Bengal Election: ‘सब सरकारी कर्मचारी हैं, अलग क्यों?’ टीएमसी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, काउंटिंग नियमों पर दखल से इनकार

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों से पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है।

मतगणना पर्यवेक्षकों (Counting Supervisors) की नियुक्ति को लेकर चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साफ कर दिया कि चुनाव आयोग को अपने अधिकारी चुनने का पूर्ण अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्र और राज्य के कर्मचारियों को अलग-अलग चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची की पीठ ने टीएमसी की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिसमें राज्य सरकार के कर्मचारियों को काउंटिंग प्रक्रिया से बाहर रखने पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने कहा

  • यह कहना गलत है कि केवल एक समूह (केंद्र सरकार) से अधिकारियों का चयन करना अवैध है।
  • नियमों के मुताबिक, चुनाव आयोग केंद्र या राज्य, किसी भी सरकारी कर्मचारी को नियुक्त कर सकता है।
  • अदालत ने जोर देकर कहा, “राज्य और केंद्र सरकार के कर्मचारी अलग-अलग नहीं होते, वे सभी ‘सरकारी कर्मचारी’ हैं।”

टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मोर्चा संभालते हुए चार मुख्य बिंदु रखे

  1. देरी से जानकारी: सिब्बल ने आरोप लगाया कि 13 अप्रैल का नोटिस उन्हें 29 अप्रैल को दिया गया।
  2. बिना आधार के आशंका: चुनाव आयोग ने ‘संभावित अनियमितताओं’ की आशंका जताई है, लेकिन इसका कोई डेटा पेश नहीं किया कि ये आशंकाएं कहां से आईं।
  3. डबल लेयर सुरक्षा क्यों?: जब हर बूथ पर पहले से ही ‘माइक्रो ऑब्जर्वर’ के रूप में केंद्रीय अधिकारी मौजूद है, तो एक और पर्यवेक्षक की क्या जरूरत है?
  4. सर्कुलर का उल्लंघन: सिब्बल का तर्क था कि आयोग के अपने सर्कुलर में राज्य सरकार के अधिकारियों का भी जिक्र है, लेकिन यहां उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब चुनाव आयोग ने आगामी मतगणना के लिए केवल केंद्र सरकार और पीएसयू (PSU) कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने का फैसला लिया। टीएमसी का मानना है कि यह राज्य सरकार के कर्मचारियों पर अविश्वास दिखाने जैसा है और यह प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।

हालांकि, जस्टिस बागची ने टीएमसी के ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ के तर्क पर सवाल उठाते हुए पूछा कि “यह अवधारणा कहां से आ रही है?” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक दलों से सहमति लेना आयोग के लिए अनिवार्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब 4 मई को होने वाली मतगणना की प्रक्रिया पर लगा संशय खत्म हो गया है। चुनाव आयोग के तय नियमों के अनुसार ही वोटों की गिनती होगी। टीएमसी के लिए यह कानूनी झटका मनोबल पर असर डाल सकता है, जबकि बीजेपी इसे निष्पक्ष चुनाव की दिशा में सही कदम बता रही है।

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