Saturday - 28 January 2023 - 9:41 PM

21 साल 5 सरकारें और 11 सीएम, ये है उत्तराखंड की त्रासदी

शबाहत हुसैन विजेता

लखनऊ. उत्तराखंड की उम्र ही क्या है. 21 साल का होने के लिए उसे अभी सवा चार महीनों की और ज़रूरत है. नौ नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड अस्तित्व में आया था. उत्तराखंड का जन्म पहाड़ी क्षेत्र के विकास के मुद्दे पर हुआ था. लगातार उत्तराखंड को राज्य बनाने के लिए आन्दोलन चल रहे थे लेकिन आन्दोलनकारियों के दिमाग में यह तस्वीर तक साफ़ नहीं थी कि उत्तराखंड राज्य बनेगा तो उसकी राजधानी क्या होगी?

गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग हालांकि 60 के दशक में ही शुरू हो गई थी लेकिन गैरसैण ही क्यों यह तय नहीं हो पाया था. नतीजा यह हुआ कि राज्य के गठन के बाद राजधानी की तलाश के लिए आयोग गठित करना पड़ा था. इस आयोग के सामने देहरादून, काशीपुर, रामनगर, ऋषिकेश और गैरसैण के नाम बतौर राजधानी सामने आये थे. इनमें से किसी भी एक शहर को राजधानी के रूप में घोषित कर देने से मौसम की मार झेलना तय था. नतीजा यह हुआ कि उत्तराखंड को देहरादून और गैरसैण के रूप में दो राजधानियां मिलीं. जाड़े में देहरादून और गर्मियों में गैरसैण.

जिस राज्य में राजधानियां चुनना इतना दुष्कर काम था उसमें स्थाई मुख्यमंत्री भी हो सकता है यह बड़ी दूर की कौड़ी है.

पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के ग्यारहवें मुख्यमंत्री होंगे. अपने 21 साल से भी कम समय में उत्तराखंड 10 मुख्यमंत्री देख चुका है. उत्तराखंड के इतिहास में नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई ऐसा मुख्यमंत्री नहीं हुआ जिसने अपने कार्यकाल के पांच साल पूरे किये हों. उत्तराखंड के तीसरे मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी दो मार्च 2002 से सात मार्च 2007 तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे. नारायण दत्त तिवारी के बाद सबसे लम्बे समय तक उत्तराखंड की कमान संभालने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत ने करीब चार साल इस कुर्सी पर बिताये. त्रिवेंद्र सिंह रावत 18 मार्च 2017 से नौ मार्च 2021 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे.

उत्तराखंड के बाकी मुख्यमंत्रियों की बात करें तो पहले और दूसरे मुख्यमंत्री तो साल भर भी इस कुर्सी पर नहीं बैठ पाए. नित्यानंद स्वामी उत्तराखंड के गठन के साथ ही नौ नवम्बर 2000 को पहले मुख्यमंत्री बने लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में एक साल पूरा होने से सिर्फ 11 दिन पहले यानि 29 अक्टूबर 2001 को राज्य की कमान भगत सिंह कोश्यारी को सौंप दी गई. कोश्यारी को 123 दिन बाद ही पहली मार्च 2002 को कुर्सी छोड़नी पड़ी क्योंकि उत्तराखंड में बीजेपी चुनाव हार गयी थी और सत्ता कांग्रेस के हाथ आ गई थी.

कांग्रेस शासन में नारायण दत्त तिवारी पांच साल कुर्सी पर बैठे लेकिन पांच साल बाद बीजेपी की फिर सत्ता में वापसी हुई और आठ मार्च 2007 को बीजेपी ने भुवन चन्द्र खंडूरी को उत्तराखंड की कमान सौंपी. 23 जून 2009 को खंडूरी को हटाकर रमेश पोखरियाल निशंक को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बना दिया गया. 10 सितम्बर 2011 तक पोखरियाल मुख्यमंत्री रहे और 11 सितम्बर को खंडूरी की फिर मुख्यमंत्री के रूप में वापसी हुई. 13 मार्च 2012 को उन्हें पद छोड़ना पड़ा क्योंकि सत्ता में फिर कांग्रेस की वापसी हो गई थी.

कांग्रेस की दूसरी बार सत्ता में वापसी हुई तो वह भी राज्य में पूरे कार्यकाल के लिए किसी को मुख्यमंत्री के रूप में बर्दाश्त नहीं कर पाई. 13 मार्च 2012 को मुख्यमंत्री बनाये गए हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा से 31 जनवरी 2014 को कांग्रेस ने इस्तीफ़ा ले लिया और पहली फरवरी 2014 को हरीश रावत को मुख्यमंत्री बना दिया गया. रावत इस पड़ पर 27 मार्च 2016 तक रहे. हरीश रावत हालांकि उत्तराखंड में लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहे. बीच में दो बार राष्ट्रपति शासन रहा. एक बार 25 दिन और दूसरी बार 19 दिन तक राष्ट्रपति शासन रहा. इस दौरान हरीश रावत पहली बार 785 दिन, दूसरी बार एक दिन और तीसरी बार 311 दिन तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे.

18 मार्च 2017 को फिर बीजेपी की वापसी हुई और त्रिवेंद्र सिंह रावत की मुख्यमंत्री के रूम ताजपोशी हुई. नौ मार्च 2021 को त्रिवेन्द्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया. तीरथ सिंह रावत अपने उल-जलूल बयानों को लेकर चर्चा में बने रहे. फटी जींस वाले बयान को लेकर उनकी काफी आलोचना भी हुई. इसके बाद उन्होंने कोरोना को लेकर बयान जारी किया. अंतत: बीजेपी ने समझ लिया कि तीरथ सिंह रावत को चेहरा बनाकर विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा जा सकता. यही वजह रही कि 10 मार्च 2021 को मुख्यमंत्री बनने वाले तीरथ सिंह रावत को दो जुलाई को संवैधानिक आधार पर सत्ता से बेदखल कर दिया गया.

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तीरथ सिंह रावत अभी संवैधानिक रूप से सवा दो महीने तक और इस पद पर रह सकते थे लेकिन बीजेपी ने उनके स्थान पर पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा करना ज्यादा बेहतर समझा. धामी युवा हैं. 46 साल की उम्र है लेकिन दूसरी बार विधायक बने हैं. संगठन पर अच्छी पकड़ है. जनता में लोकप्रिय हैं. केन्द्र में भी उन्हें काफी तरजीह मिलती है. ऐसे में जब उत्तराखंड को अगले साल चुनाव का सामना करना है तो पुष्कर सिंह धामी तीरथ सिंह रावत से ज्यादा बेहतर साबित हो सकते हैं. यही वजह रही की धामी को कमान सौंपी गई. उत्तराखंड में विधानसभा का अगला चुनाव पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ा जायेगा.

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