ट्रंप का चीन दौरा: आखिर क्यों डर के माहौल में हैं अमेरिकी अधिकारी?

बीजिंग/वाशिंगटन।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 9 साल बाद हुआ चीन दौरा सिर्फ कूटनीतिक बैठकों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे डिजिटल घेराबंदी के लिए भी चर्चा में है। अमेरिकी मीडिया की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जासूसी के डर से अमेरिकी डेलिगेशन ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है।

अमेरिकी अधिकारियों को इस बात का प्रबल अंदेशा है कि चीन में उनके हर डिजिटल कदम पर नजर रखी जा सकती है। इसी सुरक्षा खतरे को देखते हुए प्रशासन ने ‘जीरो ट्रस्ट’ पॉलिसी अपनाई है:

  • टेम्परेरी डिवाइस: डेलिगेशन के सदस्यों को उनके नियमित फोन और लैपटॉप घर पर ही छोड़ने के निर्देश दिए गए। उनकी जगह बिल्कुल नए और ‘क्लीन’ डिवाइस दिए गए हैं।
  • नो पर्सनल डेटा: इन फोन और लैपटॉप में किसी भी अधिकारी की निजी जानकारी, पुराना ईमेल बैकअप या संवेदनशील डेटा मौजूद नहीं है।
  • USB पर पाबंदी: डेलिगेशन को सख्त हिदायत दी गई है कि वे चीन में किसी भी अज्ञात पोर्ट या सार्वजनिक स्थान पर USB का इस्तेमाल न करें।

सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था इतनी कड़ी है कि इस दौरे के खत्म होते ही इन सभी अस्थाई डिवाइसों को नष्ट (Destroy) कर दिया जाएगा या पूरी तरह फॉर्मेट किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी ‘चाइनीज वायरस’ या मैलवेयर अमेरिकी सरकारी नेटवर्क में प्रवेश न कर सके।

2017 के बाद यह पहला मौका है जब ट्रंप चीनी धरती पर हैं। गुरुवार को बीजिंग में भव्य ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ के साथ उनका स्वागत हुआ। इस ऐतिहासिक दौरे के पीछे कई बड़े एजेंडे हैं:

  1. ट्रेड वॉर: दोनों देशों के बीच व्यापारिक विवादों को कम करना और नए बिजनेस रास्ते खोलना।
  2. ईरान संकट: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान के साथ युद्ध जैसी स्थिति पर चर्चा।
  3. ताइवान और रक्षा: ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे संवेदनशील मुद्दों पर शी जिनपिंग के साथ बातचीत।

बीजिंग में ट्रंप और जिनपिंग की मुस्कराहटों के बीच, पर्दे के पीछे साइबर जासूसी का यह डर बताता है कि दोनों महाशक्तियों के बीच अविश्वास की खाई कितनी गहरी है। अमेरिका ने पहले ही मान लिया है कि चीन में उनके हर कॉल और मैसेज को ट्रैक किया जा सकता है।

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