अधिनायकवाद की राह पर बढ़ रही है बालेन सरकार ?


डा. उत्कर्ष सिन्हा
भ्रष्टाचार-विरोधी लहर पर सवार होकर सत्ता में आई नेपाल की नयी युवा सरकार, अब आलोचना और अभिव्यक्ति को कुचलने की राह पर अग्रसर दिखाई दे रही है। अप्रैल 2026 के अंतिम दिनों में काठमांडू से लेकर तराई तक फैले हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद सूचना मंत्रालय, नेपाल सेना और पुलिस ने सिलसिलेवार सख्त निर्देश जारी किए हैं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बोलते हैं। छात्र संगठनों पर कार्रवाई, भारत-नेपाल सीमा पर कठोर टैक्स नीतियां और गृह मंत्री के काले कारोबार के आरोपों के खिलाफ सड़कों पर उतरी जनता को आंसू गैस की बौछारें, डंडों की बरसात और सामूहिक गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा है ।
नेपाल के प्रमुख पत्रकारों ने इसे ‘नई तानाशाही का उदय’ घोषित कर दिया है, जबकि पीएम बालेन शाह इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता’ बता रहे हैं। यह नाटकीय मोड़ न केवल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की चमक को फीका कर रहा है, बल्कि नेपाल के अस्थिर राजनीतिक इतिहास को एक और काला पन्ना जोड़ने की ओर इशारा कर रहा है, जहां लोकतंत्र हमेशा सत्ता की भेंट चढ़ता रहा है।
बीते 48 घंटों के आंदोलन गहरे असंतोष की उपज हैं। 23 अप्रैल को काठमांडू के स्कूलों से नौजवान निकले, बालेन के ‘चाट संग भंडा’ अभियान को खोखला साबित करते हुए संसद के बाहर डट गए। 24 अप्रैल तक यह विद्रोह भयावह रूप धारण कर चुका था – बॉर्डर पर पॉलीथिन प्रतिबंध और सौ रुपये से अधिक सामान पर भारी शुल्क ने पर्यटकों को भड़का दिया। साथ ही गृह मंत्री सुधन गुरुंग के भ्रष्टाचार कांड ने चिंगारी को हवा दे दी। पुलिस ने सौ से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हवालात में ठूंस दिया, और सेना ने पूरे देश में सुबह छह से शाम पांच तक प्रदर्शन-विहीन घेराबंदी का आदेश जारी किया। सूचना मंत्रालय ने फर्जी खबरों के बहाने फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब समेत 26 प्लेटफॉर्म्स पर सेंसरशिप थोप दी है और पत्रकारों को आधिकारिक चैनलों तक सीमित रखा। नेपाल सेना ने कर्फ्यू की संभावना के संकेत भी दिए , और पुलिस ने भड़काऊ पोस्ट्स पर एफआईआर दर्ज करने के फरमान जारी किए। सरकार का तर्क है कि हिंसा को कुचलना आवश्यक है, लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग इसे लोकतांत्रिक आवाज का गला घोंटना मान रहा है।
आलोचना-दमन की यह प्रवृत्ति नयी सरकार के कार्यप्रणाली के स्पष्ट संकेत दे रही है। मंत्रालय का सेंसरशिप फरमान 2025 के मीडिया-बैन की काली याद ताजा कर रहा है,जिसके बाद युवा सड़को पर उतर आये थे और सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ा था ।
काठमांडू पोस्ट के चंद्रा खड्का जैसे दिग्गज पत्रकारों ने चेतावनी दी, ‘बालेन का सुधार-वाचा अब दमन का मुखौटा बन गया – यह डिजिटल गुंडागर्दी है।’ नेपाल के पत्रकार फोरम ने मीडिया-अंधकार की चिंता जताई है और , वैश्विक प्रेस इंडेक्स में नेपाल की गिरती रैंकिंग ने सवालों का सैलाब ला दिया है । पीएम बालेन शाह का ट्वीट – ‘आलोचना ठीक, अराजकता नहीं’ – जमीनी सच्चाई से कोसों दूर लगता है। सेना-पुलिस के आदेश शांतिपूर्ण सभा को भी अपराधी ठहरा रहे हैं, जो संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। यदि यह जारी रहा, तो RSP का युवा-समर्थन खिसकेगा, जो मार्च चुनावों की कुंजी था। दमन लोकतंत्र को कमजोर करता है, विद्रोह को जन्म देता है।
नेपाल का वर्तमान संकट ऐतिहासिक अस्थिरता का आईना है। 2026 चुनावों में RSP की जीत ने नेपाली कांग्रेस व UML को धूल चटा दी थी । रैपर-से-पीएम बने बालेन शाह ने 100-सूत्री क्रांति का वादा किया – जिसमे संविधान-पुनर्लेखन, 1991-कालीन संपत्ति-जांच, भ्रष्टाचार-मुक्ति शामिल था । लेकिन एक माह में उनकी ज्यादातर नीतियां जन-विरोधी साबित हुईं है । जबकि विपक्षी खेमे – UML, NC, माओवादी – फूटग्रस्त हैं, लेकिन सही अवसर का इंतजार कर रहे हैं । सत्तधारी RSP का आंकड़ा निचले सदन में मजबूत है लेकिन , ऊपरी सदन में कमजोर कमजोर है ।
नेपाल बदलाव चाहता है, लेकिन दमन से नहीं। बालेन की परीक्षा निर्णायक है – सुधारक बने या तानाशाह ये उनपर निर्भर करता है क्यूंकि यह बात तो स्पस्ट है कि लोकतंत्र सहनशीलता मांगता है, न कि सेंसरशिप।
यह मोड़ नेपाल के भविष्य का फैसला करेगा।



