Thursday - 15 January 2026 - 7:05 PM

बीच चुनाव में बिखर गई नेपाली कांग्रेस,गगन थापा का दावा अब और मजबूत होगी पार्टी

यशोदा श्रीवास्तव 

:नेपाल की सबसे पुरानी और सबसे लंबे समय तक सरकार में रही नेपाली कांग्रेस अंततः दो फांक हो गई।

पार्टी में व्याप्त असंतोष और अंतर्विरोध का यह परिणाम है। पार्टी के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा पर कमजोर नेतृत्व का आरोप लग रहा था।

युवाओं की उपेक्षा और दिशा हीन होने का भी आरोप था। उन पर इन सब मसलों के हल और विचार विमर्श के लिए विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन की मांग जोर पकड़ रही थी।

देउबा इसके लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि राष्ट्रीय अधिवेशन सहित अन्य मुद्दों पर चुनाव बाद विचार और मंत्रणा होगी। पार्टी के दो महामंत्री गगन थापा और विश्व प्रकाश शर्मा इसके लिए तैयार नहीं थे।

इन दोनों ने पिछले रविवार को ही दो दिवसीय विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन आमंत्रित किया था। अधिवेशन की वैधता के सवाल पर गगन थापा का कहना था कि पार्टी विधान की धारा 17/2 के तहत यदि राष्ट्रीय परिषद के 54 प्रतिशत सदस्य और पदाधिकारी सहमत हैं तो विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन कभी भी बुलाया जा सकता है। पार्टी में प्रदत्त इसी विधान के तहत अधिवेशन बुलाया गया। इस अधिवेशन में शेर बहादुर देउबा सहित उनके निकटवर्ती अन्य पदाधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया था लेकिन वे लोग अधिवेशन में नहीं आए। 

पूर्व में आयोजित दो दिवसीय यह अधिवेशन चार दिवसीय हो गया जो काठमांडू के भृकुटी मंडप में आयोजित था। शेर बहादुर देउबा की सहमति के बिना आयोजित इस राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी के विभाजन की आशंका न केवल पार्टी के अन्य तमाम वरिष्ठ नेताओं को थी दूसरे राजनीतिक दलों को भी ऐसा ही अंदेशा था।

देउबा और उनके गुट के वरिष्ठ सदस्यों ने पार्टी को विभाजन से बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन वे असफल रहे।

अधिवेशन के चौथे दिन मामला तब बिगड़ गया जब देउबा गुट के कार्यवाहक सभापति पूर्ण बहादुर खड़का ने पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में में बैठक कर दोनों महामंत्री गगन थापा और विश्व प्रकाश शर्मा सहित उप महामंत्री फरकुल्लाह मंसूर को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस निष्कासन के बाद ही पार्टी में विभाजन की रूपरेखा तैयार हुई। बुधवार को देर रात अधिवेशन में ही गगन थापा को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। विश्व प्रकाश शर्मा और कमला भुसाल को उपसभापति और फरकुल्लाह मंसूर को महामंत्री चुना गया। पार्टी के अन्य सदस्यों का चुनाव भी बहुत सोच समझकर किया गया। सभी क्षेत्र,जाति और धर्म का ख्याल रखा गया।

पार्टी में विभाजन के बाद देउबा का अपने नेतृत्व वाली पार्टी का असली नेपाली कांग्रेस का दावा है तो गगन थापा का कहना है कि पार्टी विभाजित नहीं हुई,यह और मजबूत और संगठित हुई है। बहरहाल नेपाली कांग्रेस के विभाजन का मामला चुनाव आयोग में जाना तय है और वहीं असली नकली का फैसला भी होगा।

हां यह एक मामला जरूर पेचीदा हो गया कि चुनाव में देउबा के चयनित उम्मीदवार मैदान में होंगे या गगन थापा के? उच्च सदन के नामांकन की तिथि समाप्त हो गई है और उसके उम्मीदवार भी तय हो गए हैं जबकि निचले सदन के उम्मीदवारी के नामांकन की तिथि अभी शेष है। चुनाव पांच मार्च को है।

इसके पहले यदि देउबा और गगन थापा के नेतृत्व वाली कांग्रेस में फैसला नहीं आया तो देउबा द्वारा चयनित उम्मीदवार और रूख चुनाव चिन्ह पर ही उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे। लेकिन पार्टी के विभाजन का दंश उम्मीदवारों को झेलना तय है।

नेपाली कांग्रेस में मतभेद और असंतोष नया नहीं है लेकिन पार्टी कभी विभाजन के कगार पर नहीं पहुंची। स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला और केपी भट्टराई के बीच का विवाद किसे नहीं याद होगा। गिरिजा प्रसाद कोइराला ने तब अपने समर्थक पार्टी के 32 सांसदों के समर्थन से कम्युनिस्ट नेता मनमोहन अधिकारी को प्रधानमंत्री बनवा दिया लेकिन पार्टी नहीं टूटी। आज वैसी विकट स्थिति भी नहीं थी फिर भी पार्टी टूट गई।

नेपाली कांग्रेस नेपाल की राजनीति में केवल एक पार्टी भर नहीं है। इसके साथ स्वर्गीय वीपी कोइराला, गिरिजा प्रसाद कोइराला,केपी भट्टराई,सुशील कोइराला आदि का नाम जुड़ा होने के नाते इसकी एक विचारधारा है जो समावेशी विकास और जनसरोकार की बात करती है। स्वर्गीय वीपी कोइराला ने राजशाही के वक्त 1960 में ही लोकतंत्र का बिगुल बजा दिया था। इसके लिए उन्हें तत्कालीन राजा महेन्द्र के षड्यंत्रों का शिकार होना पड़ा था। लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा और निर्वसन तक का जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा था। हालांकि वीपी कोइराला लोकतंत्र की जंग जीत नहीं पाए थे। राजा महेन्द्र अपनी कुटिल चालों से नेपाली कांग्रेस में फूट डालकर राजशाही बचाने में सफल रहे थे जो लंबे समय तक चला। राजशाही विरोधी कई दलों के एक जुट विरोध और लंबे आंदोलन के बाद 2008 में नेपाल राजशाही से मुक्त हो पाया और यहां गणतंत्र का उदय हुआ। लोकतंत्र बहाली आंदोलन में नेपाली कांग्रेस के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता जिसका नेतृत्व वीपी कोइराला के बाद स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला ने किया था। गिरिजा प्रसाद कोइराला को नेपाल में गांधी के नाम से जाना जाता है। राजशाही के खिलाफ चले लंबे आंदोलन में जहां कम्युनिस्ट धड़ा हिंसा का रास्ता अख्तियार कर लिया था वहीं नेपाली कांग्रेस शांति पूर्वक आंदोलन का पक्षधर रहा है। इस आंदोलन को जनयुद्ध भी कहा गया क्योंकि इसमें हजारों लोगों की जानें भी गई थी।

नेपाल में प्रतिनिधि सभा चुनाव की सरगर्मी भी है।पार्टियां चुनाव की तैयारी में व्यस्त हैं। प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया भी तेज है ऐसे में नेपाली कांग्रेस का यह हाल इस पुरानी और भारत समर्थक राजनीतिक दल को कमजोर कर गई। पिछले दिनों नेपाल को जेन जी के हिंसात्मक आंदोलन से गुजरना पड़ा। तब एमाले नेता केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री थे जो नेपाली कांग्रेस के गठबंधन के साथ सरकार में थे। इस हिंसक आंदोलन में सारी दुनिया ने देखा कि आंदोलन कारियों ने किस तरह देउबा और उनकी पत्नी आरज़ू राणा को दौड़ा दौड़ा कर पीटा था। आंदोलन कारियों के निशाने पर यूं तो लगभग सभी पार्टियों के नेता थे लेकिन सर्वाधिक नुकसान देउबा और उनकी पत्नी को पहुंचाया गया। पार्टी के भीतर इसे कमजोर नेतृत्व माना गया और तभी से पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की बात भी उठनी शुरू हुई थी।

नेपाली कांग्रेस संघर्ष, त्याग और लोकतांत्रिक आंदोलनों की जीवंत विरासत है। जिस पार्टी ने नेपाल में लोकतंत्र की नींव रखी, राजतंत्र को चुनौती दी और गणतंत्र की स्थापना में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उस पार्टी का आज यह हाल चिंता जनक है। पार्टी के युवा नेताओं की अपेक्षा पर खरा नहीं उतर पाने वाले देउबा यदि स्वेच्छा से हट जाते तो पार्टी को विभाजन से बचाया जा सकता था। देउबा के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस देश में तेजी से बदलते राजनीतिक हालात के बीच पीछे छूट जा रही था जो एक सच्चाई है। फिलहाल संख्या बल और स्वीकार्यता के लिहाज से गगन थापा के नेतृत्व वाली कांग्रेस का पलड़ा भारी है। आसन्न संसदीय चुनाव में देउबा अथवा थापा के नेतृत्व वाली कांग्रेस में कितना दम है यह देखना होगा।

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