डिजिटल अरेस्ट मामलों पर सरकार सख्त, सुप्रीम कोर्ट में पेश की बड़ी रिपोर्ट

नई दिल्ली। देश में बढ़ते डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड मामलों पर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सॉलिसिटर जनरल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल की गई है, जिसमें अब तक उठाए गए कदमों और भविष्य की रणनीति की जानकारी दी गई है।
10 करोड़ से ज्यादा की ठगी के केस CBI को
रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 करोड़ रुपये से अधिक की साइबर ठगी के मामलों को अब CBI को सौंपा जाएगा। इसके साथ ही RBI की ओर से पीड़ितों के लिए मुआवजा ढांचा तैयार करने पर भी विचार किया जा रहा है।
साइबर सुरक्षा के लिए बड़े प्रस्ताव
केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की रिपोर्ट में कई अहम सुझाव दिए गए हैं। इसमें टेलीकॉम कंपनियों, बैंकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने की बात कही गई है ताकि ठगी की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम लागू करने की तैयारी
रिपोर्ट में सबसे बड़ा प्रस्ताव बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम (BIVS) लागू करने का है। इसके तहत सिम कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को रियल टाइम ट्रैक किया जाएगा।
सरकार का लक्ष्य है कि दिसंबर 2026 तक देश में क्रॉस-ऑपरेटर सिम मॉनिटरिंग सिस्टम लागू हो जाए।
इसके अलावा—
- सिम लेने के लिए प्राइमरी नंबर से अनुमति अनिवार्य होगी
- फर्जी सिम जारी करने पर कंपनियों की जिम्मेदारी तय होगी
- POS एजेंटों की निगरानी और पहचान मजबूत की जाएगी
व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर भी सख्ती
रिपोर्ट में व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी सख्त कदमों का जिक्र है। सरकार ने बताया कि—
- डिलीट अकाउंट का डेटा 180 दिन तक सुरक्षित रखा जाएगा
- फर्जी डिवाइस आईडी को ब्लॉक किया जाएगा
- संदिग्ध कॉल/मैसेज पर यूजर्स को अलर्ट मिलेगा
- AI आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम को मजबूत किया जाएगा
व्हाट्सऐप ने भी सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने 12 हफ्तों के भीतर 9,400 से अधिक फर्जी अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाया है।
CBI कर रही जांच
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देशभर में 10 करोड़ रुपये से अधिक की साइबर ठगी के मामलों को CBI को सौंपा गया है। गुजरात और दिल्ली के कई मामलों की जांच पहले ही शुरू हो चुकी है, जिनमें एक मामला करीब 22.92 करोड़ रुपये की ठगी से जुड़ा है।
सरकार का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर फ्रॉड को रोकने के लिए अब तकनीकी और कानूनी दोनों स्तरों पर कड़े कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि आम लोगों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण मिल सके।



