ईरान भारी, ट्रंप की हार और अमेरिकी साम्राज्यवाद को नया सबक

विश्लेषण

डा. उत्कर्ष सिन्हा
इतिहास की एक और कड़ी में अमेरिका और इजरायल की संयुक्त आक्रामकता ईरान के सामने धूल चाट गई है। हालिया युद्धविराम समझौता, जिसमें ईरान की शर्तें स्पष्ट रूप से भारी पड़ती दिख रही हैं, न सिर्फ मध्य पूर्व की भू-राजनीति को नया आकार दे रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलते समीकरणों को भी उजागर कर रहा है।
इस युद्ध का विश्लेषण हमें बताता है कि अमेरिका और इजरायल के मूल उद्देश्य—रिजीम चेंज, न्यूक्लियर प्रोग्राम को डिरेल करना और मिसाइल क्षमता को कुचलना—कुछ भी हासिल नहीं हो सका। इसके विपरीत, ईरान ने हमलों का सामना करते हुए अपनी सैन्य और कूटनीतिक दृढ़ता बनाए रखी, हॉर्मुज जलडमरूमध्य को अपनी शर्तों पर खोला और सीजफायर के लिए अपनी मांगों को मनवाया। यह समझौता न सिर्फ ईरान की जीत है, बल्कि ट्रंप प्रशासन की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर हार है।
युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इजरायल के ऑब्जेक्टिव बिल्कुल स्पष्ट थे। रिजीम चेंज का वादा , न्यूक्लियर प्रोग्राम को हमेशा के लिए खत्म करने का दावा और ईरान की मिसाइल क्षमता को तहस-नहस करने की योजना—ये सब 40 दिनों की जंग में धरे-धरे रह गए।
नाटो सहित पूरे यूरोप ने ट्रंप के जाल से दूरी बना ली। यूरोपीय देशों ने ट्रंप की अपील को नजरअंदाज किया और ईरान से अपने स्तर पर बातचीत जारी रखी। हॉर्मुज प्रभावित देशों को ट्रंप ने सीधे संदेश दिए, लेकिन कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ। ट्रंप की धमकियां—ईरान की मिलिट्री पॉवर खत्म करने की, पूरी सभ्यता मिटाने की—आखिरकार बेअसर साबित हुईं। यह न सिर्फ सैन्य विफलता थी, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति की नैतिक और रणनीतिक हार भी थी।
ट्रंप अपने ही देश में कितने दबाव में थे, इसका आकलन और भी जरुरी हो जाता है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन पर दोहरी मार पड़ी। एक तरफ घरेलू जनमत था, जो लंबे युद्ध और उसके आर्थिक परिणामों से त्रस्त था। हॉर्मुज संकट के चलते वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, जिसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा था। ट्रंप ने चुनावी वादों में ‘त्वरित विजय’ और ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा दिया था, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने से उनकी अपनी पार्टी के अंदर भी असंतोष बढ़ गया। रिपब्लिकन हॉक्स ने उन्हें ‘कमजोर’ दिखाने की कोशिश की, जबकि डेमोक्रेट्स ने युद्ध को ‘अनावश्यक साहस’ बताकर संसद में दबाव बनाया।
यूरोप की दूरी ने ट्रंप को और बेबस कर दिया। घरेलू स्तर पर अर्थव्यवस्था की चिंता, तेल आयात पर निर्भरता और युद्ध के खर्चे ने ट्रंप को इतना दबाव में डाल दिया कि उन्हें अंततः सीजफायर स्वीकार करना पड़ा। यह दबाव सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी था—अमेरिकी कंपनियां, तेल लॉबी और आम नागरिक, सब एक साथ खड़े हो गए थे। ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ वाली रणनीति घर में ही उलट गई। अब लैटिन अमेरिका में अपना वर्चस्व बढ़ाने की ट्रंप की कोशिशे भी कुंद होंगी ।
ईरान के लिहाज से देखें तो यह युद्ध उसकी रणनीतिक विजय का प्रतीक है। ईरान ने न सिर्फ हमला झेल लिया, बल्कि प्रतिरोध की नई मिसाल कायम की। अमेरिकी-इजरायली हमलों का सामना करने के दौरान ईरान की रिजीम के कई लेयर नष्ट हो गए, फिर भी उत्तराधिकारियों की श्रंखला के साथ उसने दृढ़ता बनाए रखी। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जो युद्ध के मूल उद्देश्यों में दूर-दूर तक शामिल नहीं था, उसे ईरान ने अपनी शर्तों पर खोलकर सीजफायर के लिए हामी भरी। ईरान को आर्थिक नुकसान भले ही हुआ, लेकिन मध्य पूर्व में ईरान की नई पोजिशनिंग मजबूत हो गई। ईरान ने हिजबुल्ला और हुती को सक्रिय कर इजरायल के खिलाफ तीन मोर्चे खोल दिए। यह रणनीति इतनी प्रभावी साबित हुई कि इजरायल को अपना मुख्य फोकस ईरान से हटाकर लेबनान की ओर शिफ्ट करना पड़ा। समझौते में अगर इजरायल को लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ आईडीएफ ऑपरेशन रोकना पड़ा, तो यह उसके लिए बड़ा झटका होगा। नेतनयाहू के लिए यह नागवार होगा, लेकिन इजरायल शायद जल्दी इन ऑपरेशनों को रोकेगा ।
इजरायल के नजरिए से यह युद्ध और भी दर्दनाक रहा। इजरायल के उद्देश्य भी अमेरिका जैसे ही थे, जो 40 दिनों में हासिल नहीं हो सके। उल्टा, ईरान ने पूरे मध्य पूर्व को हमले की जद में ले लिया । हिजबुल्ला और हुती के सक्रिय होने से इजरायल को तीन मोर्चों पर लड़ना पड़ा। सीजफायर की शर्तें अगर लेबनान में ऑपरेशन रोकने की मांग करती हैं, तो नेतनयाहू सरकार के लिए घरेलू राजनीतिक संकट खड़ा हो जाएगा। इजरायल की सुरक्षा नीति पर सवाल उठेंगे और उसकी ‘आईरन डोम’ वाली छवि धूमिल हो गई है। साथ ही इस समय इजराईल पूरी दुनिया के लिए एक खलनायक के रूप में सामने आया है और लम्बे समय से उसे मिलने वाला यूरोपीय समर्थन भी ख़त्म होता दिखाई दे रहा है ।
मध्य पूर्व के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह समझौता एक ऐतिहासिक मोड़ है। ईरान ने अमेरिकी सहयोगियों को ऐसा सबक सिखाया कि अब मध्य पूर्व के देश खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। नतीजा—हथियारों की नई होड़ शुरू हो गई है। हर देश अपनी आत्मरक्षा का अधिकार अपने हाथ में लेना चाहता है।
पाकिस्तान को अमेरिका ने इस युद्ध में अपनी नाक बचाने के लिए आगे किया, लेकिन अमेरिका की नाक नहीं बची, उल्टा पाकिस्तान को नया जियो-पॉलिटिकल स्पेस मिल गया। पाकिस्तान ने ईरान से बातचीत में अमेरिकी प्रतिनिधि की भूमिका निभाई और ईरान ने भी इसे मंजूर किया, क्योंकि मध्य पूर्व के बाकी देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका-इजरायल के साथ थे। बैकग्राउंड में चीन और रूस ने बहरीन के प्रस्ताव पर यूएनएससी में वीटो लगाकर अपनी ताकत दिखाई। पाकिस्तान ने इस अवसर को भी पकड़ा किया। पूरा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि अमेरिकी एकधिकारवाद का दौर समाप्त हो रहा है।
भारत की स्थिति सबसे रोचक रही। इसे ‘दूध का जला छांछ फूंक-फूंक कर पीने’ वाला रवैया कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री ने हॉर्मुज संकट की तुलना कोरोना से की, लेकिन ताली-थाली बजाने वाली कोई स्थिति नहीं बनी। भारत ने डिप्लोमेटिक चैनल बनाए रखे, ईरान से संबंध साधे, लेकिन अमेरिका से दूरी भी बनाई। इजरायल और ईरान के बीच बैलेंस बनाना भारतीय कूटनीति के लिए सबसे बड़ा चैलेंज था। यह मोदी सरकार के लिए बैक टू बेसिक्स की तरफ लौटने जैसा है, क्योंकि हालिया दिनों में इजराईल की तरफ भारत का झुकाव ज्यादा तेजी से बढ़ा था । यह संतुलित रुख भारत के लिए अच्छा है, लेकिन आगे चुनौतियां बाकी हैं।
समझौते के बाद का सफर अब लंबा और पेचीदा है। दोनों पक्षों की अपनी-अपनी शर्तें हैं। ईरान अपनी न्यूक्लियर और मिसाइल क्षमता पर कोई समझौता नहीं करना चाहता, जबकि इजरायल और अमेरिका इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं। अगर कोई पक्ष लचीला नहीं हुआ, तो युद्ध क्षेत्र फिर सक्रिय हो सकता है। फाइल सही कहती है कि इजरायल इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन कुल मिलाकर, यह समझौता डिप्लोमेसी की जीत है।
इस युद्ध ने कई बड़े सबक दिए हैं। सबसे पहला—सैन्य शक्ति अकेले पर्याप्त नहीं होती। ईरान ने प्रतिरोध, गठबंधनों और कूटनीति से दिखाया कि छोटे देश भी महाशक्तियों को झुका सकते हैं। दूसरा सबक—मध्य पूर्व अब अमेरिका की जेब नहीं रहा। चीन-रूस का वीटो और पाकिस्तान की भूमिका इसकी पुष्टि करते हैं। तीसरा—ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति घरेलू दबाव में टूट गई। अमेरिकी जनता युद्धों से थक चुकी है। चौथा—भारत जैसे देशों को अब और सतर्क रहना होगा। ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और बहुपक्षीय संबंधों का संतुलन बनाना जरूरी है।
अंत में, ईरान युद्ध का यह समझौता सिर्फ एक सीजफायर नहीं, बल्कि नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत है। जहां अमेरिका-इजरायल की आक्रामकता असफल रही, वहीं ईरान की दृढ़ता ने मध्य पूर्व को नई दिशा दी। ट्रंप पर घरेलू दबाव ने साबित किया कि कोई भी नेता अनंत युद्ध नहीं लड़ सकता। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका इस सबक को समझेगा या फिर पुरानी गलतियों को दोहराएगा?
इतिहास गवाह है—जो सबक नहीं सीखता, वह बार-बार हारता है। ईरान ने दिखा दिया कि प्रतिरोध की आग कभी बुझती नहीं। मध्य पूर्व अब नया अध्याय लिख रहा है—जहां शक्ति संतुलन बहुपक्षीय हो रहा है और कूटनीति ही अंतिम विजेता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अन्तराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)



