शाह की टेढ़ी निगाह का शिकार हुई अनुप्रिया !

उत्कर्ष सिन्हा 

वैसे तो नरेंद्र मोदी  के नए मंत्रिमंडल में बहुत से पुराने मंत्रियो को जगह नहीं मिली , लेकिन कुछ ऐसे नाम भी हैं जिनको टीम मोदी से बाहर बैठने के वजहों की चर्चा ज्यादा हो रही है।

मोदी मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण से पहले बहुत सी सूचियां सोशल मीडिया पर वायरल थी , किसी में कोई नाम मिसिंग था तो किसी में कोई दूसरा नाम नहीं था।  लेकिन ज्यादातर सूचियों  में  एक नाम जरूर था – अनुप्रिया पटेल।

लेकिन जब एक एक कर के शपथ ग्रहण करने वालों का नाम पुकारा जाने लगा तो उसमें  अनुप्रिया का नाम नहीं था। हालांकि अनुप्रिया अपनी चिर परिचित मुस्कराहट के साथ परिसर में मौजूद थी , लेकिन टीवी पर समारोह देखने वालों के बीच अनुप्रिया का शपथ न लेना चर्चा का मुद्दा बन चुका था।

थोड़ी देर में सूचनाएँ आने लगी कि अनुप्रिया के ड्राप होने की वजह उनकी एक मांग थी जिसे अमित शाह ने ख़ारिज कर दिया।  अनुप्रिया अपना प्रमोशन चाहती थी और उन्हें पूरी उम्म्मीद थी कि उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा जरूर मिलेगा।  लेकिन यही अनुप्रिया गलती कर गई।

जिस अमित शाह के साथ उन्होंने 5 साल  तक नजदीकी से काम किया  मगर ऐन मौके पर वे शाह के  मिजाज को भूल गई कि – अमित शाह अपनी मर्जी से  किसी को भले ही कुछ दे दें मगर किसी ने अगर कुछ आगे बढ़ कर मांग लिया तो उसे वो कभी नहीं मिलता है।   

अनुप्रिया की पार्टी  अपना दल – एस ,  देश और प्रदेश दोनों जगह एनडीए की प्रमुख सहयोगी है। उनके जरिये 2014 ,2017 और 2019 में भाजपा ने यूपी में कुर्मी वोटरों को साधने में कामयाबी पाई। लेकिन गठबंधन धर्म का नारा लगाने वाली भाजपा ने इस बार उन्हें दरकिनार कर दिया।

राजनीतिक विश्लेषक ओम दत्त कहते है – ” दरअसल अनुप्रिया ने लोकसभा चुनावो के पहले से ही भाजपा पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था।  जब यूपी में ओम प्रकाश राजभर अपने बागी तेवर दिखा रहे थे , उस वक्त अनुप्रिया ने  कुछ तेवर दिखाए थे।  उन्होंने प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों  में सम्मान न मिलने की बात कह कर सरकारी कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया था।  वे एनडीए से हटीं तो नहीं , लेकिन ये साफ़ दिखने लगा था कि वे भाजपा पर दबाव बनाना चाह रही हैं।  ”

अनुप्रिया की पार्टी ने 2014 में भी लोकसभा की 2 सीटें जीती थी और वे इस बार कुछ ज्यादा सीटों की उम्म्मीद करने लगी थी।  वक्त की नजाकत समझते हुए भाजपा ने उस वक्त कोई रिएक्शन तो नहीं दिया मगर सीटों के बंटवारे के वक्त उनकी एक सीट बदल जरूर दी।  हालांकि इस बार भी अनुप्रिया सहित दोनों उम्म्मीदवार जीत तो गए , लेकिन अमित शाह इस बात को भूल नहीं पाए थे।  

अब अनुप्रिया खेमा में इस बात की चर्चा होने लगी है कि यूपी में योगी मंत्रिमंडल का जल्द ही विस्तार होना है , और इस विस्तार में अनुप्रिया के पति और विधान परिषद् सदस्य आशीष सिंह पटेल को शामिल किया जाएगा। ये कयास सच हो सकते हैं लेकिन क्या ये संतुलन बनेगा ? बनेगा भी तो कितना वक्त लगेगा ? ये अभी भविष्य के गर्भ में है।

अमित शाह की राजनीति को ढंग से पढ़ने वाले जानते हैं कि वे खुद दबाव में नहीं आते बल्कि सामने वाले को दबाव में लेना बखूबी जानते हैं।  बीते 5 सालों में अनुप्रिया की पार्टी ने लोकसभा और विधान सभा की सीटें तो जीती हैं , लेकिन अपनी पार्टी का आधार नहीं बढ़ा पाई हैं।  ऐसे में उनकी छवि भाजपा की पिछलग्गू पार्टी से ज्यादा नहीं बन सकी है।  अगर भाजपा का साथ उन्हें नहीं मिलता तो वे यूपी के अगले चुनावो में  अपने बूते कितनी सीटें पा सकेंगी ये कहना भी मुश्किल है।

भाजपा की एक और रणनीति को अनुप्रिया पटेल को नहीं भूलना चाहिए।  ओम प्रकाश राजभर से गठबंधन करने के बाद से ही भाजपा ने अपनी पार्टी के राजभर नेताओं को खूब तवज्जो देनी शुरू कर दी थी।  राजभर बिरादरी से ही राजयसभा में भी भेजा गया और योगी मंत्रिमंडल में अनिल राजभर को भी खूब आगे बढ़ाया गया।  भाजपा में कुर्मी नेताओं की कमी भी नहीं है।  स्वतंत्र देव सिंह को अगर भाजपा ने संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दे कर उन्हें आगे बढ़ाया तो यह भी अनुप्रिया के लिए घातक हो जाएगा।

 

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