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	<title>अहमद हसन Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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	<description>News &#38; Information Portal</description>
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		<title>विधानपरिषद चुनाव : सियासी रिस्क पर भारी पड़ा अखिलेश का आत्मविश्वास</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/legislative-council-elections-akhileshs-confidence-over-political-risk/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 Jan 2021 12:53:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[अखिलेश यादव]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रमुख संवाददाता लखनऊ. अखिलेश यादव ने आखिर अपनी राजनीतिक कुशलता का डंका बजवा ही दिया. विधानपरिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी के पास सिर्फ एक सीट जिताने भर के ही वोट थे फिर भी पार्टी ने दो उम्मीदवार मैदान में उतारे तो सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ हो गई थी कि आखिर अखिलेश इस तरह &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong>प्रमुख संवाददाता</strong></span></p>
<p><strong>लखनऊ.</strong> अखिलेश यादव ने आखिर अपनी राजनीतिक कुशलता का डंका बजवा ही दिया. विधानपरिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी के पास सिर्फ एक सीट जिताने भर के ही वोट थे फिर भी पार्टी ने दो उम्मीदवार मैदान में उतारे तो सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ हो गई थी कि आखिर अखिलेश इस तरह का रिस्क क्यों लेने जा रहे हैं.</p>
<p>विधानपरिषद की 12 सीटें रिक्त हुई थीं. सत्तारूढ़ बीजेपी के पास 10 सीटें जिता लेने के लिए पर्याप्त वोट दे. समाजवादी पार्टी के पास एक सीट जीतने भर को वोट दे. बाकी किसी भी पार्टी के पास अकेले दम पर इतने वोट नहीं थे कि वह एक सीट पर अपना प्रत्याशी जिता ले.</p>
<p><img decoding="async" class=" wp-image-145464 aligncenter" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/01/akhilesh-yadav_5434876_835x547-m-300x197.jpg" alt="" width="576" height="378" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/01/akhilesh-yadav_5434876_835x547-m-300x197.jpg 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/01/akhilesh-yadav_5434876_835x547-m-768x503.jpg 768w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/01/akhilesh-yadav_5434876_835x547-m.jpg 835w" sizes="(max-width: 576px) 100vw, 576px" /></p>
<p>12वीं सीट पर सिर्फ राजनीतिक कुशलता ही जीत का सेहरा बंधवा सकती थी. कांग्रेस, बसपा, निर्दलीयों या फिर राजभर की पार्टी के विधायकों का समर्थन हासिल करना बहुत आसान काम नहीं था इसके बावजूद अखिलेश यादव ने अहमद हसन और राजेन्द्र चौधरी को चुनाव मैदान में उतार दिया. दोनों ही प्रत्याशियों का राजनीतिक कद बहुत बड़ा है और दोनों में से किसी की भी हार पार्टी के कद को घटा सकती थी.</p>
<p>अखिलेश यादव के सामने संकट के रूप में निर्दलीय उम्मीदवार महेश चन्द्र शर्मा का नामांकन सामने आ गया. महेश शर्मा निर्दलीय थे लेकिन अखिलेश के उम्मीदवार को हराने के लिए उन्हें बीजेपी और बीएसपी दोनों ही समर्थन दे सकती थीं. इसके बावजूद समाजवादी पार्टी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त बनी रही. इत्तफाकन महेश शर्मा का नामांकन रद्द हो गया और 12 सीटों के लिए 12 ही नामांकन देखते हुए समाजवादी पार्टी के दोनों उम्मीदवार विधानपरिषद पहुँच गए.</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>महेश शर्मा का नामांकन इसलिए रद्द हुआ क्योंकि उन्होंने प्रस्तावकों से हस्ताक्षर नहीं करवाए और शुल्क भुगतान की रसीद नहीं जमा की. महेश शर्मा का नामांकन रद्द नहीं होता तो मतदान कराना पड़ता. ऐसे में जीत-हार का पूरा दारोमदार बहुजन समाज पार्टी पर ही होता. बसपा सुप्रीमो मायावती सपा उम्मीदवार को हराने के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के समर्थन में आ जातीं. अपना दल सोनेलाल के नौ सदस्य भी बीजेपी के साथ रहते.</strong></span></p></blockquote>
<p>कांग्रेस के सात विधायक अखिलेश के साथ खड़े होते. राजभर के चार विधायक भी विधायक भी समाजवादी पार्टी के समर्थन में खड़े होते. समाजवादी पार्टी के पास खुद भी 18 विधायक अतिरिक्त थे ही. ऐसे में बीजेपी के सामने क्रास वोटिंग का खतरा भी खड़ा था लेकिन इस सबके बावजूद समाजवादी पार्टी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त बनी रही.</p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/ashok-gehlot-can-become-rahul-gandhis-successor/">अशोक गहलोत बन सकते हैं राहुल गांधी के उत्तराधिकारी</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/there-is-no-way-to-avoid-embarrassment-in-this-shelter-home/">इस शेल्टर होम में शर्मिन्दगी से बचने का कोई उपाय नहीं</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/is-there-any-real-reason-for-opposition-to-tandava/">“तांडव” के विरोध की कहीं असली वजह ये तो नहीं</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #993300;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #993300;" href="https://www.jubileepost.in/time-to-evict-such-people-from-politics/">डंके की चोट पर : ऐसे लोगों को सियासत से बेदखल करने का वक्त है</a></strong></span></p>
<p>समाजवादी पार्टी के अहमद हसन और राजेन्द्र चौधरी के अलावा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा, पूर्व आईएएस अधिकारी अरविन्द कुमार शर्मा, माटी कला बोर्ड के अध्यक्ष धर्मवीर प्रजापति, कुंवर मानवेन्द्र सिंह, लक्ष्मण आचार्य, सलिल विश्नोई, गोविन्द नारायण शुक्ला, अश्वनी त्यागी और सुरेन्द्र चौधरी विधानपरिषद के नए सदस्य बने हैं.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>विधान परिषद चुनावों में अखिलेश ने खेल दिया है बड़ा दांव</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/akhilesh-tooks-a-bold-step-in-mlc-elections/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Jan 2021 08:54:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[अखिलेश यादव]]></category>
		<category><![CDATA[अहमद हसन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय जनता पार्टी]]></category>
		<category><![CDATA[मायावती]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विधानपरिषद चुनाव]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[उत्कर्ष सिन्हा उत्तर प्रदेश की सियासत में अब हर दिन एक नया मोड आना शुरू हो गया है । अगली विधान सभा के चुनावों में भले ही एक साल से ज्यादा का वक्त  हो मगर इस दरम्यान होने वाले छोटे बड़े चुनावों में सियासी दल अपनी ताकत को तौलने के साथ ही विरोधी को दबाने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong>उत्कर्ष सिन्हा</strong></span></p>
<p>उत्तर प्रदेश की सियासत में अब हर दिन एक नया मोड आना शुरू हो गया है । अगली विधान सभा के चुनावों में भले ही एक साल से ज्यादा का वक्त  हो मगर इस दरम्यान होने वाले छोटे बड़े चुनावों में सियासी दल अपनी ताकत को तौलने के साथ ही विरोधी को दबाने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले।</p>
<p>सत्ताधारी भाजपा ने पंचायत चुनावों पर अपनी पूरी ताकत लगा दी है और उसके हर छोटे बड़े नेता को प्रभार भी दे दिया गया है । लेकिन इसी बीच विधान परिषद के 12 सीटों पर होने वाले चुनावों के लिए भी रस्साकशी शुरू हो गई है।</p>
<p>समाजवादी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने बुधवार को जब इन चुनावों के लिए अपने दो कद्दावर नेताओं अहमद हसन और राजेन्द्र चौधरी के नामों की घोषणा की तो सियासी हलको में इसकी गूंज काफी तेज सुनाई दी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-205736 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/01/Akhilesh-Yadav-gusse.jpeg" alt="" width="618" height="347" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/01/Akhilesh-Yadav-gusse.jpeg 618w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/01/Akhilesh-Yadav-gusse-300x168.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /></p>
<p>इस गूंज की वजह बहुत साफ थी। विधान सभा में समाजवादी पार्टी के सदस्यों की संख्या को देखते हुए उसे विधान परिषद की एक सीट पर कामयाबी मिलना  तो तय था मगर दूसरी सीट के लिए जरूरी 32 वोटों के लिए सपा को दूसरे दलों के विधायकों की जरूरत पड़नी भी तय बात है।</p>
<p>दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के पास सीधे तौर पर 10 उम्मीदवारों को जिताने वाली संख्या है और उसके बाद 21 अतिरिक्त वोट बचेंगे। इस वोटों के साथ अगर उसके सहयोगी अपना दल के विधायक जुटें तो भी उसे कुछ और वोटों की जरूरत पड़ेगी।</p>
<p>तीसरे प्रमुख दल बसपा के पास कुल 18 विधायक थे मगर उसमें से 5 पहले ही बागी हो चुके हैं। वह अपने दम पर एक भी सीट नहीं जीत सकती, लेकिन राज्यसभा चुनावों में उसने भाजपा उम्मीदवार को समर्थन दिया था और इस सौदे के तहत उसे भाजपा का समर्थन मिल सकता है।</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>चौंकाने वाली बात ये है कि बसपा ने विधान परिषद चुनावों के लिए 2 फार्म खरीदे हैं। भाजपा ने खुद को सुरक्षित रखते हुए 10 फार्म ही लिए हैं और सपा से भी 2 फार्म लिए हैं।  फिलहाल की स्थिति में 12 में से 11 सीटों पर तो कोई समस्या नहीं जहां भाजपा के 10 और सपा का 1 उमीदवार आसानी से जीत जाएगा , लेकिन 12 वी सीट पर चुनाव यूपी की सियासत में नया रंग दिखाएगा ये निश्चित है।</strong></span></p></blockquote>
<p>फिलहाल का परिदृश्य तो यही कह रहा है कि 12 वीं सीट पर बसपा और सपा आमने सामने होगी जहां भाजपा का समर्थन बसपा को मिल सकता है। इस बीच निगाहें कांग्रेस के रुख पर भी रहेगी और ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा का रुख भी देखने को मिलेगा। राजभर ने फिलहाल प्रदेश में एक अलग मोर्चा बनाने की कवायद शुरू की है और संभावना यही है कि उनके विधायक इन चुनावों में सपा उम्मीदवार को ही वोट देंगे।</p>
<p>कांग्रेस का विधानमंडल दल भी टूटा हुआ है। कुल 7 विधायकों वाली कांग्रेस के 2 विधायक बागी हो चुके हैं और वे खुलेआम भाजपा के साथ दिखाई दे रहे हैं। बचे हुए 5 विधायकों वाली कांग्रेस को आगे पक्ष चुनना हुआ तो स्वाभाविक रूप से वे भी सपा को ही वोट देंगे हालांकि उन्मे से कुछ और भी स्वतंत्र रूप से वो दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।</p>
<p><span style="color: #800000;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #800000;" href="https://www.jubileepost.in/digvijay-calls-nathuram-godse-a-terrorist-sadhvi-pragya-says-patriot/">गोडसे आतंकी या देशभक्त ? सियासत फिर शुरू</a></strong></span></p>
<p><span style="color: #800000;"><strong>यह भी पढ़ें : <a style="color: #800000;" href="https://www.jubileepost.in/mahant-paramhans-das-5-crore-for-behading-tmc-mp-kalyan-banerjee/">अयोध्&#x200d;या के संत ने क्&#x200d;यों रखा टीएमसी सांसद के सिर पर 5 करोड़ का इनाम</a></strong></span></p>
<p>अब ऐसे में अगर अखिलेश यादव ने अपने दो प्रमुख चेहरों को मैदान में उतारने की घोषणा की है तो निश्चित रूप से सपा के रणनीतिकारों ने कुछ सोचा  जरूर होगा, क्योंकि यदि इनमे से कोई भी हारता है तो पार्टी की छवि को बड़ा धक्का लगेगा।</p>
<p>महज 16 अतिरिक्त वोटों के साथ अपना दूसरा उम्मीदवार उतारने के बाद समाजवादी पार्टी को 16 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। और यदि किन्ही 2 उमीदवारों को प्रथम वरीयता वाले 32 वोट नहीं मिले तो दूसरी वरीयता के वोटों से फैसला होगा।</p>
<p>समाजवादी पार्टी की निगाह इस बार दूसरे दलों के असंतुष्टों पर लगी है। राज्यसभा के चुनावों के वक्त जिस तरह से 4 विधायक अचानक सपा के खेमे में आगए थे उस दृश्य को अगर दुहराया गया तो सपा एक बड़ा संदेश दे देगी।</p>
<p>अखिलेश यादव ने निश्चित तौर पर एक बड़ा सियासी दांव खेला है जिसमे एक बड़ा जोखिम भी शामिल है। लेकिन यदि वे सफल हुए तो वे एक तीर से कई शिकार करने में कामयाब होंगे। एक तरफ वे बसपा को भाजपा की बी टीम बताने में भी कामयाब हो जाएंगे जिससे सूबे के अल्पसंख्यकों का बसपा से मोह भंग होगा और दूसरी तरफ वे अगर बसपा और भाजपा में बगावत दिखने में कामयाब होते हैं तो अगला विधान सभा चुनाव भाजपा बनाम सपा होने का नरेटिव भी आसानी से स्थापित हो जाएगा। और अगर बसपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारती है तो भी ये अखिलेश यादव की सीधी जीत होगी ।</p>
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