योगी कैबिनेट 2.0 का विस्तार: ‘बंगाल मॉडल’ और ‘सोशल रिसेट’ से 2027 फतह की तैयारी

जुबिली स्पेशल डेस्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी कैबिनेट का विस्तार कर विपक्षी गठबंधन (PDA) की काट ढूंढ ली है। इस विस्तार के जरिए भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करना, दलित-पिछड़ा वर्ग में पैठ मजबूत करना और महिलाओं को सीधे सत्ता से जोड़ना।
1. ‘मंडल और कमंडल’ का नया फ्यूजन
भाजपा ने अब अपनी रणनीति को “गैर-यादव OBC” से आगे बढ़ाकर “माइक्रो सोशल ब्लॉक्स” पर केंद्रित कर दिया है।
- जातीय संतुलन: मनोज पांडेय को शामिल कर ब्राह्मणों को साधा गया है, तो भूपेंद्र चौधरी (जाट), सोमेंद्र तोमर (गुर्जर) और कैलाश राजपूत (लोध) के जरिए पश्चिमी और मध्य यूपी के ओबीसी समीकरणों को दुरुस्त किया गया है।
- दलितों को प्रतिनिधित्व: कृष्णा पासवान और सुरेंद्र दिलेर के जरिए पासी और वाल्मीकि समाज को यह संदेश दिया गया है कि भाजपा में उनकी हिस्सेदारी सुरक्षित है।
2. यूपी में ‘बंगाल फॉर्मूला’ की एंट्री
पश्चिम बंगाल की जीत से उत्साहित भाजपा ने यूपी में भी वही मॉडल अपनाया है। इसमें महिला वोट बैंक और उन अति-पिछड़ों (निषाद, मौर्य, विश्वकर्मा, बिंद) पर फोकस किया गया है, जो खुद को मुख्यधारा की राजनीति में उपेक्षित महसूस करते हैं। पार्टी अब केवल ‘हिंदुत्व’ के भरोसे नहीं, बल्कि ‘सामाजिक प्रतिनिधित्व’ और ‘लाभार्थी राजनीति’ के मिश्रण के साथ मैदान में है।
3. ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ और ‘दलबदलुओं’ पर दांव
2024 के लोकसभा चुनाव के झटकों से सबक लेते हुए भाजपा ने इस बार कोई जोखिम नहीं लिया है:
- सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला: नए चेहरों को लाकर जनता को नई ऊर्जा का संदेश दिया गया है।
- विपक्ष में सेंधमारी: दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को कैबिनेट में जगह देकर भाजपा ने विपक्षी खेमे में खलबली मचा दी है। यह संदेश साफ है—भाजपा के दरवाजे उन सभी के लिए खुले हैं जो जीत का आधार बन सकते हैं।
4. क्षेत्रीय संतुलन: पूर्वांचल से अवध-पश्चिम की ओर
चूंकि पूर्वांचल से पहले ही शीर्ष नेतृत्व (PM और CM) आता है, इसलिए इस विस्तार में अवध और पश्चिमी यूपी को अधिक तरजीह दी गई है। उद्देश्य स्पष्ट है—2024 में जिन क्षेत्रों में भाजपा को नुकसान हुआ, वहां की भरपाई 2027 से पहले कर ली जाए।
योगी कैबिनेट अब अपनी अधिकतम सीमा (60 मंत्री) तक पहुँच चुकी है। नए मंत्रियों के पास प्रशासनिक कामकाज के लिए समय कम है, लेकिन चुनावी प्रचार के लिए वे भाजपा के सबसे बड़े ‘ब्रांड एंबेसडर’ बनकर निकलेंगे। यह विस्तार अखिलेश यादव के ‘PDA’ फॉर्मूले के खिलाफ भाजपा का ‘सोशल रिसेट’ है।



