जबलपुर हादसा: मौत के आगोश में भी नहीं छूटा मां का आंचल, बरगी डैम की गहराइयों से निकली रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर!

जबलपुर क्रूज हादसा। कुदरत का कहर जब टूटता है, तो इंसान को संभलने का मौका नहीं मिलता। लेकिन उस प्रलय और चीख-पुकार के बीच अगर कुछ अमर रह जाता है, तो वह है ‘मां की ममता’। जबलपुर के बरगी डैम में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे में अब तक 9 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि रेस्क्यू ऑपरेशन अब भी जारी है।
गहराइयों में दिखा ममता का अटूट बंधन
हादसे के 14 घंटे बाद जब आगरा से आई पैरामिलिट्री डाइविंग टीम पानी की गहराइयों में उतरी, तो उनके सामने एक ऐसा मंजर था जिसे देख गोताखोरों की आंखें भी नम हो गईं। टॉर्च की हल्की रोशनी में क्रूज के मलबे के बीच दो शव एक साथ मिले दिल्ली की रहने वाली जूलियस मेसी और उनकी मासूम बेटी सिया मेसी।
रेस्क्यू टीम के सदस्य ने बताया कि जूलियस ने अपनी बेटी को सीने से इस कदर सटा रखा था, मानो वह उसे मौत के दैत्य से बचा लेना चाहती हो। पानी के भारी दबाव और आखिरी हिचकी के बीच भी मां की बाहें अपनी संतान के लिए कवच बनी हुई थीं। ममता का यह बंधन इतना अटूट था कि रेस्क्यू टीम को उन्हें अलग करने में भारी मशक्कत करनी पड़ी।
लापरवाही की इंतहा: स्टोर रूम में बंद रह गईं ‘लाइफ जैकेट’
हादसे में बचीं संगीता कोरी के बयान ने प्रशासन और क्रूज प्रबंधन की पोल खोलकर रख दी है। संगीता के अनुसार:
- नहीं पहनाई गई जैकेट: क्रूज पर सवार किसी भी यात्री को लाइफ जैकेट नहीं पहनाई गई थी। सभी जैकेट स्टोर रूम में ताले के अंदर बंद थीं।
- ओवरलोडिंग और अनुभवहीनता: क्रूज में क्षमता से अधिक लोग सवार थे। चालक अनुभवहीन था और किनारे से मिल रहे सुरक्षा संकेतों को नजरअंदाज कर रहा था।
- अफरा-तफरी का माहौल: जब नाव डूबने लगी, तब आनन-फानन में जैकेट निकालने की कोशिश की गई, जिससे छीना-झपटी मच गई और लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला।
जीरो विजिबिलिटी और मौत का जाल
आगरा की एक्सपर्ट डाइविंग टीम के लिए यह रेस्क्यू ऑपरेशन किसी चुनौती से कम नहीं था। पानी के अंदर जीरो विजिबिलिटी और क्रूज का टूटा हुआ ढांचा एक लोहे के जाल जैसा बन गया था। एक समय तो ऐसा आया जब एक गोताखोर खुद उस जाल में फंस गया था, जिसे कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला गया। टीम को शवों तक पहुंचने के लिए हथौड़ों से क्रूज की लोहे की बॉडी को तोड़ना पड़ा।
सवाल जो जवाब मांगते हैं…
यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का जीता-जागता उदाहरण है।
- आखिर बिना लाइफ जैकेट के क्रूज को पानी में उतारने की अनुमति किसने दी?
- क्या पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह गया है?
- क्या जिम्मेदारियों से ज्यादा कमाई को प्राथमिकता दी जा रही थी?
बरगी डैम की ये लहरें अब शांत हैं, लेकिन वे अपने पीछे कई परिवारों की चीखें और कभी न खत्म होने वाला गम छोड़ गई हैं। जूलियस और सिया की वो आखिरी आलिंगन (Embrace) हमेशा याद दिलाएगी कि एक मां अपनी आखिरी सांस तक हार नहीं मानती।



