Chhath का खरना आज,बन रहे हैं चार शुभ योग, जानें पूजा विधि और महत्व

जुबिली स्पेशल डेस्क

लखनऊ। छठ पूजा की शुरुआत हो चुकी है। दीपावली के छठे दिन यह त्यौहार मनाया जाता है इसी वजह से इसका नाम छठ पड़ा। छठ पहले सिर्फ बिहार में मनाया जाता था। आज भी बिहार में गंगा के चौड़े तट पर छठ पूजा की छटा देखते ही बनती है।

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रोज़गार के लिए बिहार के लोग जिन-जिन राज्यों में गए वहां-वहां तय त्यौहार भी चला गया। अब तो छठ उत्तर प्रदेश से दिल्ली और मुम्बई तक पहुँच चुका है। इस त्यौहार की वजहों को जानने के बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी इसमें शामिल होते गए और धीरे-धीरे यह पूरे देश का त्यौहार बन गया।

छठ महापर्व के दूसरे दिन यानी खरना का विशेष महत्व होता है। इस बार खरना पर चार शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन की पवित्रता और भी बढ़ गई है।

आज के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग, शोभन योग और गुरु-बुध के संयोग से नवपंचम राजयोग बन रहा है। ये चारों योग पूजा और व्रत को अधिक फलदायी बनाते हैं।

पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि आज प्रातः 6 बजकर 4 मिनट तक रहेगी, इसके बाद षष्ठी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा।

धार्मिक आस्था और पारिवारिक एकता का पर्व

खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं और सूर्यास्त के बाद देवी-देवताओं को भोग लगाते हैं। इसके बाद छठी मैया की पूजा की जाती है।
इस शाम का वातावरण बेहद पवित्र और मनमोहक होता है — हर घर से गुड़ की खीर (रसियाव) की सुगंध आती है, महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और बच्चे दीपक सजाते हैं।
यह पर्व न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि परिवार और समाज को एक सूत्र में बांधने का माध्यम भी है। व्रती अपने शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करते हैं ताकि आगामी दो दिनों के कठोर निर्जला व्रत का पालन कर सकें।

छठ पूजा 2018 (Photo Credits: YouTube.com)

खरना पूजा की विधि

  • पूजा स्थल की शुद्धि:सुबह घर या आंगन की मिट्टी से लिपाई-पुताई करें। स्नान ध्यान के बाद सूर्यदेव और छठी मैया का स्मरण करें।
  • संध्या पूजा और भोग:सूर्यास्त के समय मिट्टी के चूल्हे पर मिट्टी के बर्तनों में गुड़-चावल की खीर (रसियाव), रोटी या पूड़ी और केला प्रसाद के रूप में बनाएं।
  • आराधना और अर्पण:केले के पत्ते पर छठी माता और सूर्यदेव को भोग अर्पित करें।
  • पूजा के बाद व्रती स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर परिवार व पड़ोस में बांटते हैं।

व्रत की शुरुआत

इसके साथ ही अगले 36 घंटे का निर्जला उपवास आरंभ होता है।खरना केवल उपवास या अनुष्ठान नहीं, बल्कि संयम, पवित्रता और सामूहिक आस्था का प्रतीक है। इस दिन व्रती अपनी आत्मा को शुद्ध कर सूर्यदेव और छठी मैया का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. जुबिली post  इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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