बंदिशों की जंजीरों में जकड़ा समाज


स्मिता जैन ” रेवा”
बंदिशें जो दी जाती हैं या लगाई जाती हैं किसी अन्य के द्वारा आप पर ,और हम पर। किसी भी इंसान पर बचपन से ही हम सभी बंदिशों के अधीन अपना जीवन जीते हैं। बंदिश ही कभी हमारे माता-पिता ,कभी भाई-बहन, कभी समाज ,कभी दुनिया लगाती रहती हैं ।
शायद हमें, हम जो काम करते हैं उसके बारे में अच्छा बुरा नहीं जानते और जब कोई हम पर हमारे काम पर रोकता है और हम उसे कई बार उपेक्षित कर देते हैं लेकिन कुछ समय बाद फिर से हमारे ऊपर बंदिश ठोंक दी जाती है ।ज्यादातर बंदिशें बेटियों पर बचपन से ही लगाई जाती हैं क्योंकि हमारे माता-पिता और समाज जानता है कि हमारा ही समाज और समाज के लोग बेटियों को भूखे भेड़िए की तरह देखते हैं और बस उसका शारीरिक शोषण करना ही चाहते हैं ।
इसी बात के डर से हमारी बेटियां और मातृशक्ति पर्दे में रहने लगते हैं और अपने पहनावे में भी परिवर्तन कर लेती है और जो वह चाहती है वह खुलकर नहीं कर पाती हैं क्योंकि इस समाज ने और माता-पिता ने मिलकर उसके ऊपर अनदेखी, बिना बंधी हुई बेढियां लगा दी हैं जिसे वह संस्कार के तौर पर स्वीकार कर लेती है या फिर अपनी नियति मान लेती है क्योंकि इससे पहले भी उसकी मां, दादी, नानी, मौसी ,बुआ आदि के साथ यही सब होता आ रहा है तो उसे भी यह सब स्वीकारना ही पड़ता है ।कभी स्वेच्छा से तो कभी मजबूरी से और इस तरह वह समाज की बेढियो में बंध जाती है और अपनी ऊर्जा को समाप्त कर देती है ।
खाना बनाने घर का काम करने और एक सजी संवरी डॉल की तरह बनकर सामाजिक कार्यों में शामिल हो जाती है ,धार्मिक कार्यों में भी शामिल हो जाती है ।मात्र भीड़ को बढ़ाने या मनोरंजन करने के लिए।वह जानती है कि उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है ।कोई आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि अगर वह मर जाती है तो उसका पति दूसरी शादी कर लेता है लेकिन जब उसका पति मर जाता है तो उसको विधवा होने का श्राप दे दिया जाता है और वह बहुत ही कम मामलों में दूसरी शादी करने के लिए तैयार होता है क्योंकि यह समाज उसे स्वीकार नहीं करना चाहता है आगे भविष्य के लिए क्योंकि वह शादीशुदा थी और यदि उसके बच्चे उसके साथ है तो कोई भी समाज या कोई भी परिवार उसकी आसानी से स्वीकार नहीं कर सकता है लेकिन शारीरिक शोषण के लिए उसका शोषण जरूर कर सकता है।
इस तरह वह अपने आप में ही जो बचपन में पहनाई गई बेढियां ,बंदिशें उम्र दराज होने के बाद समझ में आता है कि काश! उसने इसका विरोध किया होता और अपना जीवन खुद जीने की सोची होती ।उस समय वह संघर्ष कर लेती तो आज यह बंदिश , बेढिंयां उसके पैरों में नहीं होती और वह आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन यापन स्वेच्छा से कर रही होती।
बंदिशें कोई भी हो व्यक्ति को पहले तो मानसिक रूप से विचारहीन करते हैं उसके बाद मानसिक गुलाम बनाते हैं फिर शारीरिक गुलाम बनती हैं और शारीरिक गुलाम बनाने के बाद इसका भरपूर शोषण करते हैं एवं जब इस तरह से गुलाम समाज हो जाता है तो सत्ता भी इसका भरपूर शोषण करती है अपने आप को स्थापित करने के लिए। फिर इस तरह एक गुलामी के द्वारा निर्मित अंधकार मय भविष्य होता है और सदियों के बीत जाने के बाद जब लोगों के गुलामी के शोषण से चेतना जागृत होती है तो वह क्रांति का रूप ले लेती है और उस सत्ता को भी उखाड़ कर फेंक देती है।
कुछ इसी तरह हमारे समाज का भी हाल हो गया है। हमारे ऊपर भी संस्कारों के नाम पर ,जाति, धर्म, परंपराओं के नाम पर अंजानी, अनदेखी बंदिशों की बेड़ियां पहना दी जाती हैं और हम उसको चुपचाप ढोते रहते हैं और अपने समाज को, परिवार को ,देश को, एक संस्कृति के नाम पर छले जाते हैं।
क्या जरूरी है हमें रूढ़ियों से ,परंपराओं से बनाई हुई संस्कृति का पालन करना ? क्या हम वर्तमान देश काल , परिस्थितियों के अनुसार नई सोच ,नई विचारधारा और नई जरूरत को स्वीकार नहीं कर सकते हैं ?क्यों हमें जबरदस्ती की बेढियां पहना दी जाती है जिनका की उस समय काल में कोई अस्तित्व ही नहीं होता।
समाज में व्यभिचार, अपराध, कु संगतियों को रोकने के लिए ही बंदिशों को लगाई जाता हैं और उसी को संस्कार का नाम दिया जाता है किंतु फिर भी हमारे समाज से व्यभिचार ,अपराध, कु संगतियां ,भ्रष्टाचार आदि अनेक कुरीतियों नष्ट नहीं हुई या हो रही है बल्कि और अधिक क्रुरता पूर्वक बढ़ती ही जा रही है ।
समाज में अनैतिकता चारों ओर व्याप्त हो गई है और लोग अब इस अनैतिकता को ही नैतिकता मानकर अपना व्यापार ,आमदनी लाखों करोड़ों में कर रहे हैं ।



