जुबिली स्पेशल डेस्क
केरल विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस और शशि थरूर के रिश्तों में खटास एक बार फिर चर्चा में है। चुनावी रणनीति को लेकर दिल्ली में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी में आयोजित कांग्रेस की अहम बैठक में शशि थरूर शामिल नहीं हुए। बताया जा रहा है कि वे फिलहाल केरल में ही मौजूद हैं।
कांग्रेस के भीतर शशि थरूर को लेकर असहजता कोई नई बात नहीं है, लेकिन 2026 के केरल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, यह सवाल और गहराता जा रहा है कि पार्टी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से क्यों बचती रही है।
शशि थरूर: नेता से आगे एक पहचान
शशि थरूर कांग्रेस के उन चुनिंदा नेताओं में शुमार हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और बौद्धिक छवि पार्टी की सीमाओं से आगे जाती है। संयुक्त राष्ट्र में लंबा अनुभव, प्रभावशाली लेखन और वैश्विक मंचों पर स्वीकार्यता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।
कांग्रेस नेतृत्व यह भी समझता है कि थरूर पर कार्रवाई केवल एक सांसद के खिलाफ कदम नहीं होगी, बल्कि इससे पार्टी की वैचारिक और बौद्धिक छवि को भी झटका लग सकता है।
केरल में कांग्रेस की मजबूरी
केरल में कांग्रेस 2016 से सत्ता से बाहर है। ऐसे में 2026 का विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए “करो या मरो” की स्थिति जैसा है। इस दौर में पार्टी कोई ऐसा फैसला नहीं लेना चाहती, जिससे आंतरिक गुटबाज़ी खुलकर सामने आ जाए और चुनावी तैयारी प्रभावित हो।
शशि थरूर पर सख्ती कांग्रेस के भीतर मतभेदों को और गहरा कर सकती है, जिसका सीधा नुकसान चुनावी गणित पर पड़ेगा।
थरूर का जाना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका
पार्टी रणनीतिकार इस आशंका को भी गंभीरता से लेते हैं कि यदि शशि थरूर कांग्रेस से अलग होते हैं, तो बीजेपी या एलडीएफ जैसे दल उन्हें हाथों-हाथ लेने में देर नहीं लगाएंगे। खासकर तिरुवनंतपुरम की 14 विधानसभा सीटों पर थरूर की व्यक्तिगत पकड़ कांग्रेस के लिए बेहद अहम मानी जाती है। उनका बाहर जाना पार्टी के लिए भारी नुकसान साबित हो सकता है।
पार्टी लाइन से अलग बयान
शशि थरूर कई मौकों पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस की आधिकारिक लाइन से अलग राय रखते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के कोच गौतम गंभीर की खुलकर तारीफ की, जिसे पार्टी के भीतर राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा गया।
कोच्चि ‘महा पंचायत’ से बढ़ी नाराजगी
सूत्रों के मुताबिक, कोच्चि में आयोजित KPCC की ‘महा पंचायत’ के दौरान शशि थरूर को अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। मंच संचालन और भाषण क्रम को लेकर वे राज्य और केंद्रीय नेतृत्व दोनों से नाराज बताए जा रहे हैं। इसी नाराजगी का असर दिल्ली में हुई अहम बैठक में उनकी गैरमौजूदगी के रूप में सामने आया।
कांग्रेस के सामने स्थिति साफ है—अगर थरूर पर कार्रवाई होती है तो पार्टी में कलह बढ़ेगी, और अगर नहीं होती तो अनुशासन पर सवाल उठते रहेंगे। फिलहाल पार्टी नेतृत्व मानता है कि शशि थरूर को नाराज करने का जोखिम, उन्हें कुछ हद तक खुली छूट देने से कहीं ज़्यादा बड़ा है।
कांग्रेस जानती है कि शशि थरूर कोई साधारण या विकल्पहीन नेता नहीं हैं। यही वजह है कि पार्टी फिलहाल टकराव नहीं, संतुलन की राजनीति अपना रही है—कम से कम तब तक, जब तक केरल विधानसभा चुनाव पूरे नहीं हो जाते।
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