UP Politics 2027: क्या ‘मुस्लिम-यादव’ वाली छवि से बाहर निकल रहे हैं अखिलेश?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भले ही विधानसभा चुनाव दूर हों, लेकिन सूबे की सियासी जमीन को हथियाने के लिए राजनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मजबूत गढ़ को ढहाने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पारंपरिक रणनीति में एक बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव किया है। अखिलेश अब केवल पारंपरिक जातीय लामबंदी तक सीमित नहीं है

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिले फीडबैक के बाद, सपा नेतृत्व को यह साफ समझ आ गया है कि बीजेपी के ‘हार्ड हिंदुत्व’ और विकास के नैरेटिव को सिर्फ पुराने ढर्रे से मात नहीं दी जा सकती।

यही वजह है कि अखिलेश यादव अब सामाजिक न्याय, संविधान की रक्षा और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के एक नए राजनीतिक घालमेल के साथ मैदान में उतर रहे हैं।

1.’PDA आरक्षण घोटाला’ पुस्तिका और वैचारिक घेराबंदी:पहला स्तंभ.

अखिलेश यादव ने लखनऊ में एक हाई-प्रोफाइल प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान लाल रंग की एक विशेष पुस्तिका जारी की, जिसे ‘PDA आरक्षण घोटाला’ (ऑडिट अंक-1) नाम दिया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश अब सीधे तौर पर बीजेपी के धार्मिक एजेंडे पर रिएक्ट करने की गलती नहीं दोहराना चाहते।

हाल ही में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर नमाज को लेकर तीखा बयान दिया, तब अखिलेश यादव ने उस पर कोई आक्रामक या विवादित टिप्पणी करने से साफ दूरी बना ली। सपा का साफ निर्देश है कि पार्टी का कोई भी नेता धर्म या जाति पर ऐसा कोई बयान न दे, जिससे बहुसंख्यक हिंदू वोटर्स छिटकें।

बीजेपी के ‘तुष्टिकरण’ के आरोपों को बेअसर करने के लिए अखिलेश यादव अब खुद धार्मिक और सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। वे साधु-संतों से मुलाकात कर रहे हैं, भंडारों में प्रसाद बांटते दिख रहे हैं और इसके साथ ही अपने गृह जनपद इटावा में भगवान भोलेनाथ के एक भव्य मंदिर का निर्माण भी करवा रहे हैं। वे सार्वजनिक मंचों से ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के साथ-साथ हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं।

क्या 2027 में रंग लाएगा ‘5% बनाम 95%’ का नैरेटिव?

सपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी अपनी ‘मुस्लिम-यादव’ (MY) वाली पुरानी छवि से बाहर निकलकर खुद को सर्वसमाज की पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहती है। अखिलेश का नया दांव बीजेपी को उसी के पिच पर घेरने का है— यानी सीधे धार्मिक ध्रुवीकरण का मौका न देकर बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक और संवैधानिक अधिकारों को मुख्य चुनावी मुद्दा बना दिया जाए।

2027 का यूपी चुनाव बेहद दिलचस्प होने वाला है। एक तरफ जहां बीजेपी अपने कोर हिंदुत्व और प्रशासनिक इकबाल (लॉ एंड ऑर्डर) के दम पर सत्ता विरोधी लहर को मात देने की तैयारी में है, वहीं अखिलेश यादव का ‘PDA प्लस सॉफ्ट हिंदुत्व’ का यह कॉम्बिनेशन अगर जमीन पर असरदार रहा, तो उत्तर प्रदेश का सियासी नक्शा पूरी तरह बदल सकता है।

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