पूर्व रेल मंत्री और टीएमसी नेता मुकुल रॉय का निधन, कार्डियक अरेस्ट से ली अंतिम सांस

जुबिली स्पेशल डेस्क
पूर्व रेल मंत्री और मुकुल रॉय का रविवार देर रात 1:30 बजे कोलकाता के साल्ट लेक स्थित अपोलो हॉस्पिटल में निधन हो गया। उनके बेटे सुभ्रांशु रॉय ने इसकी पुष्टि की। बताया जा रहा है कि उनका निधन कार्डियक अरेस्ट की वजह से हुआ।
परिवार के अनुसार, मुकुल रॉय लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। हाल ही में उनकी तबीयत अधिक बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
यूथ कांग्रेस से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
मुकुल रॉय ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत पश्चिम बंगाल में यूथ कांग्रेस से की थी। बाद में वे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए और लंबे समय तक पार्टी सुप्रीमो एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे।
ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया और दिल्ली में टीएमसी का प्रमुख चेहरा बनाकर भेजा। वर्ष 2006 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और 2009 से 2012 तक उच्च सदन में पार्टी के नेता रहे।
बंगाल में टीएमसी को मजबूत करने में अहम भूमिका
माना जाता है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी को मजबूत आधार दिलाने में मुकुल रॉय की रणनीतिक भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी की जीत के पीछे उनकी संगठनात्मक क्षमता को बड़ी वजह माना गया। उस दौर में वाम दलों और कांग्रेस के कई नेताओं को टीएमसी में शामिल कराने में उनकी अहम भूमिका रही।
बीजेपी में गए, फिर की वापसी
नवंबर 2017 में मुकुल रॉय ने टीएमसी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की 18 सीटों की जीत में भी उनकी रणनीतिक भूमिका को अहम माना गया।
वर्ष 2021 में उन्होंने कृष्णनगर उत्तर सीट से बीजेपी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता। हालांकि जून 2021 में उन्होंने बीजेपी छोड़कर दोबारा टीएमसी में वापसी कर ली।
13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य विधायक घोषित कर दिया था। इसके बाद वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।
क्यों कहा जाता था ‘बंगाल का चाणक्य’?
रणनीतिक कौशल और संगठनात्मक क्षमता के चलते मुकुल रॉय को बंगाल की राजनीति में अक्सर ‘चाणक्य’ कहा जाता था। यूपीए-2 सरकार के दौरान उन्होंने पहले जहाजरानी राज्य मंत्री और बाद में मार्च 2012 में रेल मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल के कोने-कोने में ममता बनर्जी का जनाधार मजबूत करने में मुकुल रॉय की बड़ी भूमिका रही। टीएमसी छोड़ने और बाद में वापसी के दौरान भी ममता बनर्जी ने उनके प्रति सार्वजनिक तौर पर संयमित रुख बनाए रखा।
मुकुल रॉय के निधन से पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है। उनके राजनीतिक जीवन ने राज्य की सियासत को कई बार नई दिशा दी।



