नेपाल में ओली-लेखक गिरफ्तारी के खिलाफ यूएमएल का आंदोलन तेज

नेपाल में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी के बाद भड़के आंदोलन को अब नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) का पूर्ण समर्थन मिल गया है। पार्टी सचिवालय की बैठक में इन गिरफ्तारियों को ‘बदले वाली कार्रवाई’ बताते हुए सरकार के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर दमन की कड़ी निंदा की गई। बैठक में चरणबद्ध आंदोलन कार्यक्रम तय किए गए, जो जिला से लेकर राजधानी स्तर तक फैलेंगे।सचिवालय बैठक में लिए गए निर्णयों के तहत पार्टी ने आंदोलन को जन-व्यापी बनाने के लिए विस्तृत रोडमैप तैयार किया है। चैत्र 25 (अप्रैल 8) तक सभी जिलों में विशाल प्रदर्शन आयोजित होंगे। इसके बाद चैत्र 28 (अप्रैल 11) को सभी नगर पालिकाओं में धरना-प्रदर्शन होंगे। बैशाख 3 (अप्रैल 16) को वार्ड स्तर पर जमावड़े और धरने प्रस्तावित हैं, जबकि बैशाख 7 (अप्रैल 20) को प्रदेश राजधानियों में बड़े प्रदर्शन होंगे। चरमोत्कर्ष के रूप में बैशाख 12 (अप्रैल 25) को काठमांडू में विशाल धरना-प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।पार्टी ने सभी जन संगठनों, छात्र संगठनों और व्यावसायिक समूहों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने तरीके से आंदोलन को प्रभावी बनाएं। कल सुबह 11 बजे पार्टी कार्यालय में जन संगठन संयोजक की बैठक होगी, जिसमें इन गतिविधियों पर विस्तृत चर्चा होगी।साथ ही, सर्वदलीय नागरिक संवाद के लिए उपाध्यक्ष रघुजी पंत, उप महासचिव योगेश भट्टराई और केंद्रीय सदस्य मीन बहादुर शाही को जिम्मेदारी सौंपी गई है। संसद के भीतर सहयोग के लिए उपराष्ट्रपति राम बहादुर थापा बादल और सचिव पद्मा अर्याल को अन्य दलों से समन्वय बनाने का दायित्व दिया गया है। संसदीय दल की बैठक कल दोपहर 3 बजे पार्टी कार्यालय में बुलाई गई है। आंदोलन के आगे के कार्यक्रम तय करने हेतु केंद्रीय समिति की बैठक तुरंत बुलाने का निर्णय भी लिया गया है।

जनता की प्रतिक्रिया: सड़कों पर उबाल, लेकिन मिश्रित भाव
गिरफ्तारी के तुरंत बाद 28 मार्च को यूएमएल कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने काठमांडू घाटी में प्रदर्शन शुरू कर दिए। च्यासल, मैतीघर-बनेश्वर, बबरमहल और ललितपुर में टायर जलाए गए, कार्की आयोग रिपोर्ट की प्रतियां फूंकी गईं और नारेबाजी की गई। पुलिस ने कुछ जगहों पर बैटनचार्ज किया, जिससे कार्यकर्ताओं को चोटें आईं और कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं। शुरुआती दो दिनों में प्रदर्शन सीमित रहे, लेकिन उत्साह भरा था—कार्यकर्ता ‘ओली रिहा गर!’ और ‘राजनीतिक बदला बंद गर!’ के नारे लगा रहे थे। 29 मार्च को जिलों में भी प्रदर्शन फैले, जैसे गुल्मी में टॉर्चलाइट मार्च निकाला गया जहां समर्थकों ने तम्घास जिला प्रशासन कार्यालय के सामने जुटकर लोकतंत्र की रक्षा की मांग की।

अब तक की जन प्रतिक्रिया मिश्रित दिख रही है। एक तरफ यूएमएल समर्थक इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं और बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरने को तैयार हैं, वहीं कुछ कार्यकर्ता मान रहे हैं कि सरकार का कदम सही दिशा में है और वे आगे के प्रदर्शनों में शामिल नहीं होंगे। युवा वर्ग, जो 2025 के जेन-जी आंदोलन से प्रभावित था, में भी विभाजन साफ है—कुछ इसे न्याय कह रहे हैं, तो कुछ राजनीतिक प्रतिशोध। सोशल मीडिया पर #ReleaseOli और #JusticeForGenZ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लेकिन आम जनता में अभी ‘इंतजार और देखो’ का मूड है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आंदोलन चरणबद्ध तरीके से फैला तो यह व्यापक जनसमर्थन हासिल कर सकता है, वरना सीमित रह जाएगा।

नेपाली अखबारों में क्या लिखा जा रहा है?
नेपाली मीडिया इस घटनाक्रम को प्रमुखता से कवर कर रहा है। काठमांडू पोस्ट ने विस्तार से रिपोर्ट किया कि यूएमएल ने गिरफ्तारी को ‘राजनीतिक बदला’ करार दिया है और देशव्यापी प्रदर्शनों की योजना बनाई है। अखबार ने कानूनी सवाल भी उठाए—जैसे छुट्टी के दिन ‘तत्काल’ वारंट जारी करना और अदालत के बिना गिरफ्तारी को ‘ओवररीच’ बताया। कान्तिपुर दैनिक ने यूएमएल की सचिवालय बैठक और जिला स्तर के प्रदर्शनों पर फोकस किया, साथ ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया की कवरेज को भी हाइलाइट किया जहां इस घटना को जेन-जी आंदोलन, मानवाधिकार और विधि के शासन से जोड़ा गया।

सेटोपाटी और माई रिपब्लिका ने चार चरण के आंदोलन कार्यक्रम की घोषणा पर रिपोर्टिंग की और शुरुआती प्रदर्शनों में वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए, जिससे आंदोलन की प्रभावशीलता पर बहस छिड़ गई। अखबारों में भी दो धाराएं दिख रहीहैं—एक जो सरकार की ‘न्याय की शुरुआत’ की बात को रिपोर्ट कर रही है (76 मौतों का जिक्र), और दूसरी जो यूएमएल की ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ वाली लाइन को जगह दे रही है। संपादकीय स्तर पर चिंता जताई जा रही है कि यह नेपाल की अस्थिर राजनीति को और उबाल सकता है।

बुद्धिजीवियों, वकीलों और विश्लेषकों की प्रतिक्रियाएं
गिरफ्तारी की वैधता पर बुद्धिजीवियों और कानूनी विशेषज्ञों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ओली के वकील तिकाराम भट्टराई ने कहा, “यह गिरफ्तारी अनावश्यक और गैरकानूनी है। इन नेताओं के भागने का कोई खतरा नहीं था, फिर भी छुट्टी के दिन तत्काल वारंट जारी किया गया। हम सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।”

पूर्व अटॉर्नी जनरल खम्मा बहादुर खाती ने भी इसी भावना को दोहराया।यूएमएल नेता और विश्लेषक बिशाल भट्टराई ने कार्की आयोग रिपोर्ट को ‘पक्षपाती’ बताया और कहा, “रिपोर्ट ने प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस स्टेशन जलाने और अधिकारियों की हत्या जैसे घटनाओं को नजरअंदाज किया। यह लंबे समय के लिए शांति सुनिश्चित नहीं करेगा।” पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली और गोकरण बिस्ट ने इसे ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया।स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम जेन-जी आंदोलन के घावों को फिर से खोल रहा है। एक समर्थक तेजिला थापा ने कहा, “प्रधानमंत्री का फैसला जल्दबाजी भरा है, जो देश को टकराव की ओर धकेल सकता है।”

nbcrightnow.com कुछ बुद्धिजीवी चुप हैं, लेकिन कानूनी और राजनीतिक हलकों में बहस तेज है कि क्या यह ‘न्याय’ है या ‘सत्ता का दुरुपयोग’।

समग्र प्रभाव और आगे की संभावनाएं
ओली और लेखक की गिरफ्तारी के बाद नेपाल में राजनीतिक तनाव चरम पर है। विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया है, जबकि सरकार इसे कानूनी कार्रवाई बता रही है। यूएमएल का यह आंदोलन न केवल पार्टी समर्थकों को एकजुट करेगा, बल्कि अन्य विपक्षी ताकतों (जैसे नेपाली कांग्रेस के कुछ गुट) को भी जोड़ सकता है, हालांकि कांग्रेस ने लेखक की गिरफ्तारी पर अभी चुप्पी साध रखी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंदोलन नेपाल की अस्थिर राजनीति को नई दिशा दे सकता है—या तो बड़े समझौते की ओर ले जाएगा या गहरे विभाजन को बढ़ाएगा। फिलहाल सड़कों पर उबाल है, लेकिन पूरा देश इस चरणबद्ध कार्यक्रम का इंतजार कर रहा है। अगर जनसमर्थन बढ़ा तो बैशाख 12 का काठमांडू धरना ऐतिहासिक साबित हो सकता है। नेपाल की राजनीति एक बार फिर परीक्षा की घड़ी में है—क्या न्याय और लोकतंत्र साथ चलेंगे, या सत्ता का खेल जारी रहेगा?

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