Supreme Court: जातिगत जनगणना को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, सरकार का फैसला बताया नीतिगत मामला

Supreme Court of India ने बुधवार को जातिगत जनगणना के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जातिगत जनगणना एक नीतिगत (policy) निर्णय है और इसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने यह फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि—

  • जातिगत जनगणना करना या न करना सरकार का अधिकार है
  • सरकार को यह जानना जरूरी है कि ओबीसी और अन्य पिछड़े वर्गों की संख्या कितनी है
  • इससे कल्याणकारी योजनाएं बनाने में मदद मिलती है
  • जब तक यह कानून के खिलाफ नहीं होता, तब तक कोर्ट दखल नहीं देगा

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि:

  • जातिगत डेटा का गलत इस्तेमाल हो सकता है
  • सरकार के पास पहले से पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं
  • इसलिए नई जातिगत जनगणना की आवश्यकता नहीं है

हालांकि अदालत ने इन दलीलों को मानने से इनकार कर दिया।

देश में Census of India 2027 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह जनगणना डिजिटल माध्यम से की जा रही है और दो चरणों में पूरी होगी।

  • घरों और संपत्ति की जानकारी
  • 16 अप्रैल से 15 मई तक सर्वेक्षण
  • कई राज्यों में चरणबद्ध शुरुआत

दूसरा चरण

  • परिवार और व्यक्तियों की विस्तृत जानकारी
  • 2027 में मुख्य जनगणना प्रक्रिया

पहले चरण की शुरुआत कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में की गई है, जिनमें शामिल हैं:

  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
  • गोवा
  • कर्नाटक
  • लक्षद्वीप
  • मिजोरम
  • ओडिशा
  • सिक्किम
  • दिल्ली (NDMC और कैंट क्षेत्र)

यह भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी। नागरिकों को स्व-गणना (self-enumeration) का विकल्प भी दिया गया है, जिससे वे ऑनलाइन अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जातिगत जनगणना को लेकर चल रही कानूनी बहस पर फिलहाल विराम लग गया है। अब पूरा मामला सरकार की नीति और आगामी जनगणना प्रक्रिया पर केंद्रित हो गया है।

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