राजावादियों की शह और साम्प्रदायिकता की गहरी साजिश का नतीजा है नेपाल में बीरगंज हिंसा

डा. उत्कर्ष सिन्हा
भारत नेपाल सीमा पर बिहार से लगा नेपाल का बीरगंज शहर, सोमवार की रात हुई हिंसक घटनाओं के बाद फिर से कर्फ्यू की चपेट में आ गया। एक टिकटॉक वीडियो में कथित रूप से हिंदू-विरोधी टिप्पणियों के बाद धनुषा जिले में मस्जिद पर हमला हुआ, जिसके बाद पारसा जिले के बीरगंज में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया और आगजनी की।

नेपाल के इतिहास में साम्प्रदायिक झड़पें बेहद दुर्लभ रही हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से देश में बार-बार अशांति का दौर चल रहा है—सितंबर 2025 में जेन-जेड विद्रोह से संसद पर हमला, राजतंत्र समर्थक प्रदर्शन और अब धार्मिक तनाव। इन घटनाओं के पीछे सीमावर्ती इलाकों में हिंदुत्ववादियों के बढ़ते प्रभाव, राजा समर्थकों की संभावित शह, अमेरिकी दखलंदाजी और बाहरी ताकतों द्वारा चुनाव टालने की साजिश जैसे सवालों की पड़ताल करना जरुरी है ।
बीरगंज हिंसा का पूरा विवरण और तात्कालिक परिणाम
बीरगंज में 4 जनवरी 2026 को दो मुस्लिम युवकों द्वारा टिकटॉक पर अपलोड किया गया एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें कथित तौर पर हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की गयी बताई गईं। इसके जवाब में धनुषा जिले के कमला नगरपालिका वार्ड नंबर 6 स्थित मस्जिद पर हमला हुआ और तोड़फोड़ की गई। इसके बाद बीरगंज में मुस्लिम समुदाय के प्रदर्शन के बाद घटना ने हिंसक रूप धारण कर लिया—प्रदर्शनकारियों ने पुलिस चौकी पर पथराव किया, टायर जलाए और सड़कों पर अवरोधक खड़े किए। पारसा जिला प्रशासन ने 5 जनवरी शाम 6 बजे से अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया, जो 6 जनवरी दोपहर 1 बजे तक बढ़ा दिया गया; आवश्यक सेवाओं जैसे अस्पतालों और मीडिया को छूट दी गई, लेकिन सुरक्षा बलों को गोली चलाने का अधिकार प्रदान किया गया।

भारत-नेपाल सीमा को सील कर दिया गया, जिससे व्यापार प्रभावित हुआ। नेपाल पुलिस ने सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी है, लेकिन अफवाहें सीमा पार आसानी से फैल रही हैं।
नेपाल के इतिहास में साम्प्रदायिक शांति की परंपरा
नेपाल का राजनीतिक इतिहास राणा शासन की सदी भर लंबी तानाशाही (1846-1951), राजतंत्र के उतार-चढ़ाव और 1996-2006 के माओवादी गृहयुद्ध से भरा पड़ा है, लेकिन साम्प्रदायिक दंगे यहां कभी प्रमुख समस्या नहीं बने। 81 प्रतिशत हिंदू बहुल इस देश में मुस्लिम 4 प्रतिशत , बौद्ध और अन्य अल्पसंख्यक शताब्दियों से शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहे।
2008 में धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित होने के बाद भी धार्मिक सद्भाव बना रहा। हालांकि, 2025 से अशांति का सिलसिला तेज हुआ—सितंबर में सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ जेन-जेड युवाओं ने संसद पर हमला कर दिया, जिससे केपी शर्मा ओली सरकार गिर गई।
मार्च 2025 में राजतंत्र समर्थकों ने राजा ज्ञानेन्द्र शाह के पक्ष में हिंसक प्रदर्शन किए। ये घटनाएं राजनीतिक लगती हैं, लेकिन बीरगंज जैसी धार्मिक हिंसा नई चुनौती है, जो सीमावर्ती प्रभाव को उजागर करती है।
सीमावर्ती इलाकों में हिंदुत्ववादियों का बढ़ता कद
भारत से सटे तराई या ‘बरदार’ इलाकों में हिंदुत्व विचारधारा का प्रसार चिंताजनक रूप धारण कर चुका है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल जैसे संगठनों ने नेपाल में अपनी शाखाएं स्थापित की हैं, खासकर बीरगंज, लुंबिनी और मलंगवा जैसे क्षेत्रों में।
नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाने में जो संगठन सबसे सक्रिय है, उसका नाम ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ (एचएसएस) है जो भारत के आरएसएस के पैटर्न पर काम कर रहा है ।
2024 से ये समूह गौहत्या विरोधी, धर्मांतरण रोकथाम और ‘हिंदू राष्ट्र’ पुनर्स्थापना की रैलियां चला रहे हैं। बीरगंज हिंसा में मस्जिद तोड़फोड़ का तरीका ठीक वैसा ही है जैसा भारत के हिंदुत्व पैटर्न में देखा जाता है। इससे नेपाल की धर्मनिरपेक्ष संरचना खतरे में पड़ रही है, क्योंकि तराई में मधेशी समुदाय पहले से ही एक अलग तरह की भावना रखता है।
राजा समर्थकों की भूमिका: शह या संयोग?
राजतंत्र समर्थक, मुख्य रूप से राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) से जुड़े, 2025 के प्रदर्शनों में अग्रिम पंक्ति में रहे। राजा ज्ञानेन्द्र को हिंदू एकता का प्रतीक मानने वाले ये तत्व ‘गो-रक्षा’ और ‘हिंदू राष्ट्र’ के नारे लगा रहे हैं। आरपीपी नेता पशुपति शमशेर राणा जैसे पूर्व मंत्रियों ने प्रदर्शनों को हवा दी।
बीरगंज जैसे इलाकों में राजतंत्रवाद और हिंदुत्व का गठजोड़ दिख रहा है—क्या इन्हें हिंसा की शह मिल रही है? संभव है, क्योंकि ये अशांति से गणतंत्र को अस्थिर कर राजतंत्र बहाल करने का सपना देख रहे हैं। 2025 के संसद हमले में भी इनकी भूमिका संदिग्ध बताई जाती है ।
अमेरिकी दखलंदाजी के पुराने नक्शे कदम
अमेरिका का नेपाल में हस्तक्षेप कोई नई बात नहीं—1960-70 के दशक में सीआईए ने मुस्तांग से तिब्बत विद्रोहियों को समर्थन दिया। 2000 के दशक में माओवादियों को आतंकी घोषित कर हथियार आपूर्ति की। 2025 के जेन-जेड विद्रोह और संसद हमले में ‘डीप स्टेट’ की संलिप्तता के आरोप लगे।
ट्रंप प्रशासन ने यूएसएआईडी फंडिंग कम की, लेकिन रणनीतिक हित जैसे चीन के प्रभाव को रोखना जारी है। पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने ‘प्रगतिशील ताकतों’ पर विदेशी साजिश का आरोप लगाया। बीरगंज जैसी घटनाएं इसी चक्र का हिस्सा लगती हैं।
बाहरी ताकतें और चुनाव टालने की मंशा
मार्च 2026 में आम चुनाव निर्धारित हैं, संसद भंग होने के बाद इंटरिम सरकार सुशीला कार्की के नेतृत्व में है। राष्ट्रपति ने सभी दलों से सहयोग मांगा। लेकिन लगातार अशांति—जेन-जेड विद्रोह, राजतंत्र प्रदर्शन, अब साम्प्रदायिक हिंसा—चुनाव टाल सकती है। बाहरी शक्तियां (अमेरिका, अन्य) अस्थिरता बनाए रखकर भारत-चीन संतुलन बिगाड़ना चाहती हैं, एनजीओ फंडिंग और सोशल मीडिया के जरिए। नेपाल को सतर्क रहना होगा।
एकजुटता का समय: नेपाल के लिए सबक
बीरगंज का कर्फ्यू नेपाल की नाजुक एकता का प्रतीक है। हिंदुत्व, राजतंत्रवाद और विदेशी साजिशें मिलकर लोकतंत्र को चुनौती दे रही हैं, लेकिन नेपाल का बहुलवादी इतिहास मजबूती देता है। सरकार को अफवाहें रोकनी होंगी, सीमा सुरक्षा मजबूत करनी होगी, सोशल मीडिया नियंत्रित करना होगा और राजनीतिक दलों को संवाद के लिए एकजुट होना चाहिए। चुनाव समय पर कराने से ही स्थिरता आएगी। नेपाल हिमालयी शांति का प्रतीक बने, हिंसा का शिकार नहीं।



