डंके की चोट पर : मैं विकास दुबे हूँ कानपुर वाला

शबाहत हुसैन विजेता
महाकाल के दरबार में हाजिरी लगाने के बाद पांच लाख के इनामी गैंगस्टर ने चिल्ला-चिल्ला कर बताया कि मैं विकास दुबे हूँ कानपुर वाला. अपनी पहचान बताने के बाद उसने मध्य प्रदेश की पुलिस बुलाने को कहा. उसने खुद कहा वह सरेंडर करना चाहता है. पुलिस आई, उसने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया.
अपने दरवाज़े पर खाकी वर्दी वालों के खून से होली खेलने के बाद फरार हुआ गैंगस्टर खुद को खाकी वर्दी से बचाने के लिए लगातार भाग रहा था. वह बार-बार पीछे मुड़कर देखता तो उसका कोई न कोई साथी इनकाउंटर का शिकार हो चुका होता.
घर से भागने के बाद उसने देखा कि उसकी ही जेसीबी उसका घर ढहा रही है. जिन गाड़ियों को उसने अपने शौक के लिए खरीदा था वो कबाड़ में तब्दील की जा रही हैं. उसने देखा कि उसका प्रिय अमर दुबे जिसकी उसने अपने घर पर शादी कराई थी और जिस शादी में वह घंटों नाचा था उसकी बीवी शादी के सिर्फ नौ दिन बाद विधवा बना दी गई है.
वह लगातार भाग रहा था. कानपुर से नोएडा, नोएडा से फरीदाबाद, फरीदाबाद से फिर नोएडा. उसकी काली कमाई पर ऐश करने वाले उसकी मदद को तैयार नहीं हो रहे थे. वह दिल्ली में सरेंडर करना चाहता था लेकिन वकील को इसके लिए 50 हज़ार फीस चाहिए थी. उसके पास नगद 50 हज़ार नहीं थे और वकील एटीएम से पैसे निकालने को तैयार नहीं था.
फरीदाबाद में मददगार थे तो बस उसे होटल में ठहरा सकते थे. होटल में साथ में ठहरा 16 साल का कार्तिकेय पकड़ा जा चुका था. उसके पकड़े जाने के बाद वह मध्य प्रदेश की तरफ दौड़ पड़ा था. मध्य प्रदेश जाते हुए वह देख रहा था कि कानपुर वापस जा रहा कार्तिकेय अपने शहर से कुछ किलोमीटर पहले पुलिस की गोली का शिकार बन गया. कार्तिकेय की मौत के बाद उसने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी थी. डर की सिहरन बढ़ती जा रही थी. भतीजा अतुल सिर्फ दो गोलियां खाने के बाद लाश में तब्दील हो गया था. उज्जैन करीब आ रहा था लेकिन इधर लखनऊ वाले घर के नक़्शे की जांच शुरू हो गई थी. कानपुर के बाद लखनऊ का घर गिराए जाने की तैयारी हो चुकी थी.
विकास ने जुर्म की दुनिया से करोड़ों कमाए थे. दो-चार घर गिर जाने से उस पर कोई फर्क नहीं था. उसके पास तो दुबई और थाईलैंड में भी घर थे लेकिन रिश्तेदारों और करीबियों की लगातार गिरती लाशें बर्दाश्त के बाहर होती जा रही थीं. एक रिश्तेदार के आंसू सूख नहीं पाते थे कि तब तक दूसरे के सीने के पार निकल जाती थी गोली.
लगातार चलती गोलियां उसके खुद के दिमाग को छेदे दे रही थीं. उसका एक पैर कमज़ोर था लेकिन मज़बूत पैर वालों से कहीं तेज़ वह दौड़ रहा था. हर मोड़ पर पुलिस मौजूद थी लेकिन सूबों की सरहदें वह लांघता जा रहा था और हर जगह पुलिस उसके निकल जाने के बाद पहुँच रही थी.
वह जानता था कि पुलिस उसे कभी पकड़ नहीं पायेगी लेकिन कूड़े के ढेर पर बिठाई गई बीवी और अपराधी की तरह आत्मसमर्पण की मुद्रा में हाथ उठाये उसका नाबालिग बेटा उसकी राह में स्पीडब्रेकर बन गए थे. रिश्तेदारों और करीबियों की मौत ने उसे थका दिया था.
रिश्तेदारों की मौत के बाद उसकी समझ में आने लगा था कि खाकी वर्दी वालों का भी घर होता है. उन्हें भी मौत का दर्द होता है. उनके घर में भी रोने वाले होते हैं. वह सीओ से नाराज़ था लेकिन उनके कत्ल के बाद उसने उन्हें और भी ताकतवर बना दिया था. जिन पुलिस वालों से उसे कभी डर नहीं लगता था उनकी लाशें लगातार उसके पीछे दौड़ रही थीं. वह बार-बार रूककर उन्हें समझाने की कोशिश करता था लेकिन तब तक गोलियां चलनी शुरू हो जाती थीं कभी निशाना अतुल पर लग जाता, कभी अमर दुबे को गोली लग जाती और कभी कार्तिकेय मार दिया जाता. हालात बिगड़ते जा रहे थे. हाथ उठाये बेटे के सामने विकास बेबस हो गया था. उसने रुकने का फैसला किया. उसने खुद को पुलिस के हवाले करने का फैसला किया. उसने तय किया कि उसका फैसला अब क़ानून कर ही दे.
राज्यमंत्री का कत्ल भी अब उसे याद आने लगा था. उसके खिलाफ गवाही देने से बचने वाले पुलिस वाले अब असलहे लेकर पीछे दौड़ने लगे थे. उसका मुखबिर ख़ास थानेदार सीखचों के पीछे पहुँच गया था. उसके पैसों पर ऐश करने वाले अफसर खामोशी अख्तियार कर चुके थे. जिन अफसरों पर उसने करोड़ों लुटाये थे वह चाहते थे कि पकड़े जाने से पहले उसे मार दिया जाए.
महाकाल के दरबार में वह इसीलिये तो गया था कि ज़िन्दगी की गारंटी मिल जाए. ज़िन्दगी की गारंटी हासिल करने के बाद उसने अपनी वापसी का रास्ता चुना था. इसीलिये तो चिल्लाया था कि मैं विकास दुबे हूँ कानपुर वाला. मध्य प्रदेश पुलिस ने उसे उत्तर प्रदेश पुलिस के हवाले कर दिया था.
हल्का-हल्का पानी बरस रहा था और तेज़ रफ़्तार में दौड़ती गाड़ियाँ उसे उस शहर की तरफ ले जा रही थीं जहाँ उसका साम्राज्य स्थापित था. वह उस शहर में लौट रहा था जहाँ के पुलिस अधिकारी खुद उसे पुलिस के मूवमेंट की खबर देते थे. घर करीब आता जा रहा था. वह मन ही मन अदालत में बोले जाने वाले शब्दों पर मंथन कर रहा था.

वह अच्छी तरह से जानता था कि पूरी रात उसने पुलिस को जो कुछ भी बताया है उसके कोई मायने नहीं हैं. वह जो अदालत में बोलेगा वही उसकी आगे की राह तय करेगा. वह जानता था कि कानपुर पहुँचते ही वकीलों की एक फ़ौज उसे बचाने को पहुँच जायेगी. वह देख रहा था उसका शहर आ गया था. कुछ किलोमीटर का सफर और बचा था, शायद दस या पंद्रह मिनट लगने थे अचानक गाड़ियाँ रोक दी गईं. उसे बरसते पानी में नीचे उतार दिया गया. नीचे उतरते ही वह समझ गया कि दिमाग उसका ही नहीं उसे ला रहे पुलिस अफसरों का भी चल रहा था. वह अपने बचने के तरीके सोच रहा था तो पुलिस अफसर उसके न बचने के तरीके सोच रहे थे. नीचे उतरते ही वह समझ गया कि वक्त पूरा हो गया है. इनकाउंटर क्या होता है वह देखने लगा था. गोलियां सीधे उसके सीने को बेध रही थीं. डर का दूसरा नाम बन चुका गैंगस्टर लाश में बदल गया था.
महाकाल से मिलकर लौटा विकास दुबे नहीं जानता था कि न उसे वकील मिलने वाला है, न जज उसे देखने वाला है, न वह अपने शहर में फिर टहलने वाला है. उसने देखा कि खाकी वर्दी वाले जज उसका फैसला लिख रहे हैं. वह भी बगैर वर्दी न जाने कितने लोगों के फैसले लिख चुका था.
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जिन कपड़ों को पहनकर वह महाकाल से ज़िन्दगी मांगने गया था, उन्हीं कपड़ों में वह श्मशान पहुँच गया था. श्मशान पहुंचकर वह अपने आख़री सफर पर निकल गया था. यहाँ उसकी बीवी चिल्ला रही थी. हर नाइंसाफी का जवाब देने की बात कर रही थी.
जवाब कौन किसे देगा. सही और गलत का फैसला कौन करेगा. इन बातों के मायने अब खत्म हो चुके हैं. इनकाउंटर के तरीकों पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं, अब भी उठेंगे. इस इनकाउंटर की पटकथा तो 20 घंटे पहले से ही सोशल मीडिया पर मौजूद थीं. लोगों को पता था कि पुलिस क्या करने वाली है. सुप्रीम कोर्ट को भी पहले से ही बता दिया गया था कि ऐसा होने वाला है.
जुर्म का खात्मा होना चाहिए. डर की हुकूमत खत्म होनी चाहिए, लेकिन जज बनने की छूट भी किसी को नहीं मिलनी चाहिए. समझने की बात तो यह है कि जुर्म के रास्ते कितने भी पैसे कमा लो मगर जब डर अपने भीतर आएगा तो वकील करने का पैसा भी जेब में नहीं होगा और काली कमाई से कितने भी घर और कोठियां बना लो लेकिन आखीर में नसीब में सिर्फ लकड़ियाँ ही रह जायेंगी जो या तो जलाकर राख कर देंगी या फिर मिट्टी में दबा देंगी. साथ निभाएगा तो सिर्फ सन्नाटा. यह सन्नाटा डराएगा बहुत डराएगा.



