‘जीरो यूरेनियम’ फॉर्मूला और फिर एयरस्ट्राइक…क्या था असली खेल?

जुबिली स्पेशल डेस्क

मध्य-पूर्व इस वक्त भीषण तनाव से गुजर रहा है। ईरान पर लगातार हवाई हमले जारी हैं और तेहरान भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। अमेरिका और इज़रायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने की खबरों ने हालात को और गंभीर बना दिया है। हालांकि ईरान का पलटवार भी उतना ही सख्त और घातक बताया जा रहा है।

इसी बीच एक ऐसा दावा सामने आया है, जिसने इस सैन्य कार्रवाई के समय और मंशा पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, परमाणु समझौते को लेकर बातचीत में सकारात्मक प्रगति हुई थी और ईरान कुछ शर्तों के साथ समझौते के लिए तैयार दिखाई दे रहा था।

हमलों से कुछ घंटे पहले ओमान के विदेश मंत्री सैयद बद्र अलबुसैदी ने एक टीवी इंटरव्यू में दावा किया था कि ईरान अपने एनरिच्ड यूरेनियम के भंडार को “जीरो” करने पर सहमत हो गया है। लेकिन इस बयान के तुरंत बाद अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर सैन्य हमले शुरू कर दिए।

अलबुसैदी के मुताबिक, बातचीत में एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया गया था जिसके तहत ईरान भविष्य में परमाणु हथियार बनाने लायक यूरेनियम का भंडार नहीं रखेगा। ‘जीरो स्टॉकपाइल’ का अर्थ है कि मौजूदा एनरिच्ड यूरेनियम को कम स्तर तक घटाया जाएगा और उसे ऐसे परमाणु ईंधन में बदला जाएगा, जिसका दोबारा हथियार निर्माण में इस्तेमाल संभव न हो।

विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि प्रस्तावित समझौता पहले की परमाणु डील की तुलना में अधिक सख्त और व्यापक निगरानी व्यवस्था वाला होगा। इस समझौते के तहत International Atomic Energy Agency (IAEA) की पूरी निगरानी सुनिश्चित की जाएगी। हर स्टॉक, हर गतिविधि और हर परमाणु सामग्री की गहन जांच होगी। यहां तक कि समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन की स्थिति में भविष्य में अमेरिकी निरीक्षकों को भी निगरानी की अनुमति दी जा सकती है।

इन दावों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या कूटनीतिक रास्ता वास्तव में खुल सकता था, या हालात अब पूरी तरह सैन्य टकराव की दिशा में बढ़ चुके हैं? मध्य-पूर्व की बदलती परिस्थितियां आने वाले दिनों में इस प्रश्न का जवाब तय करेंगी।

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