ट्रंप VS ईरान: क्या ‘निक्सन फॉर्मूला’ के जरिए चीन को साध पाएंगे अमेरिकी राष्ट्रपति?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय ईरान के साथ जारी गतिरोध में बुरी तरह घिर चुके हैं। तमाम कोशिशों और कड़े प्रतिबंधों के बावजूद ईरान झुकने को तैयार नहीं है और अपनी ही शर्तों पर समझौते पर अड़ा है।

इस भू-राजनीतिक चक्रव्यूह से निकलने के लिए ट्रंप ने अब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की ऐतिहासिक रणनीति (निक्सन फॉर्मूला) का सहारा लिया है।

दशकों पहले जब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन वियतनाम युद्ध में बुरी तरह फंस गए थे, तब उन्होंने हालात को संभालने के लिए चीन का रुख किया था। हालांकि, उस दौर और आज के हालात में एक बहुत बड़ा बुनियादी अंतर है:

  • 100 साल का ताइवान समझौता: उस समय मजबूरी चीन की थी। भारत, सोवियत संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे तमाम पड़ोसियों से घिरे चीन को तब अमेरिकी तकनीक और विदेशी निवेश की सख्त जरूरत थी।
  • यही वजह थी कि चीन के तत्कालीन सुप्रीम लीडर माओत्से तुंग ने ताइवान के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। माओ ने निक्सन से यहाँ तक कह दिया था कि ‘वे ताइवान को सौ साल तक भूल सकते हैं।’

आज की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। ट्रंप को अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए चीन के पास इस बार कई बड़े ‘ट्रंप कार्ड’ हैं। इस बार अमेरिका के सामने चीन के इतनी मजबूती से तनकर खड़े होने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं:

  1. आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता: आज का चीन आर्थिक और तकनीकी रूप से किसी का मोहताज नहीं है, बल्कि वह खुद वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक बड़ा इंजन है।
  2. ईरान-चीन रणनीतिक साझेदारी: चीन का सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड ईरान के साथ उसकी मजबूत आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी है। चीन न केवल ईरान से भारी मात्रा में तेल खरीदता है, बल्कि उसने ईरान के बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर का निवेश भी कर रखा है।

निष्कर्ष: जहाँ एक ओर निक्सन के समय चीन लाचार था, वहीं आज बीजिंग के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। यही वजह है कि ईरान को नियंत्रित करने की ट्रंप की यह ‘निक्सन चाल’ इस बार उतनी आसान नहीं दिख रही है, क्योंकि चीन अब बराबरी की हैसियत से अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात कर रहा है।

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