क्या भारतीय समाज एक फासिस्ट त्रासदी की ओर बढ़ रहा है?

राजीव रक्ताभ

प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) में जर्मनी की हार ने देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बुनियाद हिला दी थी। वर्साय की संधि (Treaty of Versailles) ने जर्मनी पर अपमानजनक शर्तें और भारी युद्ध क्षतिपूर्ति (reparations) लाद दी।

भूख, बेरोज़गारी, आर्थिक अवसाद और राष्ट्रीय गौरव का पतन — ये सब मिलकर एक आम जर्मन नागरिक को गहरी हीनभावना, आक्रोश, और अस्थिरता की घुटन में धकेल रहे थे। यही वह सामाजिक धरातल था जिस पर हिटलर और नाज़ी पार्टी ने “राष्ट्र गौरव” और “एक दुश्मन खड़ा कर देने” (यहूदी, कम्युनिस्ट, उदारपंथी) के ज़रिये सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ीं।

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जोसेफ गोएबेल्स, जो हिटलर के प्रचार मंत्री थे, ने जनता के विचारों को मोड़ने में मुख्य भूमिका निभाई। उनके झूठ के सिद्धांत बड़े सरल थे:

  • अगर आप एक झूठ को सौ बार दोहराएँ तो वह सच बन जाता है।”
  • “प्रचार का उद्देश्य सत्य नहीं, विजय है।”
  • “हमेशा बड़ा झूठ बोलो, क्योंकि छोटे झूठ पकड़े जा सकते हैं, बड़े नहीं।”

जर्मन समाज इसे क्यों पचा गया? क्योंकि जब जनता असुरक्षा, बेइज़्ज़ती और भुखमरी में डूबी होती है, तब वह कठोरता, स्पष्टता और एक साझा दुश्मन चाहती है। गोएबेल्स ने इन मानवीय कमजोरियों को निशाना बनाया 

  • एकदम सपाट दुश्मन तय किया: “यहूदी कारण हैं हमारी बर्बादी के।”
    राष्ट्रवाद को भड़काया: “हम आर्य श्रेष्ठ हैं।”
  • हर विफलता को बाहरी ताकतों के सिर मढ़ा गया: “यह हमारी गलती नहीं, यहूदियों और बाहरी ताकतों की साज़िश है।”
  • सूचना का सम्पूर्ण नियन्त्रण कर लिया: अखबार, रेडियो, फिल्में सब नाज़ी प्रचार में ढल गए।

इसलिए जर्मन समाज ने आर्थिक, सामाजिक और मानसिक अवसाद में डूबे होकर फासीवाद को “उद्धारक” के रूप में स्वीकार कर लिया — बिना ज्यादा सवाल पूछे।

  • आज के भारत में इस समझ को कैसे देखें?
  • आज का भारत भी सामाजिक रूप से अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है:
  • आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, महंगाई बढ़ रही है।
  • धर्म और जाति के आधार पर विभाजन को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाया जा रहा है।
  • एक “दुश्मन” (अल्पसंख्यक, वामपंथी, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, अर्बन नक्सल ) लगातार प्रचारित किया जाता है।
  • “राष्ट्रवाद” का मतलब अब सत्ता की आलोचना करना नहीं, आँख मूंदकर सत्ता की भक्ति करना हो गया है।
  • मीडिया का बड़ा हिस्सा गोएबेल्सी शैली में सरकार का प्रचारक बन चुका है।

झूठ को इतनी बार दोहराया जा रहा है कि वह एक “नया सत्य” बनता जा रहा है — “सब चंगा सी” (सब अच्छा है) भले ही ज़मीन पर दर्द पसरा हो।

जिस तरह जर्मन समाज ने भ्रामक राष्ट्रवाद और झूठ के जाल में फँसकर अपनी आज़ादी गंवाई थी, उसी राह पर भारत भी बढ़ रहा है। अगर इस भटके हुए समाज में सच को कहने वाले, सवाल उठाने वाले, भय के विरुद्ध खड़े होने वाले नहीं बचेंगे, तो इतिहास खुद को बहुत अधिक त्रासदी के साथ दोहरा सकता है।

(लेखक सामाजिक चिंतक हैं)

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