जुबिली स्पेशल डेस्क
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से दुनिया भर के देशों पर लगाए गए टैरिफ को गैरकानूनी ठहरा दिया है। शुक्रवार को दिए गए फैसले में संयुक्त राज्य सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय आपातकाल के नाम पर व्यापक व्यापारिक कदम उठाने के लिए आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल उचित नहीं है।
यह टैरिफ नेशनल इमरजेंसी से जुड़े एक फेडरल कानून के तहत लगाए गए थे। कोर्ट ने साफ किया कि बड़े पैमाने पर आयात शुल्क को सही ठहराने के लिए इस कानून का उपयोग नहीं किया जा सकता।
कारोबारियों और राज्यों ने दी थी चुनौती
इन टैरिफ के खिलाफ प्रभावित कारोबारियों और 12 अमेरिकी राज्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। निचली अदालतों ने भी माना था कि ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत मिली शक्तियों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया।
अमेरिकी संविधान के अनुसार टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस के पास है। हालांकि 1977 के इस कानून का उपयोग पहले भी राष्ट्रपतियों ने किया है, लेकिन आमतौर पर इसका इस्तेमाल प्रतिबंध (बैन) लगाने के लिए हुआ। ट्रंप पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर आयात पर टैक्स लगाने के लिए किया।

सुनवाई में जजों ने उठाए सवाल
पिछले साल 5 नवंबर की सुनवाई के दौरान रूढ़िवादी और उदारवादी—दोनों धड़े के जजों ने सरकार की उस दलील पर सवाल उठाए थे, जिसमें व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल बताया गया था। यह मामला ट्रंप की प्रमुख आर्थिक योजनाओं में शामिल था और सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचा।
‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपातकालीन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है। ट्रंप ने कई देशों से आयातित सामान पर जवाबी (रेसिप्रोकल) टैरिफ लगाए थे और बढ़ते व्यापार घाटे को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा व आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बताया था।
अप्रैल 2025 में उन्होंने व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर कई देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी। चीन, कनाडा और मेक्सिको पर भी इसी कानून के तहत टैरिफ लगाए गए थे। साथ ही फेंटानिल और अन्य अवैध दवाओं की तस्करी को भी राष्ट्रीय आपातकाल बताया गया था।
इन फैसलों के बाद कई राज्यों और कारोबारियों ने अदालत में याचिकाएं दायर कर कहा था कि इमरजेंसी पावर कानून टैरिफ लगाने की स्पष्ट अनुमति नहीं देता—और अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस दलील को सही ठहरा दिया है।
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