बिहार में डिप्टी CM की कुर्सी बनी सियासी सुर्ख़ियों का केंद्र

जुबिली स्पेशल डेस्क

पटना: बिहार की सियासत में मुख्यमंत्री की कुर्सी जितनी चर्चा में रहती है, उतनी ही डिप्टी सीएम की कुर्सी अब सुर्खियों में है। इंडिया गठबंधन में इस पद को लेकर सियासी हलचल तेज़ हो गई है।

मुकेश सहनी और कांग्रेस की मांग

विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के नेता मुकेश सहनी ने कहा है कि अगर गठबंधन सत्ता में आता है, तो डिप्टी सीएम पद उनकी पार्टी को मिलना चाहिए। सहनी का तर्क है कि निषाद समाज राज्य की बड़ी आबादी है और इस समाज ने हमेशा विपक्षी गठबंधन का समर्थन किया है। उन्होंने खुद को ‘निषादों की आवाज़’ बताते हुए कहा कि पिछड़ी जातियों और मल्लाह समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना जरूरी है।

कांग्रेस ने भी खुलकर कहा है कि गठबंधन में एक डिप्टी सीएम दलित और दूसरा मुस्लिम होना चाहिए। पार्टी का कहना है कि बिहार में लंबे समय तक ऊंची जातियों और ओबीसी नेताओं का वर्चस्व रहा, जबकि दलित और मुस्लिम समाज को बराबरी का राजनीतिक दर्जा नहीं मिला।

गठबंधन में एक से अधिक डिप्टी सीएम?

इस बहस का असर आरजेडी और तेजस्वी यादव पर भी पड़ा है। यादव पहले से ही उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं और गठबंधन का प्रमुख चेहरा माने जाते हैं। अब मुकेश सहनी और कांग्रेस के नए प्रस्तावों के बाद सवाल उठता है कि क्या बिहार में एक से अधिक डिप्टी सीएम होंगे?

जातीय समीकरण और राजनीतिक रणनीति

बिहार में दलित आबादी करीब 16%, मुस्लिम आबादी 17%, और ओबीसी व पिछड़ी जातियां मिलाकर लगभग 50% हैं। हर पार्टी अपनी जातीय पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। मुकेश सहनी का निशाद समाज कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है, जबकि कांग्रेस मुस्लिम चेहरों को आगे लाकर सीमांचल और पूर्वी बिहार में वोट बैंक बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

डिप्टी सीएम की कुर्सी सियासी प्रतीक बन गई

डिप्टी सीएम का पद अब बिहार में केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कौन सा समाज और पार्टी सबसे अहम है इसका प्रतीक बन गया है। मुकेश सहनी की मांग पिछड़ों और मल्लाह समाज की आवाज़ है, जबकि कांग्रेस की मांग सामाजिक संतुलन और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का संदेश देती है। चुनाव से पहले यह कुर्सी सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत बन चुकी है।

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