ईडी का डंडा-महाराष्‍ट्र का फंडा

सुरेंद्र दुबे

आजकल राजनीति में राजनैतिक समीकरणों तथा नेताओं की तिकड़मबाजी से ज्‍यादा महत्‍व सीबीआई और ईडी का हो गया है। बड़े-बड़े नेता कहीं न कहीं भ्रष्‍टाचार के आरोपों में फंसे हुए हैं। इसलिए भाजपा सबसे ज्‍यादा इसी हथियार का इस्‍तेमाल करने लगी है। मैंने 20 नवंबर को ही अपने आलेख ‘महाराष्‍ट्र के आसमान में नई पतंगबाजी’ में साफ-साफ कह दिया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा शरद पवार के बीच अचानक हुई बैठक में सरकार बनाने को लेकर डील हो गई है। किसानों के मुद्दे पर बात तो एक बहाना है। उस समय तमाम पत्रकार मेरी आशंकाओं से सहमत नहीं थे। पर आज जब सुबह आठ बजे देवेंद्र फडणवीस ने मुख्‍यमंत्री तथा अजित पवार ने उपमुख्‍यमंत्री पद की शपथ ले ली तो स्‍पष्‍ट हो गया‍ कि आखिर ईडी का डंडा महाराष्‍ट्र के चुनावी फंडे में प्रभावी भूमिका निभा गया।

जुबिली पोस्‍ट के पाठकों को भली भांति याद होगा कि अजित पवार के विरूद्ध उनके उपमुख्‍यमंत्रित्‍व काल में किए गए कथित 70 हजार करोड रुपए के घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है। सीबीआई इस संबंध में उनसे पूछताछ भी कर चुकी है। एनसीपी के नेता प्रफुल्‍ल पटेल के विरूद्ध ईडी गहन पूछताछ कर चुकी है। इनके विरूद्ध केंद्र सरकार में विमानन मंत्री रहते हुए कथित भ्रष्‍टाचार के गंभीर आरोप हैं। यानी ये दोनों नेता अजगर के जबड़े में फंसे हुए हैं।

महाराष्‍ट्र के विधानसभा चुनाव के दौरान ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार के विरूद्ध भी ईडी मुकदमा दर्ज कर चुकी थी। इसके पहले कि ईडी अपने आप को पूछताछ के लिए तैयार कर पाती राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद पवार ने यह कह कर ईडी को बैकफुट पर ला दिया कि वे स्‍वयं जांच के लिए ईडी के दफ्तर जाएंगे। ईडी तब तक वह फंदा नहीं तैयार कर पाई थी, जिसमें शरद पवार को लटकाना था, इसलिए ईडी ने शरद पवार के हाथ-पैर जोड़े कि अभी वह जांच के लिए न आएं, जब जरूरत होगी तब उन्‍हें बुलाया जाएगा। यानी कि एनसीपी के तीन बड़े नेता शरद पवार, प्रफुल्‍ल पटेल और अजित पवार भाजपा के शिकंजे में फंसे हुए हैं। ऐसे में अगर कोई डील हो गई और अजित पवार उपमुख्‍यमंत्री बन गए तो इसमें किसी को आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। हर नेता को जेल जाने से डर लगता है। पी चिदंबरम का हश्र सबके सामने है।

शरद पवार भले ही कह रहे हों कि उन्‍हें अजित पवार के दांव की कोई जानकारी नहीं थी, परंतु अजित पवार स्‍वयं कह रहे हैं कि शरद पवार को सब मालूम था। अब दोनों में कोई एक तो झूठ बोल ही रहा है। कहावत है कि झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो। अब इसमें काला कौआ कौन है ये तो बाद में कभी पता चलेगा।

शिवसेना नेता संजय राउत के एक बयान का भी यहां जिक्र किया जाना मुनासिब होगा कि शरद पवार को समझने में कई जन्‍म लगेंगे। लगता है उनकी बात सही थी इसीलिए न शिवसेना और न ही कांग्रेस शरद पवार को समझ पाई। एक तरफ शरद पवार ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मुख्‍यमंत्री बनवाने के लिए हरी झंडी दिखा दी और दूसरी तरफ भाजपा की सरकार बनवा दी। ऐसा लग रहा है जैसे मां-बाप ने किसी बेटी की शादी कहीं और तय कर रखी थी पर बेटी ने घर से भाग कर चुपके से शादी कर ली, क्योंकि अजित पवार को उप मुख्यमंत्री तो शिवसेना की सरकार में भी बनना ही था।

भाजपा ने अजित पवार को तोड़ने के लिए उनके अंदर न केवल जेल जाने का डर पैदा किया बल्कि राजनैतिक अस्तित्‍व बचाने के लिए भाजपा के साथ आने का भी लालच पैदा किया। ये बात सबको मालूम  है कि शरद पवार पहले एनसीपी की बागडोर भतीजे अजित पवार को ही सौंपना चाहते थे। अजित पवार को ही शरद पवार का राजनैतिक उत्‍तराधिकारी माना जाने लगा था। पर बाद में शरद पवार का मन डोल गया। ठीक वैसे ही जैसे उत्‍तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का मन अपने पुत्र अखिलेश यादव को लेकर डोल गया था और शरद पवार ने अजित पवार की जगह अपनी बेटी सुप्रिया सुले को उत्‍तराधिकारी बनाने का मन बना लिया। अंग्रेजी की एक कहावत चरितार्थ हो गई Blood is Thicker Than Water.

अब जब एनसीपी की उत्‍तराधिकारी सुप्रिया सुले को ही होना है तो अजित पवार को अपना राजनैतिक भविष्‍य बचाने के लिए भाजपा का साथ देना एक राजनैतिक मजबूरी हो गई। यहां भी चचा-भतीजा वाली पटकथा लिख दी गई है। उत्‍तर प्रदेश में जिस तरह चचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव के बीच आज तक राजनैतिक उठापटक जारी है। वैसी ही राजनैतिक उठापटक अब चचा शरद पवार और भतीजे अजित पवार के बीच महाराष्‍ट्र में देखने को मिलेगी, जिसमें  केंद्रबिंदु होंगी सुप्रिया सुले। यानी कि जिस तरह उत्‍तर प्रदेश में पुत्र मोह के कारण मुलायम सिंह यादव ने अपने खून से सींची समाजवादी पार्टी को हाशिए पर ला दिया वैसा कुछ पुत्री मोह के कारण शरद पवार कर बैठे हैं। एनसीपी का राजनैतिक भविष्‍य क्‍या होगा यह जल्‍दी ही हम सबके सामने होगा। आइये दशकों पुरानी एक फिल्‍म का गाना गुनगुनाते हैं- मेरा मन डोले, तेरा तन डोले, मेरे दिल का गया करार, कौन बजाए बांसुरिया।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख उनके निजी विचार हैं)

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