Monday - 6 February 2023 - 8:55 AM

‘करो या मरो’ की लड़ाई लड़ रही हैं मायावती

प्रीति सिंह

लोकसभा चुनाव 2019 बसपा प्रमुख मायावती के अब तक के राजनीतिक जीवन का सबसे निर्णायक चुनाव रहने वाला है। उनके सामने ‘करो या मरो’ की स्थिति है। उत्तर प्रदेश में इस लोकसभा चुनाव के नतीजे और उनकी पार्टी को मिलने वाली सीटों से ही उनका और उनकी पार्टी का राजनीतिक भविष्य निर्धारित होगा। कुल मिलाकर अपनी दरकती जमीन को बचाने के लिए मायावती जी-जान से लगी हुई हैं। शायद इसीलिए माया ने उत्तर प्रदेश में अपनी दरकती जमीन को बचाने के लिए अपने सबसे बड़ी दुश्मन पार्टी सपा से गठबंधन करने से भी गुरेज नहीं किया। अब देखना दिलचस्प होगा कि समाजवादी पार्टी के सहारे संजीवनी तलाश रहीं मायावती को प्रदेश की जनता जीवनदान देती है या फिर…।

बसपा प्रमुख मायावती इस समय आक्रामक मुद्रा में है। जहां चुनाव जीतने के लिए वह लगातार रणनीति बना रही हैं तो वहीं विपक्षी दलों पर भी निशाना भी साध रही हैं। वह न तो कांग्रेस को बख्श रही है और न ही बीजेपी को। वह लगातार मोदी और राहुल पर निशाना साध रही है।

दरअसल माया के लिए यह लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक कॅरियर के लिए मील का पत्थर साबित होने वाला है। अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के साथ-साथ वह अपने प्रधानमंत्री बनने के सपने को भी पंख देने के लिए जुटी हुई हैं।

माया के लिए चुनाव कितना महत्वपूर्ण है इससे ही सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी ढाई दशक पुरानी अदावत और अपने साथ हुए लखनऊ के कुख्यात गेस्ट हाउस कांड की कड़वाहट को भी भुला दिया है।

दरअसल, मायावती इस समय अपने राजनीतिक जीवन के बेहद चुनौती भरे दौर से गुजर रही हैं, इस समय लोकसभा में उनकी पार्टी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है और उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उनकी पार्टी के महज सात विधायक हैं, जो बसपा के इतिहास में अब तक की न्यूनतम स्थिति है।

वहीं अन्य राज्यों की विधानसभा में भी बसपा का प्रतिनिधित्व पहले से कम हुआ है और प्राप्त वोटों के प्रतिशत में भी गिरावट आई है, जिसके चलते उसकी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी की मान्यता खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। 2004 लोकसभा चुनाव में बसपा को 19 सीट और 24.67 प्रतिशत वोट, 2009 में 20 सीट और 27.20 प्रतिशत वोट मिला तो वहीं 2014 लोकसभा चुनाव में बसपा को 19.77 प्रतिशत वोट मिला लेकिन जीत कहीं नहीं मिली।

बीएसपी और मायावती का गिरता पॉलिटिकल ग्राफ

साल 2012 से लेकर 2017 तक बीएसपी का प्रदर्शन और मायावती का पॉलिटिकल ग्राफ लगातार गिरता चला गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी अपना खाता भी नहीं खोल पायी। वहीं उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में महज सात सीट पाकर बीएसपी तीसरे नंबर पर पहुंच गई। बीएसपी के प्रदर्शन में गिरावट के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य और इंद्रजीत सरोज जैसे बड़े नेता पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में चले गए। इतना ही नहीं, बीएसपी का कोर वोट बैंक भी फिसलने लगा। गैर-जाटव दलित वोट फिसलकर बीजेपी में चला गया। गैर-जाटव दलितों के बीच बीएसपी का समर्थन 2012 में 49 फीसदी से घटकर 2014 में 33 फीसदी रह गया। जाटवों को छोड़कर सभी समुदायों में बसपा की लोकप्रियता घट गई। एक संभावित प्रधानमंत्री पद के दावेदार से मायावती फिसलते-फिसलते उत्तर प्रदेश के जाटवों के एक नेता यानी अपने समुदाय के नेता तक सिमट चुकी थीं।

समय रहते बदली अपनी रणनीति

हालांकि समय रहते मायावती ने अपनी रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया। बीएसपी को ‘नो-प्री-पोल अलाउंस’ नीति और देशभर के प्रमुख गठबंधनों से खुद को अलग रखने के लिए जाना जाता था लेकिन उन्होंने पिछले साल कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए जनता दल (सेक्युलर) के साथ हाथ मिलाया और राज्य में जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई।

छत्तीसगढ़ में भी उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के साथ गठबंधन किया और हरियाणा में इंडियन नेशनल लोक दल के साथ भी गठबंधन की संभावना है। कर्नाटक की जेडीएस, छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ-साथ अखिलेश यादव ने कहा है कि वे अगले प्रधानमंत्री के रूप में मायावती का समर्थन करते हैं। ऐसे में यदि मायावती अपने मंसूबे में सफल होती है तो उन्हें अपनी खोई जमीन तो मिलेगी ही वह अपने सपने के भी करीब पहुंच सकती हैं।

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