तैंतीस प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए अभी भी एक सुनहरा स्वप्न


कृष्णमोहन झा/

मोदी सरकार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जो तीन विधेयक गत दिवस संसद में पेश किए थे उनमें संविधान संशोधन विधेयक को दो तिहाई बहुमत से पारित कराने में वह असफल रही। इसके बाद उसने परिसीमन और केंद्र शासित कानून संशोधन विधेयक भी वापिस ले लिए। यह कतई आश्चर्य का विषय नहीं है। दरअसल संविधान संशोधन विधेयक पारित न होने के बाद शेष दो विधेयकों पर मतदान का कोई औचित्य ही नहीं था क्योंकि ये दोनों विधेयक संविधान संशोधन विधेयक से ही जुड़े हुए थे। यद्यपि वर्तमान सदन में एनडीए के संख्या बल को देखते हुए मोदी सरकार को यह भलीभाँति मालूम था कि इस संविधान संशोधन विधेयक का यही हश्र होना तय है।

फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी सदस्यों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने की अपील करके विपक्ष की एकजुटता में सेंध लगाने की आखिरी कोशिश की थी परंतु विपक्ष टस से मस नहीं हुआ।सदन में 21 घंटे चली बहस के दौरान विपक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि सदन की वर्तमान सदस्य संख्या के आधार पर ही महिलाओं के लिए दो तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए सरकार तैयार हो जाए तो विपक्ष भी इसका समर्थन करने के लिए तैयार है परंतु सरकार को यह मंजूर नहीं था। दरअसल उसने जब 33 प्रतिशत आरक्षण को परिसीमन की शर्त से जोड दिया था तभी यह तय हो गया था कि यह ऐतिहासिक संविधान संशोधन विधेयक वर्तमान सदन में दो तिहाई बहुमत से पारित होना संभव नहीं है।

सवाल यह उठता है कि सरकार लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के लिए तैयार क्यों नहीं हो रही है। राजनीतिक पंडितों के अनुसार इस सवाल का जवाब यह है कि वर्तमान लोकसभा की 543 सीटों में से अभी मात्र 74 सीटें महिलाओं के पास है जो 33 प्रतिशत से करीब 100 कम है ं। सरकार को डर है कि अगर लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं तो बहुत से पुरुष सांसदों को अपनी सीटें छोड़ने के विवश करना पडेगा जो उनमें असंतोष पैदा कर सकता है इसलिए वह परिसीमन के माध्यम से लोकसभा की सदस्य संख्या 850 तक बढाकर उसकी 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना चाहती है इसके लिए विपक्ष और विशेष रूप से दक्षिण के राज्य तैयार नहीं हैं जिन्हें परिसीमन से लोक सभा में अपना प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका सता रही है।

बहरहाल, यह संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत से पारित न होने के बाद सरकार और विपक्ष के बीच पुन: आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है। सरकार की ओर से विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया जा रहा है तो विपक्ष इसे राजनीतिक लाभ की मंशा से प्रेरित कदम बता कर इसे संविधान विरोधी बता रहा है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि मोदी सरकार ने तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभाओं के चुनाव में राजनीतिक लाभ लेने की मंशा से संसद का विशेष सत्र बुलाकर उसमें ये विधेयक पेश किए ताकि इन राज्यों के भाजपा विरोधी दलों के सांसदों को चुनाव प्रचार छोड़ कर तीन दिन दिल्ली में रहना पडे और इससे उन दलों की जीत की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पडे।

जाहिर सी बात है कि यह लड़ाई अब संसद से बाहर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभाओं के चुनाव मैदान में भी देखने को मिलेगी। इन राज्यों की विधानसभाओं के लिए 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है। मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर इन मुद्दे पर चर्चा इसीलिए करवाई ताकि वह उक्त दो राज्यों की महिला मतदाताओं को यह संदेश दे सके कि भाजपा और केंद्र सरकार उनकी सबसे बड़ी हितैषी है। इन दो राज्यों में चुनाव प्रचार की जो अवधि शेष है उनमें भाजपा और मोदी सरकार संविधान संशोधन विधेयक के विरोध को मुद्दा बना कर महिला मतदाताओं की सहानुभूति अर्जित करने का हर संभव प्रयास करेगी। इन राज्यों में सत्तारूढ़ दल इस मामले में अपना पक्ष किस तरह प्रस्तुत करते हैं यह उत्सुकता का विषय है लेकिन कुल मिलाकर यह तो निश्चित रूप से खेद का विषय है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण अभी तो एक सुनहरा स्वप्न बनकर रह गया है।

(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

Related Articles

Back to top button