ठंडा रवैया, ठोस ताकत : ट्रंप के चीन दौरे से मिलने वाले सबक

सम्पादकीय

डा. उत्कर्ष सिन्हा
डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा दुनिया भर की मीडिया के लिए महत्वपूर्ण आयोजन भले ही थी , पर बीजिंग में इसे जिस सख्त ठंडेपन और आत्मविश्वास के साथ ट्रीट किया गया वह केवल शिष्टाचार नहीं बल्कि एक स्पष्ट संदेश था – चीन अब अमेरिकी मान्यता का मोहताज नहीं है। चीनी सरकारी मीडिया ने इस दौरे को न तो किसी ऐतिहासिक घटना की तरह दिखाया और न ही किसी भावनात्मक महोत्सव में बदल दिया जैसा हम भारतीयों को देखने की आदत पड़ चुकी है।चीन की समाचार एजेंसियों शिन्हुआ, CCTV और China Daily ने इसे महत्त्वपूर्ण जरुर माना पर “सबसे बड़ी खबर” जैसा तमाशा नहीं रचा। इस अति सामान्य दिखने वाले रवैये के भीतर ही चीन की रणनीति झलकती है — दिखावे और नाटकीयता पर आधारित शक्ति नहीं, बल्कि सतत और मजबूत आधारभूत क्षमता पर टिकी हुई मजबूती।
विदेशी विश्लेषक भी यही संकेत दे रहे हैं कि बीजिंग अब अमेरिका से मान्यता पाने के लिए उतावला नहीं दिखता। वह अपनी स्थिति को बराबरी की ताकत मानकर व्यवहार कर रहा है, मसलन डोनाल्ड ट्रंप की अगुआई के लिए शी जिनपिंग का न आना। इस दृष्टिकोण का आधार महज़ रोटियों-रहमतों का उद्घोष नहीं, वास्तविक आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक शक्ति है। पिछले तीन दशकों में चीन ने जिस तरह माइनिंग, रिफाइनिंग, बड़ी-स्तरीय मैन्युफैक्चरिंग और वैल्यू-एडेड प्रोसेसिंग के इकोसिस्टम का निर्माण किया है, वही आज उसकी अंतरराष्ट्रीय दृढ़ता का स्तम्भ है। उससे EV बैटरियों, रेयर अर्थ प्रोसेसिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स के कई महत्वपूर्ण हिस्सों में वैश्विक निर्भरता बन चुकी है; इसलिए अमेरिकी कंपनियों के प्रधानों के भव्य काफिले ने भी चीन के प्रति दुराग्रह को किनारे रखते हुए एक व्यावहारिक व्यापारिक साझेदार के रूप में देखा है ।
चीन की जनता और सोशल मीडिया पर भी इस मामले की टोन रोचक रही । वहां ट्रंप को मजाक में “चुआन जियानगुओ” कहा जाता है—ऐसा नेता जिसकी नीतियों ने अनजाने में चीन को और आत्मनिर्भर बनाया। इस उपहास में एक कड़वा सच छिपा है कि आम जनता भी नेताओं के नारेवाले प्रभाव से अधिक उद्योगपतियों और इंजीनियरिंग नवाचारों को महत्व देती है। एलान मस्क और टिम कुक जैसे नाम चीनियों की चर्चाओं में अधिक जगह पाते हैं क्योंकि वे वैश्विक बाजारों और तकनीकी रुझानों के ठोस साक्ष्य हैं । वे जानते हैं कि चीन का बाजार और उसके उत्पादन क्षमताएं वैश्विक रणनीति के केन्द्र में हैं। यही कारण है कि चीन में ट्रंप को ‘दोस्त’ की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि एक सौदेबाज नेता के रूप में देखा जाता है और इसीलिए उनका औपचारिक स्वागत तो हुआ पर उससे जुड़ा कोई भावुक उत्साह नहीं दिखाई दिया ।
हालांकि सिर्फ चीन ने ये ठंडापन नहीं दिखाया बल्कि जाते जाते अमेरिकनों ने भी अपने तरीके से इसका उत्तर दे दिया जब डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम ने चीन से लौटते वक्त वहां मिले सारे गिफ्ट कचरे के डिब्बे में फेंक दिए। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी टीम का कोई सदस्य एक भी गिफ्ट लेकर एयरफोर्स वन में नहीं चढ़ा। बीजिंग एयरपोर्ट पर अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल एयरफोर्स वन पर चढ़ने से पहले चीनियों की तरफ से मिले तमाम गिफ्ट जिनमें मोबाइल फोन से लेकर अलग अलग सामान थे । क्या ये चीन का भयानक अपमान था या जासूसी की चिंताओं से भरी गतिविधि ?
यह रिपोर्ट उस गहरे अविश्वास को उजागर करती है जो अभी भी अमेरिका और चीन के रिश्तों की पहचान बना हुआ है।
अमेरिकी अधिकारियों और वाइट हाउस के रिपोर्टरों ने इस दौरे के दौरान मिली कई चीजों को फेंक दिया जिनमें स्टाफ के ‘बर्नर फोन’, कार्यक्रम को कवर करने के दौरान दिए गये पहचान पत्र और चीन द्वारा जारी किए गए ‘लैपल पिन’ शामिल थे। वाइट हाउस पूल के एक पत्रकार के मुताबिक बीजिंग कैपिटल एयरपोर्ट से रवाना होने से ठीक पहले इन चीजों को विमान की सीढ़ियों के पास रखे एक कूड़ेदान में फेंक दिया गया था।
भारत के लिए इससे सीख साफ और सख्त है। असली राष्ट्रीय आत्मविश्वास नारे और सुर्खियों से नहीं बल्कि तकनीक, उद्योग, निर्यात और आर्थिक मजबूती से आता है। भारत के पास सस्ता श्रम, इंजीनियरिंग कौशल और अप्रयुक्त खनिज संसाधन हैं, पर बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग और प्रोसेसिंग क्षमताओं का अभाव ही उसे अत्यावश्यक वस्तुओं और सप्लाई चेन पर निर्भर बनाता है। चीन ने यह ताकत रातों-रात नहीं हासिल की बल्कि उसने दशकों तक धैर्यपूर्वक निवेश, सीख और सुधार द्वारा अपनी क्षमताओं का निर्माण किया। यही सतत और संगठित प्रयास भारत के लिए मार्गदर्शक होना चाहिए—केवल नीति घोषणाएँ, कलस्टर का निर्माण या मामूली अनुदान पर्याप्त नहीं होंगे।
हालिया संकट ने हमें बताया है कि किसी भी देश का नीतिगत फोकस स्पष्ट होना चाहिए: कच्चे माल से लेकर फिनिश्ड गुड्स तक वैल्यू चेन का निर्माण, रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग पर खास निवेश, और विनिर्माण के लिये विश्वसनीय पुरोहित-स्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर। साथ ही, शिक्षा और डिजिटल R&D में दीर्घकालिक निवेश आवश्यक है ताकि उच्च-मूल्य वाले उत्पादों और नवाचारों में भारत की हिस्सेदारी बढ़े। चीन ने जो किया वह केवल अधिक उत्पादन नहीं था; उसने सप्लाई-चेन के हर जुड़ाव पर अपना नियंत्रण और विशेषज्ञता पुख्ता की है ।
चीनी दार्शनिक सुन त्ज़ु का कथन है: “अपनी योजनाओं को रात की तरह गुप्त रखो, और जब आगे बढ़ो तो बिजली की तरह प्रहार करो।” नीति निर्माताओं और उद्योग जगत दोनों के लिए यही रणनीतिक मंत्र होना चाहिए—धीरे-धीरे, पर गुप्त रूप से मजबूत बनो, फिर निर्णायक रूप से आगे बढ़ो। भारत के पास सामर्थ्य है; आवश्यकता है उस सामर्थ्य को व्यवस्थित, धीरजपूर्ण और निरंतर प्रयासों के माध्यम से वास्तविक शक्ति में बदलने की लेकिन दुर्भाग्य से जिसकी कमी फ़िलहाल हमारे नेतृत्वकर्ताओं में साफ़ दिखाई देती है ।
वैश्विक मंच पर हमारा स्वागत हमारे तैयारियों के बाद उपजे आत्मविश्वास से होगा, न कि किसी आशा-आश्वासन या नाटकीय उद्घोष पर निर्भर।



