विक्टिम कार्ड कब तक खेलेगा इजरायल?

डा. उत्कर्ष सिन्हा

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया ने यहूदियों के प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई। हिटलर के नरसंहार में 60 लाख यहूदियों की हत्या ने पूरी मानवता को झकझोर दिया। जर्मनी ने अपने अपराधों पर शोक व्यक्त किया, मुआवजे दिए और होलोकॉस्ट की स्मृति को संरक्षित रखा। संयुक्त राष्ट्र के 1947 के विभाजन प्रस्ताव और 1948 में इजरायल राज्य की स्थापना में विश्व समुदाय ने सक्रिय भूमिका निभाई। अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ जैसे देशों ने यहूदियों को अपना देश दिलाने में मदद की। लेकिन क्या यह सहानुभूति अनंतकाल तक चलेगी? आज इजरायल पर फिलिस्तीनियों के उत्पीड़न, गाजा में बच्चों की हत्याओं और ईरान के साथ तनाव के आरोप लग रहे हैं।

यूरोप के कई देश उसे ‘आतंकी’ कहने लगे हैं, अमेरिका में यहूदियों के प्रति असंतोष उबाल ले रहा है। क्या इजरायली सरकार ने अपने जियोनिस्ट तौर-तरीकों से पूरी दुनिया को अपने खिलाफ कर लिया है? यह प्रश्न आज वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन चुका है।

इजरायल की स्थापना जियोनिज्म की विचारधारा पर टिकी हुई है, जो थियोडोर हर्जल द्वारा 19वीं सदी के अंत में प्रतिपादित की गई। यहूदियों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग जायज थी, लेकिन इसकी प्राप्ति के बाद नीतियां विवादास्पद हो गईं।

1948 के अरब-इजरायल युद्ध से ही फिलिस्तीनियों का विस्थापन शुरू हो गया, जिसे ‘नकबा’ कहा जाता है। लाखों फिलिस्तीनी शरणार्थी बने। 1967 के छह दिवसीय युद्ध में इजरायल ने वेस्ट बैंक, गाजा, गोलान हाइट्स और पूर्वी जेरूसलम पर कब्जा कर लिया। संयुक्त राष्ट्र के दर्जनों प्रस्तावों के बावजूद इजरायल ने इन क्षेत्रों में बस्तियां बसाईं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध हैं। आज वेस्ट बैंक में 7 लाख से अधिक इजरायली बस्तियां हैं, जो फिलिस्तीनियों की जमीन हड़प रही हैं। यह जियोनिस्ट विस्तारवाद का प्रतीक है, जो ‘विक्टिम कार्ड’ को हथियार बनाकर जारी है। हर आलोचना को ‘एंटी-सेमिटिज्म’ का ठप्पा लगाकर दबा दिया जाता है।

गाजा पट्टी इजरायल की नीतियों का सबसे क्रूर उदाहरण है। 2005 में इजरायल ने गाजा से एकतरफा समझौता  किया, लेकिन हवाई, समुद्री और स्थलीय नाकाबंदी लगा दी। हमास के उदय के बाद से 2007 से यह नाकाबंदी जारी है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, गाजा दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र है, जहां 20 लाख लोग 365 वर्ग किलोमीटर में कैद हैं। बिजली की औसत आपूर्ति 4-6 घंटे, पानी दूषित और चिकित्सा सुविधाएं न्यूनतम हैं ।

इजरायल के सैन्य अभियानों—2008-09, 2012, 2014, 2021 और अब 2023-24 के हमास हमले में हजारों नागरिक मारे गए। नवंबर 2023 के हमास हमले में 1200 इजरायली मारे गए, लेकिन इजरायल की जवाबी कार्रवाई में 40 हजार से अधिक फिलिस्तीनी मारे गए, जिनमें आधे महिलाएं और बच्चे थे । बमबारी में मलबे तले दबे गाजा के छोटे बच्चों की तस्वीरें दुनिया भर में गुस्सा पैदा कर रही हैं। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर ‘युद्ध अपराध’ के आरोप लगाए हैं।

अपने ‘विक्टिम कार्ड’ का इस्तेमाल इजरायल ने हमेशा चतुराई से किया। होलोकॉस्ट की स्मृति को हर बहस में लाकर नैतिक ऊंचाई हासिल की जाती है। लेकिन अब यह रणनीति फेल हो रही है। 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद इजरायल को शुरुआती सहानुभूति मिली, लेकिन गाजा में अनुपातहीन हिंसा ने समीकरण बदल दिया।

दक्षिण अफ्रीका ने दिसंबर 2023 में आईसीजे में इजरायल के खिलाफ ‘नरसंहार’ का मुकदमा दायर किया। आईसीजे ने जनवरी 2024 में प्रोविजनल आदेश जारी कर गाजा में सहायता सुनिश्चित करने को कहा। ब्राजील, कोलंबिया, चिली जैसे लैटिन अमेरिकी देशों ने इजरायल के राजदूतों को निष्कासित किया। यूरोप में भी बदलाव बड़ा है: स्पेन, आयरलैंड और नॉर्वे ने मई 2024 में फिलिस्तीन को मान्यता दे दी  । नीदरलैंड्स की संसद ने तो इजरायल को ‘आतंकवादी राज्य’ कह दिया । फ्रांस और जर्मनी जैसे परंपरागत सहयोगी भी असहज हैं। जर्मनी ने हथियार निर्यात रोक दिया है और यूरोपीय संघ में फिलिस्तीनी सहायता पर बहस तेज है।

इजरायल का सबसे मजबूत सहयोगी रहे अमेरिका में नागरिको का गुस्सा अब फूट रहा है। बाइडेन प्रशासन ने 2024 चुनावों से पहले इजराईल की गाजा नीति पर दबाव डाला, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में वीटो का सहारा ले लिया । युवा अमेरिकियों, विशेषकर डेमोक्रेट्स और प्रवासी समुदाय में इजरायल विरोध बढ़ने लगा है । कैंपस प्रोटेस्ट जारी है और  कोलंबिया, हार्वर्ड, यूसीएलए जैसे विश्वविद्यालयों में ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे गूंज रहे हैं ।

प्यू रिसर्च के अनुसार, 18-29 आयु वर्ग के 60% अमेरिकी इजरायल की कार्रवाई को ‘अनुचित’ मानते हैं। यहूदी समुदाय में भी विभाजन है, जे स्ट्रीट जैसे संगठन नरम रुख अपनाए हुए हैं और नेटन्याहू सरकार पर ‘अपार्टहाइड’ के आरोप लगे हैं । ईरान के साथ तनाव ने इसे चरम पर पहुंचा दिया।  

ईरान-इजरायल टकराव जियोनिस्ट नीतियों का परिणाम है। इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए साइबर हमले (स्टक्सनेट), वैज्ञानिक हत्याएं और हवाई हमले किए। ईरान समर्थित हिजबुल्लाह, हमास और हूती विद्रोहियों के जरिए जवाब देता है। लेबनान सीमा पर संघर्ष तेज है, जहां 2024 में सैकड़ों मारे गए। अमेरिका ने इजरायल को हथियार दिए, लेकिन क्षेत्रीय युद्ध से डर रहा है। सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश अब इजरायल से दूरी बना रहे हैं।

अब्राहम समझौते के बावजूद फिलिस्तीन मुद्दा बड़ी अड़चन है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने इजरायल को ‘आतंकवादी’ कहा और इजराईल के साथ व्यापार रोक दिया । मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देश तो पहले से ही विरोधी हैं। वैश्विक दक्षिण—भारत, ब्रिक्स देश भी असहज हैं। भारत ने इजरायल से हथियार तो खरीदे, लेकिन गाजा पर संतुलित बयान दिए।  

क्या इजरायल ने अपनी जियोनिस्ट नीतियों से दुनिया को खिलाफ कर लिया? जवाब है हां , लेकिन अभी आंशिक रूप से। नेटन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार—बेन्जामिन नेतन्याहू, इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच—जियोनिज्म के उग्र रूप को बढ़ावा दे रही है। वे ‘ग्रेटर इजरायल’ की कल्पना करते हैं, जिसमें फिलिस्तीनी राज्य का कोई स्थान नहीं। गाजा को ‘मिस्र को सौंपने’ या वेस्ट बैंक को हड़पने की बातें हो रही हैं।  

लेकिन इजरायल की सुरक्षा चिंताएं भी कुछ हद तक वास्तविक हैं, हमास, हिजबुल्लाह उसके लिए खतरनाक बने हुए हैं । समस्या यह है कि प्रतिक्रिया अनुपातहीन है, जो नैतिक आधार खो रही है। ‘विक्टिम कार्ड’ अब ‘आक्रामक कार्ड’ बन गया है।

भविष्य क्या कहता है?

इजरायल को अपनी नीतियां बदलनी होंगी। दो-राष्ट्र सिद्धांत—1967 की सीमाओं पर फिलिस्तीन राज्य—एकमात्र रास्ता है। अमेरिकी दबाव बढ़ेगा। यूरोप अब इजराईल से अलग हो रहा है। आर्थिक बहिष्कार यानि बीडीएस आंदोलन तेज हो रहा है। इस कारण इजरायल की अर्थव्यवस्था, जो तकनीक पर टिकी है, प्रभावित हो सकती है। आंतरिक रूप से नेटन्याहू पर भ्रष्टाचार के मुकदमे और उनके खिलाफ प्रोटेस्ट जारी हैं। अब अगर इजराईल में कोई मध्यमार्गी सरकार आती है तभी बदलाव की समभावना है अन्यथा, इजरायल अकेला पड़ जाएगा। होलोकॉस्ट की स्मृति पवित्र है, लेकिन वर्तमान हिंसा उसे कलंकित कर रही है। फिलिस्तीनियों को न्याय मिले बिना शांति असंभव है। दुनिया अब सहानुभूति से आगे न्याय की मांग कर रही है।

इजरायल का ‘विक्टिम कार्ड’ अब समाप्ति की ओर है, यह कब तक चलेगा, यह उसकी नीतियों पर निर्भर करता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतराष्ट्रीय मामलों के विशेषग्य हैं)

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