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	<title>ग्लोबल वार्मिंग Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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	<link>https://www.jubileepost.in/tag/ग्लोबल-वार्मिंग/</link>
	<description>News &#38; Information Portal</description>
	<lastBuildDate>Sat, 09 Dec 2023 10:43:52 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
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		<title>दुनिया तबाही और बर्बादी की कगार पर: जलवायु पर शोध कर रहे अनुसंधानकर्ताओं ने लिखा एक पत्र</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/the-world-is-on-the-verge-of-disaster-and-destruction-researchers-doing/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Supriya Singh]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 09 Dec 2023 10:42:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[COP28]]></category>
		<category><![CDATA[ग्लोबल वार्मिंग]]></category>
		<category><![CDATA[जलवायु]]></category>
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					<description><![CDATA[डा. सीमा जावेद वर्ष 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड के एमिशन को शून्य तक पहुंचाने की कार्रवाई को लेकर किसी मुगालते की गुंजाइश नहीं इन दिनों चल रहे COP28 के मौक़े पर जारी ग्लोबल टिपिंग पॉइंट्स रिपोर्ट &#8211; दुनिया की तबाही और बर्बादी की कगार पर पहुँचने की दास्तान बयान करती है। इस बीच जलवायु पर &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="582" height="727" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/09/seema-jawad-new-pic.jpg" alt="" class="wp-image-287040" style="width:100px;height:auto" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/09/seema-jawad-new-pic.jpg 582w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/09/seema-jawad-new-pic-240x300.jpg 240w" sizes="(max-width: 582px) 100vw, 582px" /></figure>
</div>


<p class="has-vivid-cyan-blue-color has-text-color has-link-color wp-elements-0b9dd738318f0b1ba71f6c6434d866dd"><strong>डा. सीमा जावेद</strong></p>



<p>वर्ष 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड के एमिशन को शून्य तक पहुंचाने की कार्रवाई को लेकर किसी मुगालते की गुंजाइश नहीं इन दिनों चल रहे COP28 के मौक़े पर जारी ग्लोबल टिपिंग पॉइंट्स रिपोर्ट &#8211; दुनिया की तबाही और बर्बादी की कगार पर पहुँचने की दास्तान बयान करती है।</p>



<p>इस बीच जलवायु पर शोध करने वाले दुनिया भर के 100 से ज्यादा अनुसंधानकर्ताओं के हस्ताक्षर से जारी एक पत्र में यह निष्कर्ष निकाला है की विज्ञान साफ तौर पर बताता है कि नेट ज़ीरो दुनिया के लिए हमें कब क्या और कैसे करना है।</p>



<p>इस ख़त में कहा गया है की आईपीसीसी के आंकलन के अनुसार, इस सदी में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बनाए रखने की संभावना के लिए 2050 तक नेट जीरो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन तक पहुंचना ज़रूरी है।इस खत पर दस्तखत करने वालों में आईपीसीसी रिपोर्ट के कई लेखक भी शामिल हैं।</p>



<p>वहीं दूसरी तरफ़ इस रिपोर्ट से पता चलता है कि ग्लोबल वार्मिंग ने इस धरती पर मौजूद सभी समुद्री और ज़मीनी सिस्टम (प्रणालीयों) को नष्ट होने की कगार पर ला खड़ा किया है और अगर हालात जल्दी नहीं बदले तो वह दिन दूर नहीं जब यह नष्ट हो जायेंगी और इनके साथ साथ समुद्र और ज़मीन पर पाये जाने वाला जीवन भी नष्ट हो जायेगा।</p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color wp-elements-8f173f4e9eaa04159d5d1cf7b121e83f"><strong><em>ग़ौरतलब है कि पृथ्वी के विभिन्न घटक जैसे वातावरण, समुद्र, क्रायोस्फीयर, भूमंडल और जीवमंडल के बीच जटिल संबंधों शामिल है। साफ़ ज़ाहिर है कि अगर बायोस्फ़ीयर( एक जैव-भौगोलिक इकाई जो पारिस्थितिकी तंत्र के सभी पोषण स्तरों का प्रतिनिधित्व कर रहे जीवों की संख्या को बनाए रखे) और क्रायोस्फ़ीयर (यानी पृथ्वी पर बर्फ और बर्फ से ढके क्षेत्र) दोनों नहीं बचेंगे।</em></strong></p>



<p>ज्ञात हो कि एशिया में दो अरब लोग उस पानी पर निर्भर हैं जो यहां के ग्लेशियरों और बर्फ में मौजूद है, ऐसे में क्रायोस्फीयर को खोने के परिणाम इतने व्यापक हैं कि सोचा भी नहीं जा सकता। अगर ये दोनों नहीं बचे तो इंसान ख़ुद अपना अस्तित्व किस तरह बचा पाएगा।</p>



<p>अगर ग्लोबल वार्मिंग इसी तरह बरकरार रही तो वह दिन दूर नहीं जब जब ग्रीनलैंड की आइस शीट से लेकर हिमालय की बर्फीली चोटियां, अंटार्कटिक पर छायी बर्फ की चादरें गर्म पानी में पाए जाने वाली कोरल रीफ, बोरियल और मैंग्रोव के जंगल, आमेजन का जंगल, ग्रासलैंड, सारा की सारा अर्थ सिस्टम ख़त्म हो जाएगा। अब दुनिया एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है।<br>यह रिपोर्ट बेजोस अर्थ फंड के साथ साझेदारी में, एक्सेटर विश्वविद्यालय द्वारा समन्वित 200 से अधिक शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा तैयार की गई थी।</p>



<p>2°C ग्लोबल वार्मिंग के होने से &#8211; ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर, पश्चिमी अंटार्कटिक की बर्फ की चादरें, वार्म वाटर कोरल रीफ / गर्म पानी में पायी जाने वाली कोरल की चट्टानें, उत्तरी अटलांटिक के सबपोलर जाइर सर्कुलेशन और पर्माफ्रॉस्ट क्षेत्र समाप्त हो जाएँगे। जैसे-जैसे दुनिया डेढ़ डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग को पार कर रही है, तापमान के बढ़ने से &#8211; बोरियल वन, मैंग्रोव और समुद्री मीडो /घास के मैदान सब नष्ट हो जाएँगे ।</p>



<p>दो डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग और उससे आगे तापमान के बढ़ने से -पूर्वी अंटार्कटिका ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिक आइस शीट्स / बर्फ की चादरों में अमेजॉन, वर्षावन, सबग्लेशियल क्षेत्र नहीं बचेगा । रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे में दुनिया के अरबों लोगों का भविष्य अब फ़ोसिल फ्यूल के फेज आउट यानी ख़त्म करने की गति और नेट जीरो समाधानों पर निर्भर है।</p>



<p>रिपोर्ट में कार्बन एमिशन को पूरी तरह ख़त्म करने की सिफारिएसएचओ के साथ साथ दुनिया से एक समन्वित कार्रवाई करने का आह्वान किया गया है। इसमें यह निष्कर्ष निकाल गया है अगर दुनिया में &#8220;बिज़नेस ऐज़ यूजअल&#8221; यानी सब कुछ इसी तरह चलता रहा जैसे फ़िलहाल चल रहा है तो वह दिन दूर नहीं जब ग्लोबल वार्मिंग डेढ़ डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच जाये और एक एक करके हर दुनिया में मजूद बायो स्फीयर व क्रयो स्फीयर नष्ट हो जाये।</p>



<p>इस विनाश को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। रिपोर्ट ऐसा करने के लिए एक ब्लूप्रिंट पेश करती है।वहीं दूसरी तरफ़ चूँकि काॅप 28 में विज्ञान सुर्खियों में है, इसलिए पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओं ने ताजातरीन आईपीसीसी रिपोर्ट और उनके पीछे के साक्ष्यों द्वारा उल्लिखित आवश्यक कार्रवाइयों का सारांश शामिल किया है।</p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color wp-elements-15d644d62eec5d2ccb26adfeff40ae76"><strong><em>पत्र के मुताबिक अगर प्रदूषणकारी तत्वों के एमिशन में बड़े पैमाने पर तेजी से कटौती नहीं की जाती है तो डेढ़ डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बचा हुआ कार्बन बजट इसी दशक में खत्म हो जाएगा। एमिशन में जरूरी कटौती का लक्ष्य हासिल करने का मतलब यह होगा कि फ़ोसिल फ्यूल पर आधारित कोई भी मूलभूत अवसंरचना और विकास का कार्य बिल्कुल भी ना हो। यह तभी होगा जब मौजूदा प्रदूषणकारी ढांचे को इस्तेमाल से बाहर कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मौजूदा ढांचा ही अपने जीवन काल में बचे हुए कार्बन बजट को हजम कर जाएगा।</em></strong></p>



<p>यही वजह है कि ऐसे परिदृश्य जो लक्ष्य के अस्थाई अतिरेक के साथ या उसके बगैर ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोत्तरी को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखते हैं, वे यह दिखाते हैं कि बेधड़क इस्तेमाल किया जा रहे कोयले के प्रयोग को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया है। वहीं, एमिशन में जरूरी कटौती लाने के लिए वर्ष 2050 तक तेल और बेरोकटोक इस्तेमाल हो रही गैस के प्रयोग में 60 से 90 प्रतिशत तक की कमी लानी होगी।</p>



<p>वर्ष 2050 तक ज़ीरो एमिशन का लक्ष्य हासिल करने और 2050 के बाद तनिक भी एमिशन नहीं होने देने के लिए यह सभी तरह के परिदृश्य कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (सीसीएस) तथा कार्बन डाइऑक्साइड के खात्मे (सीडीआर) पर निर्भर करते हैं। ये दोनों 1.5 डिग्री सेल्सियस के लिए जरूरी पैमाने के आसपास भी नहीं हैं और स्थायी भंडारण और अन्य समस्याओं को लेकर पैदा चिंताओं से ग्रस्त हैं। इन अनिश्चित और हासिल करने के लिहाज से दुरूह समाधानों से किसी तरह की उम्मीद रखना खतरनाक है।</p>



<p>पत्र में लिखा गया है, &#8220;सिकुड़ते कार्बन बजट के बारे में निश्चितता और सीडीआर की मापनीयता के बारे में व्यापक अनिश्चितता को देखते हुए ग्लोबल वार्मिंग को रोकने और नेट जीरो के लक्ष्य तक पहुंचने का एकमात्र ठोस तरीका फ़ोसिल फ्यूल एमिशन को जरूरी न्यूनतम स्तर तक कम करना है। साथ ही अपशिष्ट फ़ोसिल फ्यूल एमिशन की बाकी मात्रा की भरपाई के लिए सीडीआर में निवेश करना है।&#8221;</p>



<p>पत्र में भी इस बात की पुष्टि करते हुए कहा गया है, &#8220;विज्ञान स्पष्ट है : वर्ष 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड के एमिशन को शून्य तक पहुंचाने का लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी कार्रवाई को लेकर किसी भी तरह के मुगालते की कोई गुंजाइश नहीं है।&#8221;</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्या ग्लेशियर से वास्तव में बाढ़ का खतरा है</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/are-glaciers-really-at-risk-of-flooding/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 May 2022 15:22:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[कार्बन उत्सर्जक]]></category>
		<category><![CDATA[कॉर्डिलेरा ब्लैंका पर्वत श्रृंखला]]></category>
		<category><![CDATA[ग्लेशियर]]></category>
		<category><![CDATA[ग्लोबल वार्मिंग]]></category>
		<category><![CDATA[जर्मनी]]></category>
		<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ. सीमा जावेद]]></category>
		<category><![CDATA[पेरू]]></category>
		<category><![CDATA[भूस्खलन]]></category>
		<category><![CDATA[हिमनद झील]]></category>
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					<description><![CDATA[डॉ. सीमा जावेद एक ऐतिहासिक घटनाक्रम में, पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन की गाज से बचाने के लिए हुए तमाम मुकदमों में से एक में जर्मनी के न्यायाधीशों ने पेरू का दौरा किया है जिससे यूरोप के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक की वजह से वहाँ होने वाले नुकसान के स्तर को निर्धारित किया जा सके. &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong>डॉ. सीमा जावेद</strong></span></p>
<p>एक ऐतिहासिक घटनाक्रम में, पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन की गाज से बचाने के लिए हुए तमाम मुकदमों में से एक में जर्मनी के न्यायाधीशों ने पेरू का दौरा किया है जिससे यूरोप के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक की वजह से वहाँ होने वाले नुकसान के स्तर को निर्धारित किया जा सके. यह मामला मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग पर कानूनी दावों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है.</p>
<p>न्यायाधीशों और अदालत द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों ने इस सप्ताह पेरू की कॉर्डिलेरा ब्लैंका पर्वत श्रृंखला में एक हिमनद झील का दौरा किया ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि जर्मनी का सबसे बड़ा बिजली प्रदाता, आरडब्ल्यूई, क्या वाकई पेरु में ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि के लिए आंशिक रूप से उत्तरदायी है और जिसकी वजह से वहाँ एक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है.</p>
<p>बर्फ से ढकी चोटियों से घिरी, पेरु की पलकाकोचा झील पिछले पांच दशकों में 34 गुना बढ़ गई है. एक अध्ययन में पाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमनदों के तेज़ी से पिघलने के कारण यह सब हुआ है और इससे झील के नीचे हुआराज़ शहर में एक घातक भूस्खलन के बाद बाढ़ का भयंकर खतरा बन गया है.</p>
<p><img decoding="async" class="aligncenter wp-image-257150 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/glaciar.jpg" alt="" width="584" height="411" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/glaciar.jpg 584w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/glaciar-300x211.jpg 300w" sizes="(max-width: 584px) 100vw, 584px" /></p>
<p>दरअसल पेरू का एक किसान, सौल लुसियानो ललियूआ,अपने घर के पास इस झील से विनाशकारी बाढ़ को रोकने के लिए आवश्यक लागत के एक हिस्से के लिए आरडब्ल्यूई (RWE) पर मुकदमा कर रहा है. सौल लुसियानो ललियूआ हुआराज़ शहर में रहता है. यह शहर एक ग्लेशियर के पिघलने के कारण एक हिमनद झील के प्रकोप से बाढ़ के खतरे में है. उन्हें झील में जल स्तर को कम करने की आवश्यकता है, जिसकी अनुमानित लागत $3.5 मिलियन है. सौल लुसियानो ललियूआ का तर्क है कि ग्लेशियर का पिघलना जलवायु परिवर्तन के कारण है &#8211; एक ऐसा दावा जो वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा समर्थित है. साथ ही उसने आरडब्ल्यूई (RWE) पर शहर की सुरक्षा की लागत का एक आनुपातिक हिस्सा चुकाने का भी दावा किया है. यह दावा €17,000 का है.</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>इस मामले में अदालत पहले ही सहमत हो चुकी है कि अगर यह साबित किया जा सकता है कि ग्लेशियर से बाढ़ का खतरा है और जलवायु परिवर्तन के कारण यह पिघल गया है तो आरडब्ल्यूई (RWE) नुकसान के लिए उत्तरदायी होगा &#8211; यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है जो किसी अन्य मामले में नहीं लिया गया था. मामले से निपटने वाली जर्मन अदालत 24-27 मई के बीच पेरू का दौरा करेगी ताकि यह आकलन किया जा सके कि क्या ग्लेशियर से वास्तव में बाढ़ का खतरा है.</strong></span></p></blockquote>
<p>यह मुक़दमा 2015 में शुरू हुआ और अब अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है. इस साल के अंत या 2023 की शुरुआत तक फैसला आने की उम्मीद है. यह अपनी तरह का पहला अंतरराष्ट्रीय मामला है जिसमें जीवाश्म ईंधन कंपनियों के ग्लोबल वार्मिंग में योगदान को मापा गया है. आरडब्ल्यूई (RWE) यूरोप के सबसे बड़े कार्बन प्रदूषकों में से एक है. यह वैश्विक ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन के 0.47% के लिए जिम्मेदार है.</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #0000ff;"><strong>(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद और जलवायु परिवर्तन की रणनीतिक संचारक हैं.)</strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/censer-for-air-quality-monitoring/">एयर क्वालिटी मोनिटरिंग में ये सस्ते सेंसर बनेंगे गेम चेंजर</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/india-will-not-go-for-net-zero/">ऊर्जा मंत्री ने कहा- फ़िलहाल भारत का नेट ज़ीरो होने का इरादा नहीं</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/the-last-chance-to-save-the-world-by-2030-half-to-be-doneemissions/">दुनिया बचाने का आख़िरी मौक़ा:  2030 तक आधे करने होंगे उत्सर्जन</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/taj-mahal-is-a-tear-that-stopped-on-the-cheek-of-time-forever/">डंके की चोट पर : वक्त के गाल पर हमेशा के लिए रुका एक आंसू है ताजमहल</a></strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>इस राह में बड़ी तकनीकी चुनौतियां हैं</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/there-are-major-technical-challenges-along-the-way/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Apr 2022 15:16:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अर्थ संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[इण्डिया]]></category>
		<category><![CDATA[अनिर्बान घोष]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका]]></category>
		<category><![CDATA[कार्बन उत्सर्जन]]></category>
		<category><![CDATA[क्लीन इनर्जी]]></category>
		<category><![CDATA[ग्लोबल वार्मिंग]]></category>
		<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
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		<category><![CDATA[भारत सरकार]]></category>
		<category><![CDATA[महिन्द्रा ग्रुप]]></category>
		<category><![CDATA[सीडीपी इंडिया]]></category>
		<category><![CDATA[स्टील इंडस्ट्री]]></category>
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					<description><![CDATA[जुबिली न्यूज़ डेस्क नई दिल्ली / लखनऊ. देश की राजधानी दिल्ली में क्लीन इनर्जी मिनिस्टीरियल (केम) इंडस्ट्री और इंडस्ट्री डीप डिकार्बनाइजेशन इनीसिएटिव (आईडीडीआई) द्वारा 4 से 8 अप्रैल 2022 के बीच बैठक का आयोजन किया गया. यह बैठक सितंबर में अमेरिका के पीट्सबर्ग में आयोजित होने जा रही केम-13 के लिए तैयारी बैठक है. केम-13 &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong>जुबिली न्यूज़ डेस्क</strong></span></p>
<p><strong>नई दिल्ली / लखनऊ.</strong> देश की राजधानी दिल्ली में क्लीन इनर्जी मिनिस्टीरियल (केम) इंडस्ट्री और इंडस्ट्री डीप डिकार्बनाइजेशन इनीसिएटिव (आईडीडीआई) द्वारा 4 से 8 अप्रैल 2022 के बीच बैठक का आयोजन किया गया. यह बैठक सितंबर में अमेरिका के पीट्सबर्ग में आयोजित होने जा रही केम-13 के लिए तैयारी बैठक है. केम-13 में भारत सरकार उद्योग जगत में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं की घोषणा करने जा रही है. पीट्सबर्ग में भारत सरकार केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा सरकारी खरीद में हरित नीति बनाने तथा उसे लागू करने के बारे में अपनी योजनाओं का खुलासा करेगी. इससे बड़े औद्योगिक समूहों द्वारा कार्बन उत्सर्जन पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.</p>
<p>संसार भर में जितना कार्बन उत्सर्जन होता है उसका दो तिहाई हिस्सा उर्जा क्षेत्र से आता है. इसके अलावा कार्बन उत्सर्जन में भारी उद्योगों द्वारा एक चौथाई से पांचवा हिस्सा होता है. जलवायु परिवर्तन के भीषण प्रकोप से बचने के लिए जरूरी है कि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाये गये 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त किया जाए. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जरूरी है उद्योग सहित सभी क्षेत्रों में सूक्ष्मता से कार्बन उत्सर्जन को समाप्त किया जाए.</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-252754 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/clean-energy.jpg" alt="" width="919" height="436" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/clean-energy.jpg 919w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/clean-energy-300x142.jpg 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/clean-energy-768x364.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 919px) 100vw, 919px" /></p>
<p>यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब जलवायु परिवर्तन पर गठित सरकारी समिति (आईपीसीसी) की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने का समय है. आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया है कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए उद्योग जगत को तेजी से कदम उठाने होंगे. अगर हमें ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेन्टीग्रेट से नीचे रखना है तो स्टील इंडस्ट्री में तीव्रता से कार्बन उत्सर्जन को कम करना होगा. इस समय संसार भर में सालाना 2 अरब मिट्रिक टन स्टील का उत्पादन हो रहा है. दुनिया के कार्बन उत्सर्जन में अकेले स्टील उद्योग का हिस्सा 7 प्रतिशत के आसपास है.</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>2020 के मानक पर ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेन्टीग्रेट तक सीमित रखने के लिए जरूरी है कि स्टील उद्योग में साल 2030 तक 50 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन को कम किया जाए तभी साल 2050 तक स्टील उद्योग में 95 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य हासिल हो सकेगा. हालांकि वर्तमान में किये जा रहे अध्ययन बताते हैं कि 2050 तक स्टील उद्योग सालाना 250 अरब मिट्रिक टन तक पहुंच जाएगा. स्टील उद्योग का ये विकास मुख्यत: विकासशील देशों में होगा. ऐसे में भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह भी जरूरी होगा कि वो विकास और कार्बन उत्सर्जन के बीच संतुलन कायम करते हुए आगे बढें. भारत जैसे विकासशील देशों को जहां एक ओर कार्बन उत्सर्जन को भी कम करना है वही अपनी विकास परक जरूरतों से भी समझौता नहीं करना है.</strong></span></p></blockquote>
<p>स्टील भारतीय औद्योगिक विकास का आधारस्तंभ है. निर्माण, परिवहन यहां कर कि वैकल्पिक उर्जा क्षेत्र में स्टील के बिना आगे बढना संभव नहीं है साथ ही स्टील जगत में कार्बन उत्सर्जन को मानकों के अनुरूप कम करना भी बहुत जरूरी है. ऐसे समय में भारत सरकार अपनी सार्वजनिक खरीद नीति में 30 से 50 प्रतिशत उत्सर्जन मुक्त स्टील खरीद की नीति को लागू करके जहां एक ओर विकास की गति को बनाये रख सकती है वही आईडीडीआई के तहत शून्य उत्सर्जन के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भी आगे बढ सकती है.</p>
<p>इस मौके पर महिन्द्रा ग्रुप के चीफ सस्टेनब्लिटी ऑफिसर अनिर्बान घोष ने कहा कि &#8220;यदि हमें शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा करना है तो स्टील उद्योग में कार्बन उत्सर्जन को कम करने का रास्ता सुनिश्चित करना ही पड़ेगा. मोटर वाहन उद्योग के लिए ग्रीन स्टील कार्बन लक्ष्यों को प्राप्त करने में उत्प्रेरक का काम कर सकता है. ज़ीरो कार्बन भविष्य बनाने के लिए हम भारत सरकार की प्रतिबद्धता का स्वागत करते हैं और हमें विश्वास है कि केम-आईडीडीआई में भारत सफल नेतृत्व करेगा। हमें भी सरकार के वचनों का सम्मान करने में खुशी होगी.”</p>
<p>सीडीपी इंडिया की डायरेक्टर प्रार्थना बोरा का कहना है कि &#8220;ग्रीन स्टील का रास्ता इतना आसान नहीं है. इसकी राह में तकनीकि की चुनौतियां भी हैं. इसके अलावा कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए व्यावहारिक समाधान निकालने की जरूरत है. स्टील कंपनियां इसे लेकर जागरुक हैं. स्टील कंपनियों को चाहिए कि वो इस दिशा में साझा प्रयास करें, एक दूसरे से अपनी जानकारी शेयर करें और जो सबसे सटीक रास्ता हो, उस पर सब मिलकर चलें. इससे स्टील उद्योग के लिए कोई एक निश्चित समाधान मिल जाएगा जो कि इस समय की जरूरत है.&#8221;</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पेरिस समझौतों का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए तो&#8230;</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/if-the-goal-of-the-paris-agreements-is-not-achieved-then/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Oct 2021 08:53:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[COVID-19]]></category>
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					<description><![CDATA[डॉ. सीमा जावेद ग्लोबल वार्मिंग के विनाशकारी स्तरों तक पहुँचने से बचने और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को एक अगले दस सालों में आधे से भी कम करना होगा, लेकिन मौजूदा रफ़्तार से तो हमें कार्बन मुक्त होने में 150 से अधिक साल लग जायेंगे। यह &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-174833 size-thumbnail" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/06/Dr.-Seema-Javed-e1607782213958-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />डॉ. सीमा जावेद</strong></span></p>
<p>ग्लोबल वार्मिंग के विनाशकारी स्तरों तक पहुँचने से बचने और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को एक अगले दस सालों में आधे से भी कम करना होगा, लेकिन मौजूदा रफ़्तार से तो हमें कार्बन मुक्त होने में 150 से अधिक साल लग जायेंगे।</p>
<p>यह बात तो तय है कि दुनिया की तमाम सरकारें पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों को पूरा करती नहीं दिखतीं। ऐसे में, लैंसेट काउंटडाउन की स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर जारी नयी रिपोर्ट इस बात का जायज़ा लेती है कि आखिर यह सरकारें, 2050 तक वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से कम की वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए 2015 में हस्ताक्षरित, ऐतिहासिक पेरिस समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को किस हद तक पूरा कर रही हैं।</p>
<p>मौजूदा साक्ष्य स्पष्ट करते हैं कि बदलती जलवायु के स्वास्थ्य पर विनाशकारी प्रभाव और उससे जुड़ी मौतों के सिलसिले को रोकने के लिए ग्लोबल वार्मिंग 1.5C तक सीमित होनी चाहिए, लेकिन इस बात के भी साक्ष्य मौजूद हैं कि इस सदी के अंत तक दुनिया में तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2.7-3.1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाने के रास्ते पर है।</p>
<p>आगे बढ़ने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि लैंसेट काउंटडाउन है क्या। दरअसल यह एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग संगठन है जो बदलते जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य परिणामों की स्वतंत्र रूप से निगरानी करता है। यह संगठन 43 शैक्षणिक संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के प्रमुख शोधकर्ताओं की आम सहमति का प्रतिनिधित्व करता है और इस रिपोर्ट के 44 संकेतक जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों पर निरंतर वृद्धि को उजागर करते हैं। 2021 की रिपोर्ट ठीक उसी समय आयी है जब जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के 26वें पार्टियों के सम्मेलन (COP26) होने वाला है, जिस पर देशों को वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 1.5°C तक बनाए रखने के लिए पेरिस समझौते की महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए दबाव का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-237939 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/10/global-warming.jpg" alt="" width="835" height="547" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/10/global-warming.jpg 835w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/10/global-warming-300x197.jpg 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/10/global-warming-768x503.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 835px) 100vw, 835px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बड़ी तस्वीर</strong></span></p>
<p>बड़े अफसोस की बात है कि लैंसेट की यह रिपोर्ट बताती है कि 2020 में विश्वरिकॉर्ड तापमान में गहराती असमानताओं के परिणामस्वरूप 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के बीच 3.1 बिलियन अधिक व्यक्ति-दिन और 626 मिलियन अधिक व्यक्ति-दिवस के कारण छोटे बच्चों को प्रभावित किया है।</p>
<p>2021 में अब तक, 65 वर्ष से अधिक या एक वर्ष से कम उम्र के लोग, सामाजिक असमानता का सामना करने वाले लोगों के साथ, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के प्रशांत उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में जून, 2021 में 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक के रिकॉर्ड-तोड़ तापमान से सबसे अधिक प्रभावित हुए थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कुल्हाड़ी पर पैर?</strong></span></p>
<p>इस रिपोर्ट में उजागर की गई एक प्रमुख चिंता मानव जनित जलवायु परिवर्तन है। गर्मी से सैकड़ों लोगों की अकाल मौत हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र परिभाषित मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के निम्न और मध्यम स्तर वाले देशों में जनसंख्या में पिछले 30 वर्षों के दौरान गर्मी की चपेट में सबसे अधिक वृद्धि हुई है।</p>
<p>निम्न और मध्यम एचडीआई वाले देशों में कृषि श्रमिक अत्यधिक तापमान के संपर्क में आने से सबसे बुरी तरह प्रभावित थे, जो 2020 में गर्मी के कारण खोए हुए 295 बिलियन संभावित काम के घंटों में से लगभग आधा था। ये खोए हुए काम के घंटे बताते हैं कि देशों में औसत संभावित कमाई का नुकसान हुआ है। निम्न एचडीआई समूह में राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद के 4-8% के बराबर थे।</p>
<p>बढ़ते औसत तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न, जलवायु परिवर्तन दुनिया में खाद्य और पानी की असुरक्षा से निपटने में प्रगति के वर्षों को उलटने लगा है। 2020 में किसी भी महीने के दौरान, वैश्विक भूमि की सतह का 19% तक अत्यधिक सूखे से प्रभावित था. एक मूल्य जो 1950 और 1999 के बीच 13 % से अधिक नहीं था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>क्या बनेगा महामारियों का पेंडुलम?</strong></span></p>
<p>मलेरिया (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम) के संचरण के लिए पर्यावरणीय रूप से उपयुक्त परिस्थितियों वाले महीनों की संख्या में 1950–59 से 2010–19 के बीच 39% की वृद्धि हुई है। बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियाँ भी कई जल-जनित, वायुजनित, खाद्य-जनित और वेक्टर-जनित रोगजनकों के संचरण के लिए उपयुक्तता बढ़ा रही हैं। ऐसे में डर है कि कहीं बीमारियों की आवृति न बढ़ जाये। महत्वपूर्ण रूप से, कम एचडीआई वाले 33 देशों में से केवल 18 (55%) देशों ने उच्च एचडीआई वाले 53 में से 47 (89%) देशों की तुलना में किसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य इमरजेंसी ढांचे के कम से कम मध्यम स्तर के कार्यान्वयन की सूचना दी। इसके अलावा, 91 देशों में से केवल 47 देशों (52%) ने स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय अनुकूलन योजना होने की सूचना दी। एक असमान प्रतिक्रिया 2021 में 10 महीने में सभी को विफल कर देती है, COVID-19 वैक्सीन के लिए वैश्विक और समान पहुंच वितरित नहीं की गई थी &#8211; उच्च आय वाले देशों में 60 % से अधिक लोगों को COVID-19 वैक्सीन की कम से कम एक खुराक मिली है। कम आय वाले देशों में सिर्फ 3.5% लोग।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एक नज़र भारत पर</strong></span></p>
<p>भारत में 2019 में अत्यधिक गर्मी की चपेट में आने की संभावना लगभग 31 थी, जो 1990 की तुलना से 15% अधिक है। भारत उन पांच देशों में से एक है जहां पिछले 5 वर्षों में अतिसंवेदनशील आबादी सबसे अधिक खतरे पर हैं, और ये खतरा आगे की और बढ़ रहा है। वास्तव में, 2016-2020 के दौरान, 1986-2005 बेसलाइन की तुलना में, 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के औसतन 444 मिलियन अधिक दिन हीटवेव एक्सपोजर थे। एक वर्ष से कम आयु के लोगों के संबंध में, 1986-2005 की आधार रेखा की तुलना में, एक वर्ष से कम उम्र के लोगों के औसतन 15 मिलियन अधिक दिन हीटवेव एक्सपोजर थे। भारत ने 2020 में 113 बिलियन घंटे से अधिक संभावित श्रम खो जाने का अनुभव किया, जिसका अर्थ 1990-1994 के औसत की तुलना में 82% की वृद्धि है। इस देश में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के कुल घंटों में से आधे से ज्यादा का नुकसान हुआ है।</p>
<p>2018 में अस्वास्थ्यकर आहार के कारण होने वाली कुल मौतों की संख्या बढ़कर 1,483,100 हो गई, जो सभी मौतों का 18% है। 2018 में, भारत में रेड मीट की अधिक खपत के कारण 13,200 मौतें हुईं, जो एक साल पहले की तुलना में 4% अधिक है। इसके अलावा, जुगाली करने वालों (बकरियों, भेड़ और मवेशियों सहित) से कृषि उत्पादों की खपत ने 2018 में भारत में सभी कृषि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 46% का योगदान दिया।</p>
<p>भारत में बिजली उत्पादन अभी भी कोयले पर अत्यधिक निर्भर है, जिसने 2018 में सभी बिजली उत्पादन में 73% का योगदान दिया। 2019 में, मानवजनित PM2.5 के कारण 907,000 से अधिक मौतें हुईं, जो 2015 की तुलना में 8% अधिक है। इसके संबंध में, इनमें से 17% (157,000 से अधिक) कोयले के दहन से प्राप्त हुए थे, मुख्यतः बिजली संयंत्रों में। यह भारत में कोयले से प्राप्त PM2.5 से संबंधित मौतों की संख्या में 9% की वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि अक्षय ऊर्जा का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन 2019 में कुल बिजली उत्पादन में इनका योगदान केवल 8% था। स्वच्छ ईंधन और खाना पकाने की तकनीक पर स्विच करके भारत ने इनडोर वायु प्रदूषण को कम करने में काफी प्रगति की है। जबकि 2000 में सभी घरों में से केवल 22% स्वच्छ ईंधन और प्रौद्योगिकियों पर निर्भर थे, 2019 में अनुपात बढ़कर 64% हो गया था। लेकिन ग्रामीण और शहरी परिवारों के बीच बड़ी असमानताएँ हैं: 2019 में सभी शहरी घरों में से 90% की तुलना में ग्रामीण घरों में केवल 48% में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन और प्रौद्योगिकियों पर निर्भर थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>समस्या की जड़</strong></span></p>
<p>डीकार्बोनाइजेशन की धीमी रफ़्तार की एक वजह तो है जीवाश्म ईंधन को सब्सिडी देने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग। आगे, समीक्षा किए गए 84 देशों में से 65 देश 2018 तक जीवाश्म ईंधन के लिए एक समग्र सब्सिडी प्रदान कर रहे थे और कई मामलों में वो सब्सिडी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट के बराबर थी। बहुत उच्च एचडीआई समूह के देशों की तुलना में डीकार्बोनाइजेशन की धीमी गति और खराब वायु गुणवत्ता नियमों के साथ, मध्यम और उच्च एचडीआई देश समूह सबसे सूक्ष्म कण पदार्थ (पीएम2.5) उत्सर्जन का उत्पादन करते हैं और वायु प्रदूषण से संबंधित मौतों की उच्चतम दर रखते हैं, जो की उच्च एचडीआई समूह में कुल मौतों की तुलना में लगभग 50% अधिक है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>अंततः</strong></span></p>
<p>पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने और ग्लोबल वार्मिंग के विनाशकारी स्तरों को रोकने के लिए, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को एक दशक के भीतर आधे से कम करना होगा। हालांकि, कमी की वर्तमान गति से, ऊर्जा प्रणाली को पूरी तरह से डीकार्बोनाइज करने में 150 साल से अधिक समय लगेगा। यह स्पष्ट है कि दुनिया के कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य लाभ को महसूस करने की राह पर नहीं है। कार्बन-सघन COVID-19 रिकवरी के परिणामस्वरूप उत्सर्जन में अत्यधिक वृद्धि दुनिया को जलवायु प्रतिबद्धताओं और सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने से रोकेगी और मानवता को तेजी से चरम और अप्रत्याशित वातावरण में बंद कर देगी।</p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/bio-diversity-is-very-important/">प्राकृतिक अजूबों को भी नष्ट कर सकता है जलवायु परिवर्तन </a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/censer-for-air-quality-monitoring/">एयर क्वालिटी मोनिटरिंग में ये सस्ते सेंसर बनेंगे गेम चेंजर</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/cyclone-restricted-mansoon/">तूफानों ने की मानसून की रफ्तार कम, जलवायु परिवर्तन का असर साफ़</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/is-bjp-making-sense-of-party-with-difference/">डंके की चोट पर : पार्टी विथ डिफ़रेंस के क्या यह मायने गढ़ रही है बीजेपी</a></strong></span></p>
<p>स्वस्थ ग्रीन रिकवरी के लिए WHO की सिफारिशों ओर COVID-19 की रिकवरी के लिए प्रतिबद्ध खरबों डॉलर को निर्देशित करके, दुनिया पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा कर सकती है, प्राकृतिक प्रणालियों की रक्षा कर सकती है जो भलाई का समर्थन करती हैं, और स्वास्थ्य प्रभावों को कम करने के माध्यम से असमानताओं को कम करती हैं। एक सार्वभौमिक निम्न-कार्बन संक्रमण के अधिकतम सह-लाभ के द्वारा।</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #0000ff;"><strong>लेखिका पर्यावरणविद, वरिष्ठ पत्रकार और जलवायु परिवर्तन की रणनीतिक संचारक हैं.</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कोयला आधारित स्टील निर्माण से जलवायु लक्ष्यों पर मंडरा रहा है खतरा</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/coal-based-steel-manufacturing-threatens-climate-targets/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 Jun 2021 13:39:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[कार्बन उत्सर्जन]]></category>
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		<category><![CDATA[डीकार्बोनाइजेशन]]></category>
		<category><![CDATA[मीथेन रिसाव का खतरा]]></category>
		<category><![CDATA[स्टील उत्पादन]]></category>
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					<description><![CDATA[डॉ. सीमा जावेद स्टील उत्पादन में लगी कंपनियों को कार्बन उत्सर्जन मुक्त बनाने की तमाम प्रतिबद्धताओं के बावजूद, दुनिया के स्टील उत्पादन और विकास में आज भी पारंपरिक, कोयला आधारित स्टील निर्माण का बोलबाला है, जिनसे वैश्विक जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए तय पेरिस लक्ष्यों के मिटने का खतरा मंडरा रहा है और साथ ही &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-174833 size-thumbnail" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/06/Dr.-Seema-Javed-e1607782213958-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />डॉ. सीमा जावेद</strong></span></p>
<p>स्टील उत्पादन में लगी कंपनियों को कार्बन उत्सर्जन मुक्त बनाने की तमाम प्रतिबद्धताओं के बावजूद, दुनिया के स्टील उत्पादन और विकास में आज भी पारंपरिक, कोयला आधारित स्टील निर्माण का बोलबाला है, जिनसे वैश्विक जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए तय पेरिस लक्ष्यों के मिटने का खतरा मंडरा रहा है और साथ ही इस काम धंधे में लगी हुई परिसंपत्तियों को अरबों के नुकसान में डालने का डर मंडरा रहा है।<br />
यह ऊर्जा अनुसंधान समूह ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर(GEM) की एक नई रिपोर्ट की खोज है, जिसका शीर्षक है &#8220;पेडल टू द मेटल: नो टाइम टू डिले स्टील सेक्टर डीकार्बोनाइजेशन।&#8221; यह रिपोर्ट विश्व के सभी कच्चे स्टील संयंत्रों जिनकी क्षमता कम से कम एक मिलियन टन प्रति वर्ष है, के पहले व्यापक सर्वेक्षण पर आधारित है।</p>
<p>सर्वेक्षण के अनुसार, 60% से अधिक वैश्विक स्टील निर्माण क्षमता ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) (बीएफ-बीओएफ) पाथवे (रास्ता) अपनाती है, जो सीमित, मुश्किल और बड़ी ऊंची लागत वाले डीकार्बोनाइजेशन यानी कार्विबन रहित उपायों के साथ स्टील के उत्पादन की सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली विधि है। इसके अलावा, निर्माणाधीन वैश्विक स्टील क्षमता का तीन चौथाई से अधिक कोयला जलाने वाली ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेसBF-BOF रास्ता अपनाने की योजना बनाये बैठे हैं।</p>
<p>ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर(GEM) की रिपोर्ट में पाया गया कि स्टील बनाने और इस इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले कोयले की सप्लाई के लिए वर्तमान में 78 धातु-उद्योग-संबंधी कोयला खदानें हैं, जो वैश्विक प्रस्तावित कोयला खदान क्षमता के 20% (455 मिलियन टन प्रति वर्ष- mtpa कोयला) की हिस्सेदार हैं। GEM ने गणना की कि इन प्रस्तावित धातु-उद्योग-संबंधी कोयला खदानों से लगभग 3.5 मिलियन टन प्रति वर्ष (mtpa) के संभावित मीथेन रिसाव का खतरा है। स्टील निर्माण उत्सर्जन गणना में इन उत्सर्जनों का हिसाब नहीं किया जाता है, जिसका अर्थ है कि कोयला आधारित डायरेक्ट रेसीडूयूड आयरन (DRI) और ब्लास्ट फर्नेस (BF) स्टील निर्माण से ग्रीन स्टील प्रौद्योगिकियों पर स्विच करने की उत्सर्जन बचत क्षमता वर्तमान में रिपोर्ट की गई से ज़्यादा है। 2050 तक IEA नेट-ज़ीरो परिदृश्य (NZE) के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखने के लिए 2021 के बाद कोई नया कोयला खदान या खदान विस्तार नहीं होना चाहिए।</p>
<p>वैश्विक स्टील क्षमता का तीन-चौथाई से अधिक अब स्टील बनाने वाली कंपनियों और देशों से नेट-ज़ीरो और कम उत्सर्जन कार्बन प्रतिबद्धताओं के अंतर्गत आता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-226653 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/06/Steel-factory.jpg" alt="" width="640" height="412" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/06/Steel-factory.jpg 640w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/06/Steel-factory-300x193.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>फिर भी ग्लोबल स्टील प्लांट ट्रैकर (वैश्विक स्टील संयंत्र ट्रैकर) में वर्तमान में निर्माणाधीन 75% से अधिक स्टील कंपनियां ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (Bf-BOF) का उपयोग करती है, जो स्टील के उत्पादन की सबसे कार्बन-गहन पारंपरिक विधि है।</p>
<p>स्टील उद्योग विकासाधीन कार्बन गहन स्टील संयंत्रों के लिए फंसी हुई परिसंपत्तियों में 47-70 बिलियन अमरीकी डालर के जोखिम का सामना कर रहा है।</p>
<p>2020 में कुल उत्पादन के प्रतिशत के रूप में सबसे अधिक क्षमता वाले देश 26.6% के साथ EU27+UK, 23.7% के साथ जापान, 20.0% के साथ US और 13.5% से 20.0% के बीच चीन थे।</p>
<p>ग्लोबल स्टील प्लांट ट्रैकर (GSPT) के अनुसार, जापान में 117 मिलियन टन प्रति वर्ष (mtpa) ऑपरेटिंग स्टीलमेकिंग क्षमता (कम से कम 1 mtpa में से) है; एक मिलियन टन प्रति वर्ष (mpta) से कम क्षमता वाले संयंत्रों सहित देश की कुल परिचालन स्टील बनाने की क्षमता 130 मिलियन टन प्रति वर्ष (mpta) है।</p>
<p>ग्लोबल स्टील प्लांट ट्रैकर के अनुसार, जापान स्टीलमेकिंग क्षमता के संचालन के लिए चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, जिसमें से लगभग तीन-चौथाई (85 mtpa) ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस है।</p>
<p>स्टील उद्योग देश के विनिर्माण उद्योगों में सबसे बड़ा उत्सर्जक है, जो देश के 2019 CO2 उत्सर्जन का 16% (1,030 मिलियन मीट्रिक टन का 172) बनाता है।</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>चीन दुनिया की स्टील बनाने की क्षमता के आधे से अधिक, और स्टील संयंत्रों से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के 60% से अधिक, का घर है।</strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ग्लोबल स्टील प्लांट ट्रैकर (GSPT) के अनुसार, चीन में स्टील प्लांट दुनिया की स्टील बनाने की क्षमता का 51% (2,010 mtpa का 1,023 mtpa) हिस्सा हैं, हालांकि अतिरिक्त गैर-रिपोर्टेड ऑपरेटिंग क्षमता चीन की वैश्विक क्षमता का हिस्सा 58% तक बढ़ा सकती है। .</strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>चीन की ऑपरेटिंग स्टील क्षमता का लगभग 77% (790 mtpa) ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस स्टीलमेकिंग है, जो इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस स्टीलमेकिंग की तुलना में काफ़ी अधिक कार्बन-गहन और स्टीलमेकिंग प्रक्रिया के डीकार्बोनाइज में मुश्किल है।</strong></span></p></blockquote>
<p>GSPT के अनुसार जापान में 117 मिलियन टन प्रति वर्ष ऑपरेटिंग स्टीलमेकिंग क्षमता (कम से कम एक mtpa में से) है; एक mtpa से कम क्षमता वाले संयंत्रों सहित देश की कुल परिचालन स्टील निर्माण क्षमता 130 mtpa तक है।</p>
<p>ग्लोबल स्टील प्लांट ट्रैकर के अनुसार, जापान स्टीलमेकिंग क्षमता के संचालन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, जिसमें से लगभग तीन-चौथाई (85 mtpa) ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत :-</strong></span></p>
<p>ग्लोबल स्टील प्लांट ट्रैकर (GSPT) के अनुसार, भारत के पास 90.1 मिलियन टन प्रति वर्ष (mtpa) ऑपरेटिंग स्टीलमेकिंग क्षमता है, जो केवल चीन (1,023.7 mtpa) और जापान (117.1 mtpa) के पीछे है।</p>
<p>भारत की परिचालन क्षमता का मेकअप 63% बेसिक फर्नेस-बेसिक ऑक्सीज फर्नेस (56.7 mtpa), 24% EAF (21.8 mtpa), और 3% OHF (2.5 mtpa) है, तीनों के संयोजन के शेष 10% (9.1 mtpa) के साथ।</p>
<p>2020 में, भारत में स्टील क्षेत्र ने 242 मीट्रिक टन CO2, भारत के औद्योगिक CO2 उत्सर्जन का 35% हिस्सा और 2010 से 33% की वृद्धि (183 मीट्रिक टन CO2 समतुल्य) का उत्सर्जन किया।</p>
<p>2015 से 2019 तक भारत में स्टील का उत्पादन 89 से 111 मिलियन मीट्रिक टन तक लगातार बढ़ रहा था, जो 2020 में कोविड -19 महामारी से मंदी के कारण 100 मिलियन टन तक गिरा था। तेज़ी से औद्योगिकीकरण होने वाले देश में स्टील का उत्पादन 2050 तक चौगुना होने का अनुमान है।</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत इस मायने में अद्वितीय है कि इसमें बड़ी मात्रा में डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन कैपेसिटी (प्रत्यक्ष रूप से घटी हुई लौह क्षमता) (52 mtpa) है जो मुख्य रूप से कोयले से संचालित होती है। पर बेसिक फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस उत्पादन पद्धति के विपरीत, डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन से उत्सर्जन को कम करने वाली गैस के रूप में रिन्यूएबल-आधारित हाइड्रोजन के साथ जीवाश्म ईंधन की अदला-बदली करके अधिक आसानी से समाप्त किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि भारत स्टील क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन के लिए कई देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है।</strong></span></p></blockquote>
<p>भारत की सबसे बड़ी निजी स्टील कंपनियां डीकार्बोनाइजेशन की ओर बढ़ रही हैं। JSW Steel और Tata Steel यूरोप ने 2050 तक कार्बन-न्यूट्रल होने के लिए प्रतिबद्ध हुए हैं, और JSW स्टील का लक्ष्य 2030 तक अपने कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 40% से अधिक (2005 के स्तर से नीचे) कटौती करना है।</p>
<p>&#8220;जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए सुझाये गए सभी रास्तों से यह बात साफ़ है कि हमें वर्तमान स्टील बेड़े की कोयला-इंटेंसिव यानी कोयला पर अत्यधिक निर्भर स्टील मेकिंग से विद्युतीकृत या बिजली पर आधारित स्टीलमेकिंग में बदलने की ज़रुरत है। स्टील उद्योग को डीकार्बोनाइजेशन के मामले में मेटल पर पेडल लगाने की जरूरत है,&#8221; GEM की शोधकर्ता और विश्लेषक और रिपोर्ट की प्रमुख लेखक, केटलिन स्वालिक ने कहा।</p>
<p>GEM की कोयला कार्यक्रम निदेशक, क्रिस्टीन शीयरयर, ने कहा, &#8220;नए कोयला ब्लास्ट फर्नेस बनाना स्टील उत्पादकों के लिए एक बुरा दांव है और ग्रह के लिए एक बुरा दांव है। कोयला आधारित स्टील निर्माण क्षमता पहले से ही उत्पादन से कहीं अधिक है, और अधिक निर्माण करने की कोई आवश्यकता नहीं है।&#8221;</p>
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<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/mukhtar-ansari-told-the-court-to-install-tv-in-my-barrack/">मुख्तार अंसारी ने कोर्ट से कहा मेरी बैरक में टीवी लगवा दो</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/the-doors-are-closed-for-vaccine-in-this-district-the-health-department-has-taken-this-route/">इस जिले में वैक्सीन के लिए बंद हैं दरवाज़े, स्वास्थ्य विभाग ने निकाला ये रास्ता</a></strong></span></p>
<p>रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि वैश्विक स्टील निर्माण क्षमता उत्पादन की तुलना में लगभग 25% अधिक है, कई पुराने और प्रदूषणकारी स्टील संयंत्रों को वैश्विक आपूर्ति को बाधित किए बिना बंद किया जा सकता है। 2020 में कुल उत्पादन के प्रतिशत के रूप में सबसे अधिक क्षमता वाले देश EU27+UK 26.6%, जापान 23.7%, US 20.0% और चीन 13.5% और 20.0% के बीच थे।</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #ff0000;"><strong>लेखिका पर्यावरणविद, वरिष्ठ पत्रकार और जलवायु परिवर्तन की रणनीतिक संचारक हैं.</strong></span></p>
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