व्यंग्य : प्रिय शिक्षा को पत्र, कहां गुम हो तुम

प्रोफेसर अशोक कुमार

आज सुबह जब मैंने अखबार खोला, तो लगा कि शायद किसी बड़े अपराधी या किसी खोए हुए मासूम की तलाश के लिए इश्तहार होगा।

लेकिन गौर से देखा तो पाया कि दरअसल वह तो ‘उच्च शिक्षा’ का हुलिया था।

शिक्षा, जो कभी मंदिरों और गुरुकुलों की पवित्रता से निकलकर हमारे सरकारी महाविद्यालयों के गलियारों में गूँजती थी, आज वह किसी ‘वॉन्टेड’ अपराधी की तरह लापता है।

प्रिय शिक्षा, तुम्हारा नया ‘पता’ क्या है? सुना है अब तुम साधारण डाक से नहीं मिलतीं, बल्कि ‘रजिस्टर्ड कॉरपोरेट कूरियर’ बन गई हो।

तुम्हारा नया स्थायी पता अब सरकारी महाविद्यालयों के वे टूटे हुए बेंच नहीं, बल्कि उन निजी विश्वविद्यालयों के शीशमहल हैं, जहाँ घुसते ही इंसान को अपने ज्ञान से ज्यादा अपनी जेब की गहराई का अहसास होता है। वहाँ तुम वातानुकूलित कमरों में बड़े करीने से सजाकर रखी गई हो।

लेकिन डर यह है कि कहीं तुम वहाँ केवल एक ‘डेकोरेटिव पीस’ तो नहीं बन गई?या फिर तुम उन कोचिंग संस्थानों की तंग और अंधेरी गलियों में कैद हो गई हो? जहाँ तुम्हें ‘सफलता’ के छोटे-छोटे पैकेटों में बंद किया जाता है और भारी किस्तों पर नीलाम किया जाता है। वहाँ तुम्हें पाने के लिए ‘जिज्ञासा’ की नहीं, बल्कि ‘बैंक बैलेंस’ की जरूरत होती है। तुमने अपना सरकारी चोला कब उतारकर यह ‘महंगा कॉरपोरेट सूट’ पहन लिया, हमें पता ही नहीं चला।सरकारी महाविद्यालयों के बरामदे आज भी तुम्हें पुकारते हैं, लेकिन वहाँ तुम्हारी आहट कम और मकड़ियों के जाले ज्यादा मिलते हैं।

उन कमरों में जहाँ कभी तर्क-वितर्क की धारा बहती थी, आज सिर्फ पुरानी फाइलों पर जमी धूल और व्यवस्था की लाचारी का साम्राज्य है।

शिक्षण संस्थानों का दृश्य अब किसी भूतिया फिल्म के सेट जैसा हो गया है:

उन्हें अच्छी तरह पता है कि कक्षाओं में तुम नहीं, बल्कि मकड़ियाँ उनका स्वागत करेंगी। उनके लिए शिक्षा अब एक ‘ज्ञानार्जन’ की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा यानी ‘डिग्री’ पाने का जरिया है।

1. छात्रों का वनवास: महाविद्यालयों में छात्र अब ‘पढ़ने’ नहीं आते, बल्कि वे एक ‘अदृश्य उपस्थिति’ का हिस्सा हैं। वे आते हैं सिर्फ परीक्षा फॉर्म भरने, छात्रवृत्ति का जुगाड़ करने या फिर राजनीति के अखाड़े में हाथ आज़माने।

2. शिक्षकों का अकाल और ‘फाइल-पूजा’: हमने ‘गुरु बिन भवन सूना’ की कहावत को बड़ी शिद्दत से सच कर दिखाया है। सालों से नियुक्तियाँ ‘प्रक्रिया’ के नाम पर फाइलों में दफन हैं। जो इक्का-दुक्का बचे-खुचे शिक्षक हैं, उन्हें हमने इतना ‘बहुमुखी’ बना दिया है कि वे पढ़ाने के अलावा सब कुछ कर रहे हैं—चाहे वह जनगणना हो, चुनाव ड्यूटी हो या फिर ‘स्मार्ट क्लास’ के नाम पर कागज़ी घोड़े दौड़ाना। बेचारे शिक्षक तुम्हें किताबों में नहीं, बल्कि एम.आईएस. पोर्टल के पासवर्ड में ढूँढ रहे हैं।

3. स्टेकहोल्डर्स की कुंभकर्णी नींद: कुलपति से लेकर नीति-निर्माताओं तक, जो तुम्हारे रक्षक और संवर्धक होने चाहिए थे, वे अब ‘मैनेजर’ की भूमिका में अधिक सहज हैं। वे ‘स्मार्ट क्लास’ के ऑडिट सिस्टम और रैंकिंग के आंकड़ों में इतने उलझ गए हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि शिक्षा इंसानों के लिए होती है, एक्सेल शीट्स के लिए नहीं। उनकी चुप्पी साजिशन नहीं, बल्कि सुविधापूर्ण है। आखिर सिस्टम को सुलाने में ही तो शांति है!

प्रिय शिक्षा, क्या तुम्हें याद है जब तुम ‘प्रकाश’ हुआ करती थी? आज तुम एक ‘उत्पाद’ बन गई हो। बाज़ार ने तुम्हें इतनी खूबसूरती से ‘पैकेज’ किया है कि तुम्हारी आत्मा कहीं खो गई है।

इस ‘शिक्षा प्रदूषण’ ने हमारे बौद्धिक वातावरण को इतना ज़हरीला बना दिया है कि अब यहाँ ‘मेधा’ नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ जीतता है।निजी संस्थानों की ऊँची इमारतें और चमकते हुए विज्ञापन शायद तुम्हारी शान को बढ़ाते होंगे, लेकिन उन सरकारी स्कूलों की टपकती छतों और खाली ब्लैकबोर्ड्स का क्या, जहाँ देश का भविष्य आज भी तुम्हें फटे हुए बस्ते में ढूँढ रहा है?

क्या तुमने अपनी पहुँच केवल उन तक सीमित कर ली है जिनके पास ‘प्रवेश शुल्क’ के साथ ‘सुविधा शुल्क’ देने की सामर्थ्य है?यह एक व्यंग्य नहीं, बल्कि उन हज़ारों आँखों की पुकार है जो आज भी सरकारी कॉलेजों की देहरी पर खड़ी होकर तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं।

वे गरीब छात्र, जो बड़े-बड़े कोचिंगों की ‘ईएमआई’ नहीं चुका सकते, उन्हें आज भी तुम्हारी जरूरत है।प्रिय शिक्षा, इन ‘स्टेकहोल्डर्स’ के मौन को अपनी सक्रियता से तोड़ दो। फाइलों की धूल झाड़ो और फिर से उन कक्षाओं में वापस आओ जहाँ तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे पहले कि तुम पूरी तरह से एक ‘ब्रांड’ बन जाओ और आम आदमी की पहुँच से बाहर हो जाओ, वापस एक ‘संस्कार’ और ‘शक्ति’ बनकर लौट आओ।

तुम्हारी प्रतीक्षा में, आज भी वह पुराना ब्लैकबोर्ड खड़ा है जिसे वर्षों से किसी ‘चाक’ ने नहीं छुआ और वह छात्र खड़ा है जिसकी आँखों में अब भी उम्मीद का एक दीया जल रहा है। आ जाओ, कि तुम्हें ढूँढते-ढूँढते हमारी एक पूरी पीढ़ी ‘डिग्रीधारी अनपढ़’ न बन जाए।

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