“हम दलाल देश नहीं”… पश्चिम एशिया संकट पर भारत का सख्त संदेश, पाकिस्तान की पेशकश पर जयशंकर का दो टूक जवाब

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक स्थिति साफ करते हुए यह संकेत दिया है कि वह किसी भी तरह की मध्यस्थता की भूमिका में खुद को नहीं देखता। बुधवार (25 मार्च 2026) को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री S. Jaishankar ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत “दलाल देश” नहीं बन सकता।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब Pakistan ने अमेरिका और Iran के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए खुद को मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर दोनों पक्ष सहमत हों, तो उनका देश बातचीत की मेजबानी करने को तैयार है।
भारत का रुख: दूरी बनाकर संतुलन
बैठक के दौरान विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या प्रधानमंत्री Narendra Modi और Donald Trump के बीच इस मुद्दे पर कोई ठोस बातचीत हुई है। इसके जवाब में विदेश मंत्री ने बताया कि भारत की प्राथमिकता स्पष्ट है—संघर्ष का जल्द अंत।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने अमेरिकी नेतृत्व से साफ कहा है कि युद्ध का असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक है और इसे जल्द रोका जाना चाहिए।
पुराना इतिहास, नया संदर्भ
विदेश मंत्री ने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका लंबे समय से पाकिस्तान को ईरान के साथ संवाद में शामिल करता रहा है। उनके अनुसार, यह प्रक्रिया कोई नई नहीं बल्कि 1980 के दशक से चली आ रही है।
हालांकि, भारत ने इस पूरे मामले में खुद को अलग रखते हुए स्पष्ट किया है कि उसकी भूमिका “संतुलित और जिम्मेदार पर्यवेक्षक” की है, न कि मध्यस्थ की।
ऊर्जा और भारतीयों की सुरक्षा पर फोकस
बैठक में सरकार ने विपक्ष को भरोसा दिलाया कि देश में कच्चे तेल और गैस की कोई कमी नहीं है। साथ ही, विदेशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया गया।
सरकार का कहना है कि भारत ने वैकल्पिक आपूर्ति चैनल पहले से तैयार कर रखे हैं, जिससे घरेलू जरूरतों पर असर नहीं पड़ेगा।
विपक्ष की नाराजगी
वहीं, विपक्षी दलों ने सरकार के जवाब को अधूरा बताते हुए संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग दोहराई। कांग्रेस नेता Tariq Anwar ने कहा कि कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।
पूरे घटनाक्रम से साफ है कि भारत इस संवेदनशील वैश्विक संकट में “नपे-तुले कदम” की रणनीति अपना रहा है—जहां एक तरफ वह शांति की वकालत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर किसी भी सीधे हस्तक्षेप से दूरी बनाए हुए है।


