प्रो. (डॉ.) सुमन कुमार शर्मा
12 जनवरी केवल एक तिथि नहीं है, यह उस चेतना का प्रतीक है जिसने भारत को आत्मविश्वास दिया, उसे अपनी जड़ों पर गर्व करना सिखाया और युवा शक्ति को राष्ट्रनिर्माण का केंद्र बनाया।
इसी दिन स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ और इसी कारण इसे राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत का भविष्य केवल नीतियों या योजनाओं से नहीं, बल्कि जागरूक, आत्मविश्वासी और मूल्यनिष्ठ युवाओं से बनेगा।
वर्ष 2026 में यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जब भारत “विकसित भारत” की ओर बढ़ने का संकल्प ले चुका है और उसकी धुरी युवा शक्ति है।
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत आत्मविश्वास के गहरे संकट से गुजर रहा था। औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज के भीतर यह भावना बैठा दी थी कि उसकी सभ्यता पिछड़ी है, उसका दर्शन अप्रासंगिक है और उसकी धार्मिक परंपराएँ केवल कर्मकांड तक सीमित हैं। इसी वातावरण में स्वामी विवेकानंद का उदय हुआ।
वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि भारत की आत्मा के प्रवक्ता थे। उन्होंने भारतीयों को यह समझाया कि समस्या हमारी संस्कृति में नहीं, बल्कि हमारे आत्मविश्वास के क्षरण में है। जब तक भारत स्वयं को नहीं पहचानेगा, तब तक दुनिया भी उसे नहीं पहचान पाएगी।

सन 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में विवेकानंद का भाषण भारतीय इतिहास का निर्णायक क्षण सिद्ध हुआ। जब उन्होंने मंच से “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका” कहकर संबोधन शुरू किया, तो वह केवल शिष्टाचार नहीं था, बल्कि समूची मानवता को जोड़ने वाली भारतीय दृष्टि की अभिव्यक्ति थी। उस एक संबोधन ने पश्चिमी दुनिया की धारणा को झकझोर दिया।
विवेकानंद ने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन अंधविश्वास नहीं, बल्कि चेतना का विज्ञान है; कि वेदांत आत्मा की स्वतंत्रता का दर्शन है; कि योग शरीर और मन के संतुलन का व्यावहारिक मार्ग है; और कि धर्म भय या विभाजन नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने का साधन है। उस मंच से भारत पहली बार आधुनिक विश्व के सामने एक विचारशील, सहिष्णु और गहन बौद्धिक परंपरा वाले राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत हुआ।
इस ऐतिहासिक प्रस्तुति का प्रभाव केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। इसका सबसे गहरा असर स्वयं भारत पर पड़ा। भारतीयों को पहली बार यह एहसास हुआ कि उनकी सभ्यता किसी से कम नहीं है, कि उनके विचार विश्व को दिशा दे सकते हैं। विवेकानंद ने भारत को स्वतंत्रता का नारा नहीं दिया, बल्कि स्वतंत्र सोच का साहस दिया। उन्होंने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि शक्ति बाहर नहीं, भीतर है। यही वह बिंदु था जहाँ से विवेकानंद भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा और आत्मविश्वास का स्रोत बने।
विवेकानंद का दर्शन युवाओं से कर्म, चरित्र और करुणा की अपेक्षा करता है। वे कहते थे कि शिक्षा वह नहीं जो केवल जानकारी दे, बल्कि वह है जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे। उनके लिए युवा वह शक्ति थे जो वर्तमान को बदल सकती है, केवल भविष्य का इंतजार करने वाली पीढ़ी नहीं।
यही विचार आज राष्ट्रीय युवा दिवस की आत्मा है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रनिर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकारों या संस्थानों की नहीं, बल्कि हर युवा की है।
आज का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ तकनीक, शिक्षा और वैश्विक संपर्क के अवसर पहले से कहीं अधिक हैं। ऐसे समय में “विकसित युवा” का अर्थ केवल आर्थिक रूप से सक्षम होना नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से समृद्ध, नैतिक रूप से दृढ़ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार होना है।
विकसित युवा वह है जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहते हुए आधुनिकता को अपनाता है, जो ज्ञान को केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए उपयोग करता है, और जो सफलता को सेवा से अलग नहीं मानता।
विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब युवा अपनी भूमिका को समझें। जब वे शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण का साधन मानें; जब वे रोजगार के साथ-साथ उद्यमिता और नवाचार की ओर बढ़ें; जब वे पर्यावरण, स्वास्थ्य, समानता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि सच्चा राष्ट्रनिर्माण आत्मनिर्माण से शुरू होता है।
राष्ट्रीय युवा दिवस हमें यह भी सिखाता है कि आत्मविश्वास और अनुशासन के बिना कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। विवेकानंद का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक अकेला व्यक्ति भी, यदि उसके विचार स्पष्ट हों और उद्देश्य ऊँचा हो, तो पूरे राष्ट्र की दिशा बदल सकता है।
आज का युवा जब वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह विज्ञान, खेल, तकनीक या संस्कृति के क्षेत्र में आगे बढ़ता है, तो वह अनजाने में उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है जिसकी नींव विवेकानंद ने रखी थी।
अंततः राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 का संदेश सीधा और स्पष्ट है। भारत का विकास केवल आंकड़ों से नहीं मापा जाएगा, बल्कि उसके युवाओं के चरित्र, दृष्टि और योगदान से पहचाना जाएगा। जब युवा अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करेंगे, तभी विकसित भारत का सपना साकार होगा।
स्वामी विवेकानंद ने भारत को दुनिया के सामने खड़ा किया और भारतीयों को स्वयं से परिचित कराया। आज की युवा पीढ़ी का दायित्व है कि वह उस विरासत को आत्मविश्वास, कर्म और सेवा के माध्यम से आगे बढ़ाए। यही राष्ट्रीय युवा दिवस का सार है और यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी।
12 जनवरी केवल एक तिथि नहीं है, यह उस चेतना का प्रतीक है जिसने भारत को आत्मविश्वास दिया, उसे अपनी जड़ों पर गर्व करना सिखाया और युवा शक्ति को राष्ट्रनिर्माण का केंद्र बनाया।
इसी दिन स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ और इसी कारण इसे राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत का भविष्य केवल नीतियों या योजनाओं से नहीं, बल्कि जागरूक, आत्मविश्वासी और मूल्यनिष्ठ युवाओं से बनेगा। वर्ष 2026 में यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जब भारत “विकसित भारत” की ओर बढ़ने का संकल्प ले चुका है और उसकी धुरी युवा शक्ति है।
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत आत्मविश्वास के गहरे संकट से गुजर रहा था। औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज के भीतर यह भावना बैठा दी थी कि उसकी सभ्यता पिछड़ी है, उसका दर्शन अप्रासंगिक है और उसकी धार्मिक परंपराएँ केवल कर्मकांड तक सीमित हैं। इसी वातावरण में स्वामी विवेकानंद का उदय हुआ।
वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि भारत की आत्मा के प्रवक्ता थे। उन्होंने भारतीयों को यह समझाया कि समस्या हमारी संस्कृति में नहीं, बल्कि हमारे आत्मविश्वास के क्षरण में है। जब तक भारत स्वयं को नहीं पहचानेगा, तब तक दुनिया भी उसे नहीं पहचान पाएगी।
सन 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में विवेकानंद का भाषण भारतीय इतिहास का निर्णायक क्षण सिद्ध हुआ। जब उन्होंने मंच से “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका” कहकर संबोधन शुरू किया, तो वह केवल शिष्टाचार नहीं था, बल्कि समूची मानवता को जोड़ने वाली भारतीय दृष्टि की अभिव्यक्ति थी।
उस एक संबोधन ने पश्चिमी दुनिया की धारणा को झकझोर दिया। विवेकानंद ने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन अंधविश्वास नहीं, बल्कि चेतना का विज्ञान है; कि वेदांत आत्मा की स्वतंत्रता का दर्शन है; कि योग शरीर और मन के संतुलन का व्यावहारिक मार्ग है; और कि धर्म भय या विभाजन नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने का साधन है। उस मंच से भारत पहली बार आधुनिक विश्व के सामने एक विचारशील, सहिष्णु और गहन बौद्धिक परंपरा वाले राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत हुआ।

इस ऐतिहासिक प्रस्तुति का प्रभाव केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। इसका सबसे गहरा असर स्वयं भारत पर पड़ा। भारतीयों को पहली बार यह एहसास हुआ कि उनकी सभ्यता किसी से कम नहीं है, कि उनके विचार विश्व को दिशा दे सकते हैं। विवेकानंद ने भारत को स्वतंत्रता का नारा नहीं दिया, बल्कि स्वतंत्र सोच का साहस दिया। उन्होंने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि शक्ति बाहर नहीं, भीतर है। यही वह बिंदु था जहाँ से विवेकानंद भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा और आत्मविश्वास का स्रोत बने।
विवेकानंद का दर्शन युवाओं से कर्म, चरित्र और करुणा की अपेक्षा करता है। वे कहते थे कि शिक्षा वह नहीं जो केवल जानकारी दे, बल्कि वह है जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे। उनके लिए युवा वह शक्ति थे जो वर्तमान को बदल सकती है, केवल भविष्य का इंतजार करने वाली पीढ़ी नहीं।
यही विचार आज राष्ट्रीय युवा दिवस की आत्मा है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रनिर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकारों या संस्थानों की नहीं, बल्कि हर युवा की है।
आज का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ तकनीक, शिक्षा और वैश्विक संपर्क के अवसर पहले से कहीं अधिक हैं। ऐसे समय में “विकसित युवा” का अर्थ केवल आर्थिक रूप से सक्षम होना नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से समृद्ध, नैतिक रूप से दृढ़ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार होना है। विकसित युवा वह है जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहते हुए आधुनिकता को अपनाता है, जो ज्ञान को केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए उपयोग करता है, और जो सफलता को सेवा से अलग नहीं मानता।
विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब युवा अपनी भूमिका को समझें। जब वे शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण का साधन मानें; जब वे रोजगार के साथ-साथ उद्यमिता और नवाचार की ओर बढ़ें; जब वे पर्यावरण, स्वास्थ्य, समानता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि सच्चा राष्ट्रनिर्माण आत्मनिर्माण से शुरू होता है।
राष्ट्रीय युवा दिवस हमें यह भी सिखाता है कि आत्मविश्वास और अनुशासन के बिना कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। विवेकानंद का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक अकेला व्यक्ति भी, यदि उसके विचार स्पष्ट हों और उद्देश्य ऊँचा हो, तो पूरे राष्ट्र की दिशा बदल सकता है। आज का युवा जब वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जब वह विज्ञान, खेल, तकनीक या संस्कृति के क्षेत्र में आगे बढ़ता है, तो वह अनजाने में उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है जिसकी नींव विवेकानंद ने रखी थी।
अंततः राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 का संदेश सीधा और स्पष्ट है। भारत का विकास केवल आंकड़ों से नहीं मापा जाएगा, बल्कि उसके युवाओं के चरित्र, दृष्टि और योगदान से पहचाना जाएगा।
जब युवा अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करेंगे, तभी विकसित भारत का सपना साकार होगा। स्वामी विवेकानंद ने भारत को दुनिया के सामने खड़ा किया और भारतीयों को स्वयं से परिचित कराया। आज की युवा पीढ़ी का दायित्व है कि वह उस विरासत को आत्मविश्वास, कर्म और सेवा के माध्यम से आगे बढ़ाए। यही राष्ट्रीय युवा दिवस का सार है और यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी।
(लेखक के निजी विचार हैं। लेखक आचार्य, राजनीति विज्ञान, उच्च शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार से जुड़े हैं।)
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