ईरान जंग के तीसरे हफ्ते में घिरे ट्रंप, सहयोगियों ने छोड़ा साथ

ईरान के साथ जारी युद्ध जैसे ही तीसरे हफ्ते में पहुंचा, डोनाल्ड ट्रंप की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होती नजर आ रही है। एक ओर सऊदी अरब समेत कई अरब देशों ने अमेरिका का खुलकर साथ देने से दूरी बना ली है, वहीं यूरोप और नाटो से जुड़े देशों ने भी इस संघर्ष में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इससे ट्रंप की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं।

शुरुआत में ट्रंप को उम्मीद थी कि सहयोगी देशों के समर्थन से ईरान को जल्द ही कमजोर कर दिया जाएगा, लेकिन करीब दो हफ्ते बाद हालात उलटते दिख रहे हैं। भारी नुकसान के बावजूद ईरान अब भी मजबूत स्थिति में बना हुआ है।

ट्रंप की रणनीतिक चूकें

1. युद्ध का गलत आकलन
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने यह मान लिया था कि हवाई हमलों से ईरान की सत्ता को गिराया जा सकता है। लेकिन ईरान की विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना (मोजेक मॉडल) ने इस योजना को नाकाम कर दिया। अब युद्ध लंबा खिंचता दिख रहा है, और जमीनी सेना उतारने का विकल्प बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है।

2. खुफिया चेतावनियों की अनदेखी
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पहले ही चेताया था कि केवल हवाई हमलों से ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव नहीं होगा। एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इससे वहां की सरकार और अधिक मजबूत हो सकती है। इन चेतावनियों के बावजूद ट्रंप ने कार्रवाई का फैसला लिया।

3. अरब सहयोगियों से दूरी
ईरान पर हमले से पहले अमेरिका अपने पारंपरिक अरब सहयोगियों को साथ नहीं ला सका। कतर, यूएई और ओमान जैसे देशों ने इस कदम पर नाराजगी जताई, जिसके चलते अमेरिका को क्षेत्रीय समर्थन नहीं मिल पाया।

4. विवादित बयानबाजी
युद्ध के शुरुआती दिनों में बढ़त मिलने के बाद ट्रंप के कुछ बयान विवादों में आ गए। उन्होंने सैन्य कार्रवाई को लेकर ऐसे बयान दिए, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असंवेदनशील और गैर-जिम्मेदाराना माना गया। इससे अमेरिका की छवि को नुकसान पहुंचा।

5. युद्धविराम पर असमंजस
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने और वैश्विक बाजारों में गिरावट के बाद ट्रंप ने कभी युद्ध खत्म करने के संकेत दिए, तो कभी संघर्ष जारी रखने की बात कही। इस अस्थिर रुख के कारण सहयोगी देशों का भरोसा और कमजोर हुआ है।

कुल मिलाकर, ईरान के खिलाफ शुरू किया गया यह सैन्य अभियान अब अमेरिका के लिए जटिल और लंबा संघर्ष बनता जा रहा है, जिसमें कूटनीतिक समर्थन की कमी ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती बन रही है।

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