अमेरिका–इज़राइल और ईरान संघर्ष में पाकिस्तान की दुविधा

अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने पाकिस्तान को एक अत्यंत जटिल कूटनीतिक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखने की उसकी पुरानी रणनीति अब गंभीर परीक्षा से गुजर रही है, जिससे एक स्पष्ट कूटनीतिक दुविधा उत्पन्न हो गई है। इस समस्या के केंद्र में गठबंधनों का एक जटिल जाल है। इस संघर्ष में प्रमुख शक्तियाँ—अमेरिका, चीन, ईरान और सऊदी अरब—शामिल हैं, जिनके साथ पाकिस्तान के गहरे रणनीतिक संबंध हैं। व्यापक रूप से देखा जाए तो अमेरिका और सऊदी अरब ईरान के विरोध में खड़े हैं, जबकि चीन को ईरान का परोक्ष समर्थक माना जाता है। यह भू-राजनीतिक विभाजन पाकिस्तान के लिए स्थिति को और अधिक कठिन बना देता है।

पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब पर आर्थिक सहायता के लिए निर्भर रहा है। हाल ही में दोनों देशों ने एक रक्षा समझौते के माध्यम से अपने संबंधों को और मजबूत किया है, जिसमें यह प्रावधान है कि एक देश पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव के कारण यह समझौता पाकिस्तान को एक संवेदनशील स्थिति में डालता है। सऊदी अरब पाकिस्तान से सैन्य या रणनीतिक समर्थन की अपेक्षा कर सकता है, हालांकि पाकिस्तान अब तक सीधे हस्तक्षेप से बचता रहा है, जो उसकी सतर्क नीति को दर्शाता है।

चीन को पाकिस्तान का सबसे विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार माना जाता है। बड़े पैमाने पर निवेश और विभिन्न पहलों के माध्यम से चीन ने पाकिस्तान के आर्थिक और सैन्य विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वहीं, चीन को ईरान का परोक्ष समर्थक भी माना जाता है। अतः इस युद्ध में यह मन जा रहा है कि चीन गुप्त रूप से ईरान को सामरिक सहायता प्रदान कर रहा है। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए एक और जटिलता उत्पन्न करती है। यदि चीन ईरान का समर्थन जारी रखता है, तो पाकिस्तान को अपने दायित्वों और संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा।

भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पाकिस्तान और ईरान के बीच महत्वपूर्ण संबंध हैं। दोनों देश पड़ोसी हैं और सामान्यतः स्थिर संबंध बनाए रखते हैं, हालांकि कभी-कभी सीमा संबंधी तनाव भी देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त, दोनों देशों के कुछ वैचारिक दृष्टिकोण भी समान हैं, जैसे इज़राइल के प्रति विरोध। फिर भी, पाकिस्तान ईरान के साथ किसी भी संघर्ष में शामिल होने को लेकर अत्यंत सावधान है। ईरान की क्षेत्रीय शक्ति और सैन्य क्षमता को देखते हुए प्रत्यक्ष टकराव गंभीर जोखिम उत्पन्न कर सकता है। इसलिए पाकिस्तान तटस्थता बनाए रखना अधिक उचित समझता है।

विभिन्न सहयोगियों की परस्पर विरोधी अपेक्षाओं के बीच पाकिस्तान ने रणनीतिक तटस्थता की नीति अपनाई है। वह किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय इस संघर्ष से दूरी बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। यह भी प्रतीत होता है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की हालिया सैन्य गतिविधियाँ इस बात को पुष्ट करने के लिए हो कि वह पहले से ही एक अन्य मोर्चे पर व्यस्त है, जिससे वह किसी नए संघर्ष में शामिल होने से बच सके। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश भी की है, जिससे वह एक लड़ाकू पक्ष के बजाय कूटनीतिक सेतु के रूप में उभर सके। इसी दौरान, ईरान में पाकिस्तान दूतावास के पास हुआ विस्फोट (हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ) और Tulsi Gabbard द्वारा दिए गए बयान—जिसमें पाकिस्तान को चीन, रूस, उत्तर कोरिया और ईरान के साथ अमेरिका के लिए संभावित परमाणु खतरा बताया गया, जो स्थिति को और अधिक जटिल बना देते हैं।

पाकिस्तान इस समय एक अत्यंत संवेदनशील कूटनीतिक स्थिति में है। एक ओर अमेरिका और सऊदी अरब हैं, जबकि दूसरी ओर चीन और ईरान। इन सभी देशों के साथ उसके महत्वपूर्ण संबंध हैं, जिससे किसी एक पक्ष का पूर्ण समर्थन करना कठिन हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में, पाकिस्तान की सावधानीपूर्ण नीति, सीधे हस्तक्षेप से बचते हुए अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता को बढ़ावा देना, उसके राष्ट्रीय हितों की रक्षा का प्रयास प्रतीत होती है। हालांकि, जैसे-जैसे यह संघर्ष आगे बढ़ेगा, इस नाजुक संतुलन को बनाए रखना पाकिस्तान के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आने वाले समय में पाकिस्तान के साथ घटने वाली घटनाएं ही बतायेँगी कि पाकिस्तान अपनी कूटनीति में कहाँ तक सफल रहा।

(लेखक रक्षा मामलों के विशेषग्य हैं)

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