा सबसे बड़ा दल था इसके बाद प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी केंद्र था जिसके 32 सदस्य चुने गए थे।

2022 के प्रतिनिधि सभा में रवि लामी छाने की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी 20 सीटों के साथ तीसरे नंबर की बड़ी पार्टी थी और सरकार में हिस्सेदारी के तौर पर इस पार्टी को एक उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का पद आया था,इन दोनों पदों पर पार्टी अध्यक्ष रवि लामी छाने स्वयं काबिज थे।

जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है तो यह शेर बहादुर देउबा,ओली और प्रचंड के हिस्से में आता रहा। इस बार वेशक राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की धूम है लेकिन प्रतिनिधि सभा के 165 और उच्च सदन के 110 यानी 275 सीटों में से बहुमत का आंकड़ा जुटा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं जान पड़ता। फिर भी चाहे नेपाली कांग्रेस हो, एमाले हो या माओवादी केंद्र, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को लेकर खौफजदा तो हैं, इनमें इस बात को लेकर खौफ है कि खुदा न खास्ता राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सत्ता में आ गई तो उक्त तीनों पार्टियों के ढेर सारे बड़े नेताओं का जेल जाना तय है क्योंकि भ्रष्टाचार के बड़े बड़े मामले में उनके हाथ सने हुए हैं। बीच चुनाव खबर यह भी है कि इस खौफ से उबरने के लिए नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी केंद्र के अंदरखाने कुछ और ही खिचड़ी पक रही है जिसका प्रकटीकरण चुनाव परिणाम के बाद ही संभव है।

पिछली गठबंधन सरकारों में मधेश की पार्टियों की भी भूमिका अहम रहती रही। उपेन्द्र यादव जो मधेश क्षेत्र के बड़े मधेशी नेता रहे हैं। प्रतिनिधि सभा में उनकी पार्टी जनता समाजवादी पार्टी के 12 सदस्य थे। इन सदस्यों के साथ उपेंद्र यादव भी कोई न कोई बड़ा पद हथियाते रहे हैं।

इस चुनाव में तो मधेश आधारित पार्टियों का हाल यह है कि वे अलग-अलग गठबंधन में चुनाव लड़ रहे हैं इससे उनकी हालत बेहतर नहीं है। एक दम बदले हुए माहौल में हो रहे चुनाव में उनका एजेंडा ही गायब है। सीटों की बात करें तो वे अपना अस्तित्व बचा ले जायें,यही बड़ी बात है।

Related Articles

Back to top button