जुबिली स्पेशल डेस्क
मुंबई की सियासत में शुक्रवार को ऐसे संकेत मिले, जिन्हें कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है। देश के सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के नतीजों और रुझानों में कांग्रेस 227 में से महज 15 सीटों पर सिमटती दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि शहरी भारत में कांग्रेस के धीरे-धीरे हाशिये पर खिसकने की तस्वीर है।
2017 के BMC चुनाव में जहां कांग्रेस ने 31 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार आधे से भी कम सीटों पर बढ़त पार्टी की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। इस चुनाव में कांग्रेस ने 152 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जबकि बाकी सीटें सहयोगी दलों—वंचित बहुजन आघाडी (VBA), राष्ट्रीय समाज पक्ष और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (गवई गुट)—के लिए छोड़ी गईं। लेकिन शुरुआती रुझान साफ संकेत दे रहे हैं कि यह गठबंधन कांग्रेस के लिए किसी फायदे में नहीं बदला। उल्टा, कई विश्लेषक इसे रणनीतिक चूक मान रहे हैं, क्योंकि वोट ट्रांसफर का अपेक्षित लाभ पार्टी को मिलता नहीं दिखा।
गठबंधन की रणनीति क्यों फेल हुई?
कांग्रेस नेतृत्व ने इस चुनाव में महाविकास आघाडी (MVA) के घटकों—शिवसेना (UBT) और NCP (शरद पवार)—के साथ सीट शेयरिंग से दूरी बनाई।
पार्टी को आशंका थी कि शिवसेना (UBT) और मनसे की संभावित नजदीकी से उत्तर भारतीय और अल्पसंख्यक वोट बैंक कांग्रेस से खिसक सकता है। इसी डर के चलते कांग्रेस ने अलग रास्ता चुना और VBA जैसे दलों के जरिए दलित वोटों को एकजुट करने की कोशिश की।
लेकिन नतीजों ने दिखाया कि यह गणित उलटा पड़ गया। BJP ने गैर-मराठी हिंदू वोटों को आक्रामक तरीके से एकजुट किया, जबकि शिवसेना (UBT)–मनसे की धुरी ने भाजपा विरोधी वोटों का बड़ा हिस्सा अपने साथ बनाए रखा। इन दोनों ध्रुवों के बीच कांग्रेस फंसती चली गई और उसका वोट कई दिशाओं में बंटता नजर आया।
BJP-शिंदे की बढ़त, UBT की जंग और कांग्रेस की गैरमौजूदगी
BMC चुनाव धीरे-धीरे ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाम मराठी अस्मिता’ की लड़ाई में तब्दील हो गया। BJP और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने विकास, सड़कें, फ्लाईओवर, इंफ्रास्ट्रक्चर और ‘गुड गवर्नेंस’ को चुनावी नैरेटिव बनाया। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे का खेमा और राज ठाकरे मराठी पहचान को धार देने में जुटे रहे।
इस पूरे सियासी संघर्ष में कांग्रेस सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई। पार्टी न तो कोई मजबूत भावनात्मक मुद्दा खड़ा कर सकी, न ही उसका प्रचार असरदार दिखा। कई इलाकों में कांग्रेस का कैंपेन ‘लो एनर्जी’ नजर आया और नेतृत्व का संदेश वार्ड स्तर तक एकसमान नहीं पहुंच पाया।
अंदरूनी कलह और कमजोर संगठन ने बिगाड़ा खेल
विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस की कमजोरी की एक बड़ी वजह पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और ग्राउंड लेवल पर समन्वय की कमी है।
BMC जैसे चुनाव में बूथ-लेवल मैनेजमेंट, माइक्रो प्लानिंग और मजबूत कैडर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा और शिवसेना के दोनों धड़ों के पास यह मशीनरी मौजूद रही, जबकि कांग्रेस कई इलाकों में संगठनात्मक तौर पर कमजोर साबित हुई।
VBA के साथ गठबंधन से कांग्रेस को दलित वोटों के एकजुट होने की उम्मीद थी, लेकिन प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के पास उतना मजबूत बूथ-स्तरीय ढांचा और संसाधन नहीं दिखा, जिससे वोट ट्रांसफर प्रभावी हो सके। नतीजा यह हुआ कि गठबंधन कागजों पर बड़ा दिखा, लेकिन जमीन पर असर सीमित रहा।
मुस्लिम-दलित वोट बैंक में सेंध का खतरा
कांग्रेस के लिए सबसे चिंताजनक संकेत उसके पारंपरिक वोट बैंक में संभावित टूट का है। शुरुआती रुझानों में मुस्लिम और दलित वोटों के बंटवारे की चर्चा तेज है। AIMIM, समाजवादी पार्टी और NCP (अजित पवार गुट) जैसे दलों पर आरोप है कि उन्होंने कांग्रेस के पुराने वोट बेस में सेंध लगाई। अगर यह ट्रेंड आगे भी कायम रहता है, तो कांग्रेस की कोर वोट पॉलिटिक्स को बड़ा झटका लग सकता है।
अब नेतृत्व पर सवाल, बदलाव का दबाव बढ़ेगा
इन नतीजों के बाद कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक फेरबदल की मांग तेज होने के आसार हैं। मुंबई में फिलहाल पार्टी की कमान सांसद वर्षा गायकवाड के हाथ में है, लेकिन अगर कांग्रेस 15 सीटों तक सिमटती है, तो नई रणनीति और नेतृत्व पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।
कभी मुंबई को मेयर देने वाली कांग्रेस का BMC में इस स्तर तक गिर जाना सिर्फ एक चुनावी हार नहीं है। यह संकेत है कि शहरी राजनीति में पार्टी की प्रासंगिकता लगातार घट रही है—और BMC जैसा हाई-प्रोफाइल चुनाव कांग्रेस के लिए अब एक ‘बड़े खतरे का सायरन’ बन चुका है।
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