प्रोफेसर अशोक कुमार
(पूर्व कुलपति, कानपुर , गोरखपुर विश्वविद्यालय एंव विभागाध्यक्ष राजस्थान विश्वविद्यालय)
किसी भी शैक्षणिक संस्थान की आत्मा उसका शांत और अनुशासित वातावरण होता है। हाल के वर्षों में विश्वविद्यालयों के भीतर दो प्रकार की चुनौतियाँ उभर कर सामने आई हैं: पहली, भौतिक सुरक्षा का खतरा (जैसे आवारा कुत्तों का आतंक) और दूसरी, वैचारिक एवं व्यवस्थागत सुरक्षा का खतरा (बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप)। जब विश्वविद्यालय प्रशासन कुत्तों के प्रबंधन के लिए समितियाँ बनाता है और कड़े नियम लागू करता है, तो वही सक्रियता उन ‘मानवीय तत्वों’ के खिलाफ क्यों नहीं दिखती जो कैंपस की शांति को भंग करते हैं? यह प्रश्न केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का है।
पशु कल्याण और सार्वजनिक सुरक्षा का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि आवारा कुत्तों का प्रबंधन ‘पशु जन्म नियंत्रण नियमों’ के तहत होना चाहिए। कैंपस में कुत्तों के लिए विशेष समितियां इसलिए बनाई जाती हैं क्योंकि वे मूक प्राणी हैं, उनके व्यवहार का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता और वे रेबीज जैसी घातक बीमारियों के वाहक हो सकते हैं। प्रशासन यहाँ ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ के तर्क को प्राथमिकता देता है, जो कि सही भी है। लेकिन क्या वही सुरक्षा का तर्क तब लागू नहीं होता जब बाहरी राजनीतिक तत्व कैंपस में घुसकर छात्रों को डराते-धमकाते हैं या शैक्षणिक माहौल को दूषित करते हैं?
“अवांछित मानवीय हस्तक्षेप” की जटिलता
कुत्तों को हटाना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन बाहरी व्यक्तियों या “राजनीतिक तत्वों” को रोकना एक जटिल कानूनी और राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।
संवैधानिक अधिकार बनाम संस्थान के नियम: भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत निर्बाध आवाजाही की स्वतंत्रता देता है। लेकिन शिक्षण संस्थान “निषिद्ध क्षेत्र” की श्रेणी में आते हैं। प्रशासन के पास यह अधिकार है कि वह बिना अनुमति प्रवेश को ‘अनाधिकार प्रवेश’ माने।
प्रोक्टोरियल बोर्ड की भूमिका
हर विश्वविद्यालय में एक शक्तिशाली ‘प्रोक्टोरियल बोर्ड’ होता है। इस बोर्ड का प्राथमिक कर्तव्य अनुशासन बनाए रखना और बाहरी तत्वों की पहचान करना है। यदि गेट पर आई-कार्ड चेकिंग अनिवार्य हो और सीसीटीवी का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो बाहरी हस्तक्षेप को शून्य किया जा । यह तर्क सटीक है कि इसके लिए किसी नए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आवश्यकता नहीं है, बल्कि मौजूदा नियमों को लागू करने की ‘इच्छाशक्ति’ चाहिए।
समस्या यहाँ आती है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अक्सर राजनीतिक दबाव में होता है। स्थानीय नेता, छात्र संगठनों के पूर्व नेता (जो अब छात्र नहीं हैं) और अन्य बाहरी तत्व अक्सर वोट बैंक या स्थानीय प्रभाव के कारण कैंपस में पैठ बनाए रखते हैं। जब प्रशासन अपने ही बनाए नियमों को लागू करने में विफल रहता है, तो यह ‘आवारा मानवीय तंत्र’ का रूप ले लेता है, जो आवारा कुत्तों से कहीं अधिक खतरनाक है क्योंकि यह सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण होता है।
शैक्षणिक वातावरण बनाम राजनीतिक अड्डा
एक विश्वविद्यालय का प्राथमिक उद्देश्य शोध और शिक्षण है। कैंपस केवल छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित अभयारण्य होना चाहिए। यदि आवारा कुत्तों को छात्रों की सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है, तो कैंपस में अशांति फैलाने वाले, धरना-प्रदर्शन करने वाले बाहरी तत्वों को ‘अवांछित’ क्यों नहीं माना जाता?
बाहरी हस्तक्षेप न केवल पढ़ाई को प्रभावित करता है, बल्कि यह मेधावी छात्रों के मन में असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है। केरल और मद्रास उच्च न्यायालयों के फैसले इस बात की पुष्टि करते हैं कि शिक्षण संस्थानों में राजनीतिक गतिविधियों को सीमित किया जाना चाहिए ताकि शैक्षणिक गुणवत्ता बनी रहे।
समाधान और मार्ग
इस समस्या के समाधान के लिए ‘डॉॉग मैनेजमेंट’ की तर्ज पर ‘विजिटर मैनेजमेंट’ की आवश्यकता है:
कठोर प्रवेश नीति: गेट पर डिजिटल आई-कार्ड चेकिंग और बायोमेट्रिक एंट्री को बढ़ावा देना।
राजनीतिक अलगाव: छात्र राजनीति और बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींचना।
जवाबदेही: यदि कैंपस में कोई अप्रिय घटना होती है, तो प्रोक्टोरियल बोर्ड और सुरक्षा प्रमुख की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
बाहरी तत्वों द्वारा कैंपस में अशांति फैलाने पर बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के कानूनी प्राथमिकी (FIR) दर्ज होनी चाहिए।
“आवारा कुत्ते” केवल शारीरिक चोट पहुँचा सकते हैं, लेकिन “आवारा मानवीय तंत्र” एक पूरी पीढ़ी के भविष्य और संस्थान की साख को काटता है। यदि प्रशासन कुत्तों को नियंत्रित करने के लिए सक्रियता दिखा सकता है, तो उसे उन तत्वों के खिलाफ भी वैसी ही ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी होगी जो कैंपस की मर्यादा को लांघते हैं। अंततः, एक सुरक्षित कैंपस वही है जहाँ न केवल जानवरों से सुरक्षा हो, बल्कि जहाँ बाहरी अराजकता से भी पूर्ण मुक्ति मिले।
विश्वविद्यालयों को ‘राजनीतिक अखाड़ा’ बनने से रोकने के लिए अब प्रशासन को अपनी ‘प्रशासनिक इच्छाशक्ति’ का परिचय देना है ।
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