देवत्व की चाह में खोता हमारा मनुष्य जन्म


स्मिता जैन,” रेवा”
देवत्व जिसे इस धरती का हर जीव प्राप्त करना चाहता है और उसके लिए वह जिस भी योनि में है अपने आप में सुधार करता है। अपनी इंद्रियों को जीतने के लिए प्रयत्न करता है और अच्छाई की राह पर चलने की हर संभव कोशिश करता है और अनंत युगों तक वह अपने आप को इसी क्रम में सुधारता जाता है और संभवत कई युगों के बीत जाने के बाद शायद वह देवत्व को प्राप्त कर जाता है।
देवत्व मनुष्य के लिए एक काल्पनिक दुनिया जिसकी वह कल्पना करता है और सोचता है कि देवत्व प्राप्त होने पर उसे कोई भी काम नहीं करना पड़ेगा ।उसके जीवन में कोई भी संघर्ष नहीं होगा और जब वह देवत्व को प्राप्त कर लेगा तो कल्पवृक्षों से उसकी सारी इंद्रियों की इच्छाओं की पूर्ति हो जाएगी एवं कई देवियों के मिलने पर वह उनके साथ स्वर्गों का सुख भोगता रहेगा।
कल्पना कीजिए की एक सप्ताह तक हमें किसी भी प्रकार का कार्य न करना पड़े, ना खाना खाना पड़े ,ना बनाना पड़े, ना नहाना पड़े, ना स्कूल जाना पड़े ,ना ऑफिस जाना पड़े, ना टीवी देखना पड़े ,ना मोबाइल चलाना पड़े, ना ही दोस्तों से मिलना पड़े और ना कहीं घूमने जाना पड़े आदि आदि अनंत अनेकानेक काम जो एक सहज सी जीवनचर्या में हम दिन भर करते हैं ।यदि हमें नहीं करना पड़ेगा तो हम किस तरह जिएंगे ?
शायद हम बोर हो जाएंगे ,उदास हो जाएंगे और नीरस सा यह जीवन लगने लगेगा क्योंकि हम जन्म लेते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते हैं ।अपने और अपनों के लिए कर्तव्य करते हैं, इच्छाओं की पूर्ति करते हैं और आनंदपूर्वक संघर्ष करते हुए हम अपना सारा जीवन यापन करते हैं।
जब हमारे जीवन में कोई किसी भी तरह का संघर्ष, इच्छाएं नहीं होगी और हम उनके लिए काम भी नहीं करेंगे तो हमें अपना ही जीवन एक बोझिल सा लगने लगेगा और हम खुद से ही शायद पूछने लगेंगे कि आखिर हमारा जन्म किस लिए हुआ है? है ना।
क्या हम बस दिन रात सुखों को भोंगते रहेंगे ।अपने पति और पत्नियों के साथ बिना परिवार और बच्चों के किसी काम को किए हुए?
शायद वह जीवन हमारे लिए बहुत ही कठिन हो जाएगा जीना। जब हमें किसी भी तरह का व्यक्तिगत, सामाजिक ,सार्वजनिक ,आर्थिक, राजनीतिक आदि कोई भी काम नहीं करना पड़ेगा।
ज़रा सोचिए ईश्वर ने हमें कितना सुंदर जीवन दिया है कि हम प्रतिदिन विविधता पूर्ण कार्य को संपादित करते हैं और अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल भी करते हैं और बड़ा ही इंद्रधनुषीय जीवन यापन करते हैं।
किन सदियों से मानव जीवन को धर्म के द्वारा यह बताया जाता है कि हमें स्वर्ग प्राप्त करना है। मृत्यु के पश्चात लेकिन वही धर्म यह बताना भूल जाता है कि हम जीते जी स्वर्ग प्राप्त कर सकते हैं ।
जब हम अपने परिवार, समाज, देश ,जाति और जीव के रूप में हम अपनी धरती पर बहुत ही अच्छा सभी का ध्यान रखते हुए जियो और जीने दो की भावना के साथ एक दूसरे को सम्मान, अपार स्नेह, प्यार, संवेदनशीलता, करूणा ,दया आदि देते हैं तो हमारा जीवन हजारों स्वर्ग के जीवन से भी बड़ा हो जाता है क्योंकि हम अनंत स्वर्गो से भी बड़े अथाह ,निस्वार्थ भावनाओं के भंडार से भरा हुआ हमारा अनंत, असीमित अथाह हृदय है जो सभी के लिए जीता है और सबके साथ भी जीता है।
कितना खूबसूरत होता है ना मनुष्य जीवन जैसे हम यूं ही स्वर्ग की इच्छाओं की पूर्ति के लिए बर्बाद करते रहते हैं ।युद्ध करते हैं, कुशासन लाते हैं, समाज को ,देश को, मानव जाति को भ्रमित करते हैं ।
अनंत-अनंत रूपों से हम एक बहरूपिया बनाकर जब अपने ही आसपास के और आश्रित लोगों को ठगते हैं तो क्या इस तरह कोई भी व्यक्ति जीवन जीते हुए और जीवन समाप्त करने के बाद भी क्या वह स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकता है।
शायद कभी भी वह स्वर्गलोक को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि स्वर्ग को प्राप्त करने के लिए तो हमारे अंदर दया , करूणा ,अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, व्यभिचार हीनता,आदि सद्गुणों से युक्त होना पड़ता है लेकिन मनुष्य इन सब चीजों के अतिरिक्त अनेकानेक विकृतियों के साथ जीता है और कल्पना करता है कि वह स्वर्ग प्राप्त करेगा।
इस चक्कर में वह आतंकवाद, युद्ध , सामाजिक ,धार्मिक वैमनस्यता, भेदभाव,धार्मिक उन्माद और भी न जाने कितनी ही विपरीत विचारधाराओं को समाज में स्थापित करता है या करने की कोशिश करता है।
वह भूल जाता है कि ईश्वर ने उसे देवों से बढ़कर मनुष्य जन्म दिया है जिसे वह सहज रूप से जी कर और दूसरों को भी सहजता से जीवन यापन करने के तरीके बताकर अपना और दूसरों का आत्म कल्याण कर सकता है और इसी धरती पर वह स्वर्ग तो क्या मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है , स्वर्ग बना सकता है और अनंत आनंद के साथ हम सभी के बीच में जीवित रह सकता है युगों युगों तक।
क्या जरूरत है हमें कोई मूर्ति के रूप को किसी मंदिर आदि पूजा स्थलों को स्थापना करें , पूजा करें क्योंकि जो नेकदिल इंसान दिलों में रहता है उसके लिए हर मंदिर ,मस्जिद, गुरुद्वारा आदि हर पूजा स्थल बड़ा ही छोटा और अस्तित्व हीन होता है क्योंकि इंसानों के हृदय में रहने के लिए तो भगवान भी तरसते हैं।
उसे किसी मंदिर की जरूरत नहीं होती,किसी आशियाने की जरूरत नहीं है, किसी स्वर्ग की भी जरूरत नहीं होती क्योंकि वह शरीर में रहकर भी अपने आप को सिद्ध बन सकता है और हर रूप के जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो सकता है।
अतः हमें जरूरी नहीं है तपस्या करने की हम मानव जाति के लिए अच्छे कार्य करके बहुत ही कम समय में सिद्ध पुरुष बन सकते हैं।



