कानपुर में इस परिवार ने 28 साल बाद मनाई दिवाली, ये है वजह

जुबिली न्यूज़ डेस्क

कहा जाता है कि परिवार में सभी लोग साथ हों तो सारी खुशियां अच्छी लगती है। लेकिन उनका क्या जिन्होंने बिना वजह के किसी दूसरे देश में 28 साल बिता दिए हो। ऐसा ही एक मामला सामने आया है उत्तर प्रदेश के कानपुर से। कानपुर के शम्शुद्दीन पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में आठ साल तक बंद रहे और 28 साल बाद अपने घर पहुंचे।

शम्शुद्दीन के घर पहुंचते ही लोगों में खुशियों की लहर दौड़ पड़ी। ऐसा लगा कि पूरा मोहल्ला दिवाली मनाने उमड़ पड़ा। शम्शुद्दीन 26 अक्तूबर को अपने वतन अमृतसर पहुंच गए थे, लेकिन कानपुर बीते रात पहुंचे पहुंचे। उनके चेहरे पर सुकून भरी मुस्कुराहट नजर आ रही थी। घर पहुंचे तो बेटियों की सिस्कियां बंध गईं।

बहन खुशी के मारे बेहोशी हो गई। पूरा मोहल्ला दिवाली मनाने उमड़ पड़ा। शम्शुद्दीन 26 अक्तूबर को अपने वतन अमृतसर पहुंच गए थे, लेकिन कानपुर पहुंचने में उन्हें लंबा समय लग गया। शुक्रवार रात स्थानीय पुलिस और खुफिया टीम अमृतसर से उन्हें लेने गई थी।

रविवार रात ठीक 09:45 बजे पुलिस टीम शम्शुद्दीन को लेकर थाना बजरिया पहुंची। क्षेत्राधिकारी त्रिपुरारी पांडेय सहित अन्य अधिकारियों ने शम्शुद्दीन का स्वागत किया और मुंह मीठा कराया। ऐसा देख खुद शम्शुद्दीन बोले कि हमारे लिए तो यह दीपावली यादगार बन गई है।

मेरी बेटी का जन्म भी दीपावली वाले दिन हुआ था। इस पर अधिकारियों ने उन्हें मुबारकबाद दी। बोले, बेटी तो लक्ष्मी होती है। उसकी दुआ पूरी हो गई।

इसके बाद शम्शुद्दीन के छोटे भाई फहीमुद्दीन ने थाने में सभी औपचारिकता को पूरा किया। इसके बाद पुलिस बल उन्हें उनके कंघी मोहाल स्थित घर छोड़ आया। घर पहुँचते ही उनका जोरदार स्वागत किया गया। उनके घर के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी।

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मोहल्ले के लोगों और रिश्तेदारों ने उन पर पुष्प वर्षा की और फूल-मालाओं से लाद दिया। किसी तरह घर के दरवाजे पर पहुंचे तो एक बेटी से रहा न गया और वह घर से बाहर आकर अपने वालिद से चिपट कर रो पड़ीं।

इस मंजर को देख कर कुछ पल के लिए खामोशी आ गयी। सिर्फ सिस्कियां ही सुनाई दे रही थीं। घर के अंदर जाते ही ऐसा ही मंजर सामने आया जब उनकी बहन और रिश्तेदार अपने आंसू नहीं रोक सके। पूरा मोहल्ला खुशी में दिवाली मनाने लगा।

क्या था मामला

ख़बरों के अनुसार, शम्शुद्दीन 1992 में काम की तलाश में दिल्ली गए थे। वहां से उन्हें उनके एक रिश्तेदार ने फर्जी कागजात बनवाकर धोखे से पाकिस्तान लेकर चला गया। उन्होंने जब 2012 में अपना पासपोर्ट का नवीनीकरण कराने गये तो इंटेलिजेंस एजंसियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

पाकिस्तानियों ने उनपर भारतीय जासूस होने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि शम्शुद्दीन देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए आए हैं। इन आरोपों में कराची की एक अदालत ने उन्हें जासूसी करने और नकली पासपोर्ट रखने का दोषी पाया।

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इसके बाद सजा पूरी करने के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। वो 26 अक्तूबर को अटारी-बाघा बार्डर के जरिए भारत आए। इसके बाद उन्हें कोरोना महामारी को देखते हुए क्वारंटीन करके रखा गया था।

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